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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

बुत परिस्ती मत करो खुदाका नाम बेफ़ायदा मत लो

कदापि न चूके, इसी कारण शास्त्रोंमें आज्ञा है कि, गृहस्थ भोजन तैयार होनेपर पहले साधु अभ्यागतोंको खिलाले, पीछे आप भोजन करे । कबीर साहबने कहा है कि, जिस घरमें साधु भोजन नहीं करते वह मरघट और मसान है, उसके रहनेवाले भूत प्रेत हैं । जिस घरसे साधु अभ्यागत भोजन किये बिना फिर जाते हैं उस घरमें भूत प्रेत रहते हैं; भोजन करते हैं । इस कारण प्रत्येक गृहस्थको उचित है कि, घरमें भोजन तैयार हो जावे उस समय अपने

गीता अध्याय ३ श्लोक १३ ॥

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।

भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥ १३ ॥

पदच्छेद—यज्ञ'शिष्टाशिनः सन्तः' मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः' । भुञ्जते' ते' ।

तु' अघं' पापाः' ये' पचन्ति' आत्मकारणात्' ॥ १३ ॥

पदार्थ—जो पुरुष यज्ञके शेष अन्नको भोजन करता है वह शिष्टपुरुष सब पापोंसे छूट जाता है पापात्मा पुरुष केवल अपने वास्तेही अन्न पकाते हैं वे पाप-काही भोजन करते हैं ।

जो अधिकारी जन ऋषियज्ञ, देवयज्ञ पितृयज्ञ, मनुष्ययज्ञ और भूतयज्ञों को करके बचे हुए अमृतरूप अन्नको भोजन करते हैं, वेही श्रेष्ठ कहे जाते हैं । श्रद्धापूर्वक सज्जनों संतों और —शास्त्रोंके कहे कर्मोंको करनेवाले पुरुषोंकोही श्रेष्ठ कहा गया है । श्रेष्ठजन प्रमाद करके किये हुये तथा और भी अनेक प्रकारोंसे हुए पापोंसे रहित होते हैं ।

पंच सूना रूप निमित्तसे उत्पन्न हुये पापोंको नष्ट करनेके लिये श्रेष्ठ जन अपने २ संप्रदायके अविरुद्ध पंच यज्ञका नित्य सेवन करते हैं ।

पंच यज्ञोंको न करनेवाले पुरुषोंको पापकी प्राप्तिका वर्णन करते हैं । पंच महायज्ञोंको न करनेवाले पापात्मा केवल अपने उदरके लियेही अन्नको पकाते हैं, देवता, अतिथि आदिके लिये रसोई नहीं बनाते वे पुरुष केवल पाप-काही भोजन करते हैं, अन्नका भोजन नहीं करते । यद्यपि पापात्माओंकी दृष्टिमें वह अन्नही है तो भी संत शास्त्र और देवताओंकी दृष्टि करके सो अन्न पापरूप ही है । एकतो उपरोक्त पाप अपना नित्य कर्तव्य छोड़नेसे दूसरा पाप लगता है । यथा— कण्डनी पेष्णी चुल्ली उदकुंभी च माजंनी ।

पंच सूना गृहस्थस्य ताभिः स्वर्गं न विदति ॥

अर्थ—गृहस्थ पुरुषों के गृहमें हिंसा होनेके पांच स्थान होते हैं । १—ऊखलके कूटनेसे जीवोंकी हिंसा होती है, २—पाषाणकी चक्कीमें अन्नको

द्वारपर खड़े होकर इधर उधर देखे । जो कहीं भूखा साधु अथवा पथिक तथा किसी प्रकारका मनुष्य भूखा मिल जावे, तो प्रथम उसको सत्कार पूर्वक भोजन करावे, पीछे आप भोजन करे । जब कोई भोजन करने वाला न मिले तो अकेला भोजन करनेपर पश्चात्ताप करे । परमात्मासे उस दिन अभ्यागत न मिलनेके कारण, अपराध क्षमा करनेकी प्रार्थना करे । किसी प्रकार छल कपट और बनावट न करके साधु अभ्यागतोंको नित्य भोजन कराया करे । साधु अभ्यागतोंको भोजन कराती बार किसी प्रकारकी स्तानि और घृणा न लावे, भोजन पीसनेसे जीवोंकी हिंसा होती है; ३—तीसरा अन्नके पकानेके वास्ते चुल्लेमें अग्निके जलानेसे जीवोंकी हिंसा होती है; ४—पात्रोंमें जलके भरनेसे, बर्तनोंके मोजनेसे, जीवोंकी हिंसा होती है; ५—मृत्तिका जल आदिकों से घरके लीपने (माजने) से जीवोंकी हिंसा होती है । यह पंच प्रकारकी जी कि हिंसासे पापको प्राप्त हुआ गृहस्थ सद्गतिको नहीं प्राप्त होता ।

“पंचसूनाकृतं पापं पंचयज्ञैर्व्यपोहति” ॥

अर्थ—पंच हिंसाओंसे उत्पन्न हुये पाप पांच यज्ञोंके करनेसे निवृत्त हो जाते हैं । वे पंच यज्ञ ये हैं—

ऋषियज्ञं देवयज्ञं भूतयज्ञं च सर्वदा ।

नृत्यज्ञं पितृयज्ञं च यथाशक्ति न हापयेत् ॥

अर्थ—गृहस्थ रोज ऋषियज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ नरयज्ञ और पितृयज्ञ शक्तिके अनुसार करता रहे इनका परित्याग न करे ।

अपने २ धर्मग्रन्थोंके पठन पाठन, नित्य क्रिया पूजा पाठआदि करने तथा अपने गुरु और साधु विद्वानोंका भोजनादि करानेका नाम ऋषि यज्ञ है ॥ १ ॥

अन्य धर्मके विद्वान् सज्जन बुद्धिमान तथा स्वधर्मके साधु सज्जन तथा सहधर्मी गृहस्थको भोजन कराना अथवा, अपने इष्ट देवके हेतु नित्यकर्म करनेका नाम, देवयज्ञ है ॥ २ ॥

गौ, कुत्ता तथा अन्य सब प्रकारके जीवधारिओंकी भोजन आदिसँतृप्ति कराने, तथा स्थावर, शाक, पात, फल, फूल, वृक्ष, आदिके व्यर्थ छेदन न करनेको भूतयज्ञ कहते हैं । ३ ॥

गृह विषय प्राप्त हुये अतिथिको अन्नादिकोंसे संतोष करानेका नाम मनुष्य यज्ञ है ॥ ४ ॥

अपने पिता, प्रपिता पितामह, चचा, भाई आदि सब श्रेष्ठ पुरुषोंको भोजन आदिसँ नित्य प्रसन्न करने तथा अपने २ नियमानुसार श्राद्ध तर्पणादि करनेका नाम पितृयज्ञ है ॥