कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पूरण ब्रह्म भगवान् कृष्ण
लिये राज्य कर रही है । तीनों शिकारी रज तम सत्त्व जाल लगाकर शिकार खेलते फिरते हैं । इसी विराट्के पेटमें कबीर साहब अपनी नाव लिये फिरते हैं । चारों युगसे बराबर पुकारते आते हैं कि, ए मनुष्यो मेरी नावपर सवार हो मैं तुमको पार उतारूँगा । कोई भाग्यवान दौड़कर उस नावपर सवार होता है । उसका बेडा पार होता है, समस्त मनुष्य इसी विराट्पुरुषकी पूजामें संलग्न रहते हैं । किसीको इस बातकी सुध नहीं कि, यह विराट्पुरुष कौन है । किसका अवतार है उसकी बंदनासे कौनसी श्रेणी प्राप्त होती है ! इस विराट् पुरुषका शरीर उनचास करोड़ योजनका है । उसका शरीरही यह भवसागर है । ग्रंथ कबीरवाणीमें कबीर साहब कहते हैं —
बारह पालग कूर्म शरीरा । षट् पालङ्ग देहधर्म धीरा ॥
धर्मधीरा और धर्मराय इत्यादि नाम इसी विराट्पुरुषके हैं ।
षट् अर्थात् छः पालङ्गका उनचास करोड़ योजन होता है । इतना बड़ा शरीर इस विराट्पुरुषका है । आकाश पाताल और मृत्युलोक इसके भीतर बसे हैं । चारों प्रकारकी मुक्ति इसके वशमें है जो कोई इस विराट्की आज्ञानुसार भलाईको उच्च श्रेणीपर पहुँचावे वह चारों मुक्ति संसार, धन, राज्य, और वैकुण्ठ इत्यादिका अधिकारी हो जाता है । जो कुछ विराट् पुरुषके शरीरमें है वही सब मनुष्य देहमें भी है । अतः प्रत्येक मनुष्योंका शरीर इसी विराट्पुरुषका शरीर है । यद्यपि उससे छोटी दिखाई देती है, जो कुछ विराट्में वही गुण ब्रह्माण्डके भीतर है । कुछ न्यूनाधिक नहीं । पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों कच्चे हैं । जबलों यह जीव कच्चा है कच्चे के साथ प्रेम कर रहा है तबतक पक्का पथ कैसे मिल सकता है ? यह पिण्ड ब्रह्माण्ड दोनों ही झूठे हैं फिर यह झूठा जबलों झूठेसे प्रेम करता है तबलों सच्चेके साथ प्रेम कैसे उत्पन्न हो ? पर इसे भी सत्य पुरुषही समझ प्रेम किया जाय तो यह भी सत्यपुरुषकी ओर ही बढ़ाता है ।
इस विराट्पुरुषने अपना तेज प्रताप और गुण आदि भवानोंको दिए, विष्णुको दिये, राम और कृष्णको दिये और ईसाको भी दिये । सुतरां देवी भागवत में देखो ।
जब महामायाने अपना विराट् स्वरूप देवताओंको दिखलाया तब समस्त देवते औंधे मुँह गिर पड़े ।
शरीर और विराट्की एकता ।
रामचन्द्रने कागभुशुण्डको अपना विराट्रूप दिखलाया । देखो रायमंणमें लिखा है कि, जब कागभुशुण्ड अयोध्यामें गये तब रामचन्द्र छोटे बालक थे, दूध
भात खाते फिरते खेलते थे। कागभुशुण्ड रामचन्द्रके जूठे चावल जहाँ गिरते चुन कर खालिया करते थे। रामचन्द्रने कागभुशुण्डको अपना कौतुक दिखलाया। जब हंसकर अपना मुँह खोला तब कागभुशुण्ड रामचन्द्रके मुखमार्गसे पेटमें चले गये। उस पेटके भीतर चिरकालपर्यन्त घूमते रहे। जो कुछ बाहर दिखाई देता है। वही सब कौतुक भीतर दिखलाई दिया। तीनों लोकका कौतुक रामचन्द्र भगवान् के पेटके भीतर देखा। जब रामचन्द्रने खाँसा फिर पेटके बाहर निकल पड़ा। जब कागभुशुण्ड पेटके बाहर निकल पड़े तब रामचन्द्रको फिर देखा तो उसी प्रकार छोटे बालकके स्वरूपमें आँगनमें खेलरहे हैं दूधभात खाते फिरते हैं। रामचन्द्रके पेटमें कागभुशुण्डको सहस्रों वर्ष बीते तो भी एक पलभरसे विशेष नहीं था। ऐसाही कृष्णचन्द्रने जब छोटे बालक थे, बालकोंका यह नियम है कि, मिट्टी खाते हैं, जब यशोदाने यह देखा कि, कृष्ण छोटा बालक है, मिट्टी खारहा है। तब यशोदा मारने चलीं कि, तू मिट्टी न खा मना किया। तब कृष्णने अपना मुँह खोलकर दिखलाया कि, देख माँ ! मैंने मिट्टी नहीं खाई। जब कृष्णजीने मुँह खोला तब यशोदाने कृष्णके मुँहके भीतर तीनों लोकोंका कौतुक देखा। समस्त रचना पृथ्वीं आकाश सूर्य चन्द्र नक्षत्रादि सभी दिखाई दिये। यह कौतुक देखकर यशोदा अत्यंत अश्चर्यान्वित हुई कि, मेरे पुत्रके पेटमें यह कैसा आश्चर्यभय कौतुक दिखाई देता है।
ऐसाही अर्जुनको कृष्णजीने जब अपना विराट् स्वरूप दिखलाया तब अर्जुन औंधे मुँह गिरकर कहने लगे कि, ए कृष्ण ! मुझसे तुम्हारा यह स्वरूप देखा नहीं जाता, मैं भयभीत तथा कम्पित हूँ। तब फिर कृष्णने अपना यथार्थ स्वरूप दिखलाया। वह महाकालका स्वरूप छिपा लिया।
पश्चिमके महात्माओंको विराट् दर्शन।
फिर विष्णुने मूसाको अपना विराट्स्वरूप दिखलाया।
तूर नामक पर्वतपर मूसाने निवेदन किया कि, ऐ परमेश्वर ! दर्शन दे। तब आज्ञा हुई कि, तू देख न सकेंगा। फिर मूसाने निवेदन किया कि, ऐ परमेश्वर ! तू मुझे तू दर्शन दे उस समय वहाँ विराट् रूप उत्पन्न हुवा। जिसे देखकर मूसा औंधे मुँह गिर पड़े। उसको देख नहीं सके। फिर जब कृपा दृष्टि हुई तब मनुष्यके स्वरूप में आसमानी रङ्गके परमेश्वरने मूसाहारुं इत्यादिको दर्शन दिया। वे दर्शन पाकर परम आनन्दित हुए।
इसी प्रकार खरकैलनबीको नदी किनारेके तटपर विराट्पुरुषने दर्शनर दिया। देखतेही खरकैल औंधे मुँह गिर पड़े अचेत हो गये। फिर जब परमेश्वरकी