कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
राजा जग जीवन
शिव सो कर मस्तक धन्यो, ला मोमिन यक धेनु ॥
गरीब-अनब्यावरको दुहतही, दूध दिया ततकाल ।
पीयो बालक ब्रह्म गति, वहाँ शिव भये दयाल ॥
गरीब-कष्ट मानुषके जब भई, नित दुनिया वर देहि ।
चरण चले तत पुरीमें, यहि शिक्षा निति लेहि ॥
रामानन्द स्वामी और कबीर, साहब की बातेंलाप की साखी ।
गरीब-भक्ति द्रावड देशथी, यहाँ नहीं एक विरञ्च ।
ऊत भूतको घ्यावना, पाखण्ड और परपञ्च ॥
गरीब-रामानन्द अनन्द भये, काशी नगर मँझार ।
देश द्राविड़ छाड़िके, आये पुरी विचार ॥
गरीब-योग युक्ति प्राणायाम करि, जीता, सकल शरीर ।
तिरवेणीके घाटमें अटक रहे बलवीर ॥
गरीब-तीर्थ बरत एकादशी, गंगोदक अस्नान ।
पूजा विधि विधानसो, सर्वकलासों गान ॥
गरीब-करे मानसी सेवनित, आत्म तत्वको ध्यान ।
षट पूजा आदि भेद गति, धूप औ दीप विधान ॥
गरीब-चौदह सौ चले किये, काशीनगर मँझार ।
चार सम्प्रदा चलत हैं, और है बावन द्वार ॥
गरीब-पांच बरसके जब भये, काशी माहिं कबीर ।
दास गरीब अजीब कला, ज्ञान ध्यान गुण थीर ॥
गुल भया काशीपुरी, में अटपट वैन विहंग ।
दास गरीब गुणी थके, सुनि जुलहा परसंग ॥
रामानन्द अधिकार है, सुनि जोलहा जगदीश ।
दास गरीब विलम्ब ना, ताहि नवावत शीश ॥
रामानन्दको गुरु कहै, तनसे नहीं मिलाय ।
दास गरीब दरस भये, पैयन लगी जो लाय ॥
पन्थ चलत ठोकर लगे, राम नाम कहि दीन ।
दास गरीब कसर नहीं, सीख लिये परवीन ॥
आड़ा परदा देइके, रामानन्द बुझन्त ।
दास गरीब उलझ छबि, अधर डाक कूदन्त ॥
कौन जाति कुल पन्थ है, कौन तुम्हारा नाउँ ।
दास गरीब अधीन गति, बोलतही बलि जाऊँ ॥
जाति हमारी जगद्गुरु, परमेश्वर यह पन्थ ॥
दास गरीब लिखत परे, नाम निरञ्जन कन्त ॥
रे बालक दुर्बुद्धि सुनू, बट मठ तन आकार ।
दास गरीब दर दर लगे, बोले सिरजनहार । ।
तू मोमिनके पालुवा, जुलहे के घर वास ।
दास गरीब अज्ञान गति, एता दूढ़ विश्वास ॥
मान बड़ाई छाडिके, बोलै बालक वैन ।
दास गरीब अधम मुखी, इतना तुम घर फैन ॥
कलियुग क्षेत्रदपाल है, क्या भैरो कोई भूत ।
दास गरीब विडंबना, गया जगत सब ऊत ॥
मनी मग्ज माया तजो, तजिये मान गुमान ।
दास गरीब सो बात कहि, नहीं पावेगो जान ॥
हे बालक बुधि तोरि गति, कौडी साखन भाँड ।
दास गरीबहि हूदेस करि, नहीं लेवेंगे डाँड ॥
शाह सिकन्दर के बधे, पग ऊपर तर शीश ।
दास गरीब अगाधि गति, तोर कहा जगदीश ॥
कान काट बूचा करे, नली भरत रे नीच ।
दास गरीब जहान मैं, तुम सर जोरा मीच ॥
मरत मरत सब जग मुवा, लखै नऽ स्थिर ठौर ।
दास गरीब जहानमें, तुमसा नीच न औरू ॥
नादबिन्दकी देहमें, येता गर्व न कीन ।
दास गरीब पलक फना, जैसे बुद बुद लीन ॥
तिरन कत लों से बोलते, रामानन्द सुजान ।
दास गरीब कुजाति है, आखिर नीच निदान ॥
नीच मीच से ना डरे, काल कुल्हाड़ अशीश ।
दास गरीब अदत्त है, तँ जो कहा जगदीश ॥
जड़िहों हाथ हथकडी, गले तौक जञ्जीर ।
दास गरीब परख बिना, यह बाणी गुणगीर ॥
परख निरख नहीं तोहिको, नीच कुलीन कुजात ।
