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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पाँचों भूमिकाओंके नाम

अज्ञानी डरकर भटकता फिरता है पर कहीं भी सुख नहीं पाता, स्वप्नमें भी प्रतिष्ठाका दर्शन नहीं होता, ऐसा पक्षपाती किसी प्रकार भी किसीको सन्तोष नहीं दिला सकता । पक्षपाती धर्म द्वेषमें पड़ा हुआ एकही हृदमें कोल्हूके बेलकी तरह फिरा करता है, वह कभी उस असीम अनन्त परमात्माका ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता, जहाँ वेदवाणी भी नहीं पहुँच सकती, जिसके भेदको बड़े २ ज्ञानी ऋषि मुनि नहीं पा सकते, ऐसा पक्षपाती सूर्य उसको कैसे पा सकता है ? ऐसा पक्षपाती पुरुष अपनी बुद्धि और विवेकको कभी काममें नहीं लाता, इस कारण उसे सद्गुण और उत्तम पदकी प्राप्ति नहीं होती, वह अभागही रहता है ।

गजल—यह अबस मर्द जिन्दगानी है । अस्ल इसरार गर न जानी है ॥

कुछ तफक्कुर नहीं न दिलमें तमीज । यह सब अज्ञानकी निशानी है ॥

कहीं रोजा निमाज और पूजा । कहीं कोरे आँ वेद ख्वानी है ॥

मैं बड़ा और मेरा धर्म है बड़ा । और न इसके कोइ सानी है ॥

कभी अगला धर्म न हम छोड़ें । यह हमारी रविश पुरानी है ॥

हम हैं हरदो जहाँमें तजावर । मेरे मुशिदकी मिहरवानी है ॥

ऐसे इनसानको न हो इल्म कभी । झूठको सच जिसने जानी है ॥

कोह जंगल अबस फिरे मारा । दशत सेहराकी खाक छानी है ॥

आदमी जाद के याके द्वाब । शाखेदम अब तलक न आनी है ॥

पढ़के माकूल मन मगन जो होवे । दिल लगन किससा और कहानी है ॥

सिर उसका न हो कभी मालूम । वहाँ पहुँचे न वेद बानी है ॥

गर करे फिक्र कौल आजिज पर । बदो दारैन हुकम रानी है ॥

बुद्धिमान् मनुष्य वही है जो दोषोंको देखकर पक्षपात न करे । शीघ्रही अज्ञानताके मार्गको छोड़ दे ।

दृष्टान्त—एक आदमी व्यापारके लिये परदेश गया । वहाँ से कुछ उपा-
जंन करके जब लौटा तो उसने मार्गमें एक लोहेकी खान देखी । सभोंने लोहा
उठा लिया, कुछ और आगे चलनेपर ताँबेकी खान मिली, लोहाको फँककर
ताँबा उठा लिया पर उनमेंसे एकने न लोहा फँका न ताँबा लिया । यद्यपि उसके
साथियोंने बहुत समझाया पर उसने किसीका कहना नहीं माना । कुछ और
आगे चलनेपर एक चाँदीकी खान मिली, वहाँसे सभोंने ताँबा फँककर चाँदी
उठाली पर लोहेवालेने लोहाही रखा, चाँदी न ली । वहाँ भी उसके साथियोंने
बहुत समझाया पर उसने किसीका कहना न माना । कुछ और आगे चलनेपर
सोनेकी खान मिली सभोंने चाँदी फँक दी सोना ले लिया, पर उस लोहेवालेने

अपना हठ न छोड़ा, उसी लोहेको लिये रहा । कुछ और आगे चलनेपर एक रत्नोंकी खान मिली, सबोंने सोना फँककर रत्न बाँध लिया, पर उस दुराग्रही लोहेवालेने वहाँ भी रत्नोंका अनादर करके लोहाहीके बोझकोही अच्छा समझा । सब अपने अपने घर पहुँचे, जो लोग रत्न लाये थे वे एक एक रत्नको बेचकर अपना व्यवहार चलाने लगे । आनन्द पूर्वक दिन व्यतीत करने लगे, धनी होगये देश देशमें सबका वाणिज्य फैल गया, दिन दिन उत्पत्ति होने लगी । पर वह अभागा लोहेवाला प्रथम तो कुछ दिनों लोहा बेचकर सूखी रुखी खाकर दिन बिताता रहा । फिर दरिद्र हो भूखों मरने लगा । तब दूसरे साथियोंके पास मँगने गया । उन लोगोंने उत्तर दिया कि, हे मूर्ख ! हम लोगोंने तुझे कितना समझाया तूने एकका भी कहना न माना, लोहेको फँककर जवाहिरात तक नहीं ली अब हम क्या करें ? यह तेरे कम्मोंका ही फल है, जो जैसा बोता है वैसाही फल मिलता है ।

