कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
भगवान् रामचन्द्रजी महाराज
का बंधन कटता है ? वहाँका सम्बाददाता कोई न मिला कि, आगेको समाचार देवे, जिसकी कुछ सुध और पता ठिकाना वेदमें स्पष्टरीतिसे नहीं । इसकी सूचना तो बेही साधु देंगे जो उस देशके होंगे । दूसरेमें क्या सामर्थ्य है ?
ज्योतिःस्वरूपी अलख निरञ्जन प्रज्वलित प्रदीपके समान है । समस्त जीवधारी पतङ्गके सदृश हैं । यदि पतङ्गको इतनी बुद्धि और इतना ज्ञान हो कि, मैं इस प्रदीपपर गिर गिर जल मरूँगा तो व्यर्थही अपने प्यारे प्राणोंको क्यों नष्ट करे ? सब पतङ्ग अज्ञानता तथा मूर्खताके कारण जल जल कर इस ज्योतिमें अपने प्राण विसर्जित करते हैं । उन्होंने सच्चे सत्यगुरुको नहीं ढूँढ़ा । यदि वे ढूँढ़, कहना मानते तो निश्चय सदैव बंधनसे छूट जाते । सत्यगुरुका कहना न माना स्वेच्छानुसार कार्य किए इस कारण प्रदीपके पतङ्गके ढङ्ग सब जलकर भस्म हो गए । उनके गुरुओंने उन्हें धोखा धडी देकर मार लिया । भ्रांति भ्रांति के धर्म सिखलाकर समस्त संसारको मारा स्वयंभी मर गए । जिन गुरुओंने दूसरोंको सुपथसे भटकाया वे स्वयं उसी पथमें भटकते रहे । अंधकारमें पड़ गए । सांसारिक मनुष्योंका तो कुछ ठिकानाही नहीं । जिस वाक्य अथवा नामके प्रभाव से लोग अपनी मुक्ति समझते हैं वही वाक्य नाम प्रत्यक्षमें धोखा तथा कष्टके निमित्त रक्खा है । जिसको वे छुटकारा समझते हैं वही उनका बंधन है । लोग पूर्णतया अनभिज्ञ हैं कि, छुटकारा ये क्या है किस प्रकार है यदि जानते तो आपसे आप अपने ऊपर किस निमित्त आपत्ति उपस्थित करते ? इसी कारण ज्ञानके साथ उपासना करनेको विशेष महत्त्व दिया है ।
अध्याय १०.
विराट् पुरुषके पहिले अवतारवाला । सत्यपुरुष ।
विराट्पुरुषका चित्र स्थानान्तरमें बनाया गया है कि, इस विराट्पुरुषके पेटमें तीन लोक बसे हैं और इसी विराट्पुरुषको मैंने कालपुरुष, निरञ्जन, निराकार, निर्गुण, राम, अल्लाह, ओंकार इत्यादिका पहिला अवतार कहा । इस पुरुष की प्रशंसा चारों वेद समस्त पुस्तकें करती हैं । यही तीनों लोकके रचयिता तथा स्वामी हैं । यह विराट्के भी ऊपर आकाशमें बैठता है । नीचे आदिभवानी और उसके पेटके भीतर तीनों देवता, अर्थात् ब्रह्मा विष्णु शिव ये तीनों रहते हैं । इस सत्यपदार्थको किसीने नहीं पहचाना है । जिसका प्रथमावतार यह विराट् पुरुष है उसकी प्रशंसा चारों वेद किया करते हैं । देखो ऋग्वेदमें इस संबंधको लिये हुए १६ मंत्र हैं । यजुर्वेदके ३१ अध्यायमें बाईस मंत्र हैं । सामवेदमें उसके
तेरह मंत्र हैं और अथर्वणमें सात मंत्र हैं। वेदने इसी पुरुषको परमात्मा रचयिता और समस्त संसारका राजा कहा है।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहलाक्षः सहलपात् ।
सभूमि ठं. सर्वत स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशांगुलम् ॥ १ ॥
जो यह अनेकों शरीरोंवाला तथा अगणित ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियवाला विराट् दीख रहा है यह उसके स्वरूपसे भिन्न नहीं है। जिसके भीतर यह विराट् विलास कर रहा है वो इस जैसे शरीरोंमें नाभिसेबारह अंगुल ऊंचे हृदयमें विराजा हुवा है यद्यपि यहां खुलासा नहीं कहा है तथापि पांचवें मंत्रमें जो यह कहा है कि, "ततो विराडजायत" इससे मालूम होता है कि, विराट्का उत्पादक दूसरा ही है। अनेकों शिरपाद आदि विराट्में ही देखे जाते हैं, इस कारण यह पता चलता है कि, यहां कार्यमुखसे कारणका विचार चला है। भागवत आदि ग्रन्थोंमें भी यही लिखा है कि—'आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य' यानी, यह विराट् उसका पहिला अवतार है।
(२) मंत्र—यह समस्त परमेश्वरही संसार है जो कुछ बीत चुका वही है और जो कुछ होगा वही है। वही मोक्षका मालिक है। उसीकी कृपासे भोग भी मिल जाते हैं।
सायनाचार्य—जो कुछ भूतपूर्व था परमेश्वर था। जो कुछ अब है परमेश्वर है। इस समय भूतपूर्वकालकी शरीरें परमेश्वरही थीं। जो कुछ भविष्यत्कालमें होगा सब परमेश्वर है। वह समस्त देवताओंका देवता है। उस वस्तुसे जो लोग खाते हैं वही बढ़ रहा है। मायाके कारण वस्तुओंका स्वरूप और का और दीख पड़ता है। परन्तु प्रत्येक वस्तु परमेश्वर है। भोग मोक्ष भी उसीकी कृपासे होते हैं।
(३) मंत्र—संसारमें जो था जो है तथा जो होगा वो समस्त उसके तेजकी परछाई मात्र है। इससे पृथक् जो हम देखते हैं वही है। समस्त सृष्टि उसका एक चौथाई भाग है और शेषके तीन भाग आकाश मुक्तिस्थान सत्यलोकमें है जहां सत्य कबीर पहुँचाते हैं।
इस प्रकार समस्त मंत्रोंके साथ चारों वेद इसकी प्रशंसा बराबर करते हैं कि, तूही सबका रचयिता तथा भोजन पहुँचानेवाला है तुझसे पृथक् और दूसरा कोई नहीं है। इसीके अवतार विराट्की देहमें समस्त रचना समा रही है। इस विराट्हीके शरीरका नाम भवसागर है। वेदके किनारे पर तो विराट्पुरुष निर-ञ्जन बैठे हैं। लोकके किनारेपर आदि भवानी चौसठ लाख योगिनियोंकी सैन्य