दास गरीब अकल बिना, तू जो कही क्या बात ॥
हे बालक नीची कला, तुमही बोलो ऊँच ।
दास गरीब पलक धरि, खबर नहीं हम कूँच ॥
महँके बरन खलास करि, सुन स्वामी परवीन ।
दास गरीब मनी मरी, मैं अजिज आधीन ॥
मैं अविगत गतिसे परे, चारवेद से दूर ।
दास गरीब दशो दिशा, सकल सिन्धु भरपूर ॥
सकल सिन्धु भरपूर हूँ, खालिक हमरो नाउँ ।
दास गरीब अजात हूँ, तेजि कहा बलि जाउँ ॥
जात पाँत मेरे नहीं, नहीं स्त्री नहीं गाउँ ।
दास गरीब अनन्य गति, नहीं हमारे नाउँ ॥
नाद विन्द मेरे नहीं, नहि गोद नहि गात ।
दास गरीब शब्द सजग, नहीं किसीका साथ ॥
सब सङ्गी बिछुरु नहीं, आदि अन्त बहु जाँहि ।
दास गरीब सकल बसों, बाहर भीतर माँहि ॥
हे स्वामी मैं सृष्टिमें, सृष्टि हमारे तीरू ।
दास गरीब अधर बसूं, अविगत पुरुष कबीर ॥
अनन्त कोटिसलिता बडो, अनन्त कोटि घर ऊँच ।
दास गरीब सदा रहूँ, नहीं हमारे कूँच ॥
पुहमी धरनी अकाशमें, मैं व्यापक सब ठौर ।
दास गरीब न दूसरा, हम सम तुल नहि और ॥
मैं माया मैं कालहूँ, मैं हंसा मैं बंस ।
दास गरीब दयाल हम, हमहीं करें विध्वंस ॥
ममता माया हम रची, काल जाल सब जीव ।
दास गरीब प्राण पद, हम दासा तन पीव ॥
हम दासनके दास हैं, कर्ता पुरुष करीम ।
दास गरीब अवधूत हम, हम ब्रह्मचारी सीम ॥
हम मौला सब मुल्कमें, मुल्क हमारे माँहि ।
दास करीब दलाल हम, हम दूसर कछु नाँहि ॥
हम मोती मुक्ताहल, हम दरिया दरवेश ।
दास गरीब हम नित रहें हम तजि जात हमेश ॥
हमहीं लाल गुलाल है, हम पारस पद सार ।
दस गरीब अदालतंग, हम राजा संसार ॥
हम पानी हम पवन हैं, हमहीं धरणि अकाश ।
दास गरीब तत्त्वपञ्चमैं, हमहीं शब्द निवास ॥
सुनु स्वामी सत भाखहूँ, झूठ न हमरो रञ्च ।
दास गरीब हम रूप विन, और सकल परपञ्च ॥
हम रोवत हैं सृष्टिको, वो रोवति है मोंहि ।
दास गरीब वियोगको, और न वृक्ष कोइ ॥
मैं बूझू मैंही कहूँ, मैंही किया वियोग ।
गरीब दास गलतान हम, शब्द हमारा योग ॥
चारो जुगनमें हम फिरेँ, नहिं आवेँ न जाउँ ।
गरीब दास गुरु भेदसे, लखे हमारा ठाउँ ॥
रजगुण सतगुण तमगुण, रजबीरज हम कीन्ह ।
गरीबदास हम सकलमें, हम दुनियाँ हम दीन ॥
लगी महम गनीम पर, काल कटक कटकन्त ।
गरीबदास निर्भय करूँ, जो कोइ नाम जपन्त ॥
मैं बालक मैं वृद्ध हूँ, मैं ही जवाँ जमान ।
गरीबदास निज ब्रह्म हूँ, हमहीं चारों खान ॥
गगन सुन्य गुप्ता रहूँ, हम परगट परवाह ।
गरीबदास घट घट बसूँ, विकट हमारी राह ॥
आवत जात न दीसहूँ, रहता सकल समीप ।
गरीबदास जलतरङ्ग ज्यों, हमहीं सायर सीप ॥
गोता लाऊँ स्वर्गमें, फिर पैठूँ पाताल ।
गरीबदास दृढ़त फिरूँ, हीरे माणिक लाल ॥
इस दरिया कङ्कर बहुत, लाल कहीं कहिं ठाऊँ ।
गरीबदास माणिक चुगूँ, हम मरजीवा नाउँ ॥
बोले रामानन्दजी, हम घर बड़ा सुकाल ।
गरीबदास पूजा करें, मुकुट फई जद माल ॥
सेवा करो सम्हालके, सुन स्वामी सुरज्ञान ।
गरीबदास सिरधर मुकुट, माला अटकी जान ॥
स्वामी घुण्डी खोलके, फिर माला गले डार ।
गरीबदास इस भजनको, जानत है करतार ॥