साखी – करै बुराई सुख चहै, कैसे पावे कोय ।

रोपे पेड़ वबूलका, आम कहाँ ते होय ॥

जो कोई सज्जनोंकी रीति द्वारा शुभकम्मोंमें अपना मन लगाता है उसका सब कष्ट दूर होता है । वही सद्गुरुका कृपापात्र बनता है । सज्जनोंकी रीति अनुसार शुभकम्मोंमें लगा रहनाही सुखका मार्ग है जो असज्जनोंवत् अशुभ कम्मोंमें प्रवृत्त होगा वह कभी भी सुख न पा सकेगा । जो सद्गुरुकी शरण हो शुभ कम्मोंमें लगेगा वह दोनों लोकोंमें भाग्यवान होगा । इस कारण शुभ कम्मोंही सज्जनोंकी रीतिके अनुसार करना उचित है, यही मनुष्यका कर्तव्य है । शुभ-कम्मोंसे सद्गुरु मिलते हैं, शुभ कम्मोंसेही पापोंसेभी छूट जाता है, शुभकम्मोंसेही जठराग्निकी अग्निसे बचता है, शुभकम्मोंमें प्रवृत्तिही अज्ञानताको दूर कर ज्ञानका प्रकाश प्रगट करती है, शुभकम्मोंही करना उचित है ।

कम्मोंही द्वारा सब जगतकी उत्पत्ति हुई है, कम्महीके आधारसे ग्रह, नदी, पहाड़, समुद्र आदि खड़े हैं, कम्मोंहीसे सूर्य, चन्द्र, भ्रमण करते हैं, कम्मोंही द्वारा ईश्वर और जगत प्रगट हुए हैं, कम्मोंहीसे तीन लोक चौदह भुवन बने हैं, कम्मोंहीसे इन्द्रको छोड़ निद्रन्द पदमें स्थित होता है ।

सदाचरणही माता पिता है, बहन भाई है, यही पुत्र मित्र और सहायक है । सदाचरणसेही लोक परलोकका सुख प्राप्त होता है, सदाचारही उच्चसे उच्चपदको प्राप्त कराता है, सदाचारही संसारमें माननीय और प्रतिष्ठित बनाता है, यही है, जिससे मनुष्य ऋषि, मुनि, सन्त, साधु, पीर, पैगम्बर

औलिया आदि पदको प्राप्त होता है, सदाचारसेही यज्ञ, योग, जप, तप, ज्ञान आदिको प्राप्ति होती है, सदाचारसेही गुरु मिलता है, जिससे मोक्ष प्राप्त होती है । सदाचारही कर्तव्य है, जिसमें सदाचार नहीं है वह मनुष्यही नहीं पशु है ।

मुसद्दस

अमल कर ऐ अमल वारा अमल तुझको छुड़ावेगा ।
अमलही फर्ज है तुझपर अमल सद्गुरु मिलावेगा ॥
अमलही दाग सब तेरे गुह्नकी धों बहावेगा ।
अमलगर होश कर कोई हमल मसकन् छुड़ावेगा ॥
जगतमें भरमका फेरा अमल तेरा हटावेगा ।
अमल करले अमल करले अमलही काम आवेगा ॥ १ ॥
अमसे यह जमीं और दीद मंजर सब समावी है ।
कवाकिब और सवाबित मेहरो महकी रोशनाई है ॥
जहाँ यह और जहाँदारो जो कुछ खुद अकल आई है ।
तबक चौदह बनाई है अमलकी सब कमाई है ॥
मकॉ सब पार जावे लामकॉ घरमें बसावेगा ।
अमल करले अमल करले अमलही काम आवेगा ॥ २ ॥
यही मादर पिदर तेरा मिहरवों बहिन और भाई ।
यही फर्जन्द दिलबन्द यही दादा यही दाई ॥
यही ोर्छ अकरवाखुद बतिलफी जोफो बरनाई ।
तेरे आमाल हसनः सब मिलावे मुल्क मोलाई ॥
अमलके वास्ते इनसॉ अमल कर चैन पावेगा ।
अमल करले अमल करले अलमही काम आवेगा ॥ ३ ॥
अमलसे पीर पैगम्बर अमलसे वेद और बानी ।
अमलसे इब्तादा महशर अमलसे रहम रहमानी ॥
अमलसे योग और जुगती अमलसे ब्रह्म ब्रह्मज्ञानी ।
अमलसे सूर गूनागूं वर नक्स हयूलानी ॥
अमल कर नेक सद्गुरु टेक सोई रह बतावेगा ।
अमल करले अमल करले अमलही काम आवेगा ॥ ४ ॥
अमल मखलूक और खालिक अमल का सब पसारा है ।
अमल के वास्ते आदम वशकले खुद सँवारा है ॥
हुआ आदम अल्लाह सूरत अमलका हुक्म धारा है ।