कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
नौ कोष
उससे मनुष्यका शरीर छुड़ा लिया जावेगा। उस एक तोड़ेवालेका फल उस दश तोड़ेवालेको दिया जायगा और उसकी बढ़ती होगी। भले भूत्यको वह कमाईका बल अधिक दिया जायगा, जो सीमाबद्ध मानुषिक बलके बाहर है। सर्पिकाको तोड़ा देनेका तात्पर्य यह है कि, सर्पिका साधु तथा गुरु हैं। यदि वह गुरुओंके शरण जाता तो भी कुकर्मोंसे बचता। क्योंकि, शरणागति भी बहुत उच्चपद है व यथार्थ शरणागति होनेपर उससे अधिक परिश्रम न कराया जाता। वह निकम्मा नौकर जिसके पास कुछ नहीं है जो कुछ उसके पास होगा वह भी ले लिया जावेगा। इसका यह तात्पर्य है कि, उससे मनुष्यका शरीर ले लिया जावेगा। क्योंकि, उसके पास मानुषिक शरीर ही है जो विद्या तथा गुणका भण्डार है वह है वह भी छीन ली जावेगी।
जागृत अवस्था स्वप्नावस्था और सुषुप्ति यह तीनों अवस्था जीवके लिये हैं, तुरिया ईश्वरके निमित्त है, जो ये चारों अवस्था नियत हुई हैं, उनमेंसे प्रथम जागृतावस्था तो मनुष्यके लिये है। क्योंकि, यह मनुष्य जाग्रितावस्थामें स्थित है। यह जाग्रितावस्था बुद्धिकी अवस्था है, इसीमें भलाई तथा बुराईका हिसाब है। जाग्रितकी अवस्थासेही मनुष्य तुरियावस्थाको प्राप्त करके ईश्वर पदको प्राप्त कर सकता है स्वप्नकी अवस्था पशुओंके लिये है। क्योंकि, सब पशु अनजान तथा निर्बुद्धिताकी अवस्थामें हैं यदि कोई दोष करें तो उनके पापकी कोई गणनाही नहीं की जासकती। इसी प्रकार सभी पशु अचेत निद्राकी अवस्थामें हैं, उनके पापोंका कोई हिसाब नहीं किया जाता। जड़ पदार्थ तो सुषुप्तिकी ही अवस्थामें हैं। जो कोई जाग्रत्वस्थामें आकर सुकार्थ न करे तो वह निश्चय स्वप्न तथा सुषुप्ति अवस्थामें डाल दिया जावेगा। जो कोई नङ्गाही मनुष्य शरीरके अतिरिक्त और कुछ न रखता हो उससे क्या लिया जावेगा। निस्संदेह उससे मनुष्यका चोला ही छीन लिया जावेगा। क्योंकि, उसके पास केवल मनुष्यकी देह मात्रही रह गई है, दूसरा कुछ नहीं। इसके अतिरिक्त उससे कुछ लिया नहीं जासकता न कोई अन्य वस्तु उसके पासही है।
वह बाहर अन्धकारमें डाला जायगा। बाहरके अन्धकारसे यह तात्पर्य है कि, जो देह बुद्धि तथा ज्ञानके बाहर है, वो देह अज्ञानी पशु तथा जड़ पदार्थोंकी है, जब जीव मनुष्यकी देहसे अलग होता है तब अन्धकारमें पड़ता है। जप, तप, ज्ञान, करने अथवा सीखने योग्य नहीं रहता। क्योंकि इस निकम्मे नौकरने मनुष्यका चोला पाकर कुछ कमाई न की न तोड़ा सर्पियों (गुरु) को दिया।
इससे मानुषिक शरीरको छोड़कर पशुओंमें परिभ्रमण किया करता है । वहाँ रोना तथा दांत पीसना होता है । क्योंकि, पशुकी देहसे किसीकी मुक्ति नहीं हो सकती । अन्तमें नरकमें प्रवेश करता है जहाँ रोना तथा दांत पीसनेके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं रह जाता ।
२०—योहन्नाकी इंजीलमें आवागमन—योहन्ना की इञ्जीलका (१०) बाब (८) आयत देखो । सब जितने मुझसे आगे आये वे सब चोर और बटमार हैं । पर भेड़ोंने उनकी नहीं सुनी । द्वार मैं हूँ यदि कोई मनुष्य मुझसे प्रवेश करे तो मुक्ति पावेगा । भीतर बाहर आवे जावेगा और चरनेकी जगह पावेगा । अर्थात् हजरत मसीह फरमाते हैं कि, जितने मुझसे आगे आये हैं वे सब चोर तथा बटमार थे, मनुष्योंको भटकानेवाले थे । मैं द्वार हूँ यदि कोई मुझसे प्रवेश करेगा तो वह मुक्ति पावेगा भीतर बाहर आवे जावेगा । द्वार मैं हूँ इससे यह तात्पर्य है कि, मुझे बिना किसीको मार्ग न मिलेगा । क्योंकि, समस्त कार्योंका उत्तर दाता मैं ही हूँ । इसी कारण मसीह सारे नबियोंमें श्रेष्ठ माने जाते हैं । यहाँ मुक्तिके अर्थ एक शरीरके कर्मोंसे छूट जानेका है, एक देहके कर्मोंसे छूटा और दूसरा देहके कर्मोंमें लबक रहा । भीतर बाहर जानेसे तात्पर्य तना सुखसे है । अर्थ यह कि, जीव पिता होकर भीतर जाता है और पुत्र होकर बाहर निकलता है । जब एक शरीरको छोड़ता है तब दूसरा शरीर अपने लिये बनाता है और सदैव आवागमन किया करता है । चरनेकी जगह पानेसे यह तात्पर्य है कि, चरनेका स्थान चौपायोंके निमित्त है । मनुष्यके निमित्त नहीं । जिसके आवागमनका सम्बन्ध टूट गया वही मनुष्य है । शेषके समस्त पूर्ण पशु हैं, यद्यपि मनुष्यके स्वरूपमें दिखाई देते हैं । जितने लोग मुक्तिके निमित्त उद्योग नहीं करते न मुक्तिकी सुधि रखते हैं वो सब पूरे पशु हैं ।
२१—कयामतसे भी पहिले आवागमन—लूकाकी इञ्जीलका (१६) बाब (१९ से ३१) आयत पर्यन्त यह है कि, लाजर नामक एक दरिद्री था । उसके समस्त शरीरमें घाव थे वह बिचारा विवश होकर एक धनाढ्यके द्वारपर पड़ा रहता था, कुत्ते उसके घावोंको चाटा करते थे । अमीरके नौकर उस अमीरके रसोईसे जो जूठा चूर चार गिरता था उन सबको इकठठा करके उस लाजरके सामने रखते । लाजर वही जूठा तथा चूरचार खाकर जीता था, अन्तमें लाजर मर गया, जब वयस समाप्त हुआ तब वह अमीर भी मर गया । लाजर तो मरकर बँकुण्ठको एवं वह अमीर नरकको गया । उसने जो नरकमेंसे दृष्टि उठाकर देखा तो लाजरको बँकुण्ठमें इबराहीमके गोदमें बैठे पाया । उसको देखकर