कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
दृष्टान्त
नहीं तो तुम्हारी गर्दन काटी जावेगी । उसने स्पष्ट उत्तर दिया कि, हम अपना धर्म छोड़के मुसलमान न होंगे । मुसलमानोंने बहुत भय, आशा तथा लोभ दिखाया पर दोनोंमेंसे किसीने भी स्वीकार नहीं किया । अपना वध होना स्वीकार किया पर किसी प्रकार अपना धर्म छोड़ना नहीं चाहा बरन् मुसलमान होनेसे महान् घृणा प्रगट की । जब किसी प्रकार उन बच्चोंने नहीं माना तो निर्दयी मुसलमानोंने बिचारे निष्पाप बालकोंको, सरहिन्दकी दीवारोंमें चुनकर मार डाला । यह समाचार सुनकर मालियर कोटलेके नब्बाबने बहुत शोक किया । नब्बाबके सिवा जिन २ लोगोंने शोक प्रगट किया, गुरु गोविन्दसिंहने उनको आशिर्वाद दिया कहा कि, तुम्हारी जड़ हरी रहेगी । यह सम्बत् १७६१ विक्रमीकी बात है ।
मुख्बा ।
हकीकत रायका सिर काट किस पर । न आये दर्द दिलमें ऐसी जिसपर ॥
किया जल्लादने भी रहम जिसपर । कहो रोवे फ़लक क्यों कर न उसपर ॥
पड़े कोड़े छुरा उसको चुभाया । किया तूने जो तेरे दिलको भाया ॥
ज़रा उसने न दिल अपना डुलाया । कहो रोवे फ़लमा क्यों कर न उसपर ॥
तमा कितने दिखा मासूम बच्चे । न मुतहूरिक हुये ईमान सच्चे ॥
हुये हरगिज न लोभ और डरसे कच्चे । कहो रोवे फ़लक क्यों कर न उसपर ॥
जब आया हिन्दमें महमूद ग़ज़नी । किया उसने जो था उसको न करनी ॥
दया और धर्मको दिलमें धरनी । कहो रावे लक क्यों कर न उसपर ॥
हुआ जब सरबुलन्द औरंग औरंग । हुआ आलममें तब कुछ औरही ढंग ॥
किया हिन्दूको तब उसने बहुत तंग । कहो रोवे फ़लक क्यों कर न उसपर ॥
शहर दिल्लीमें नादिरशाह आया । तमासा अपना सो सादिर दिखाया ॥
सर अम्बार हिन्दूका लगाया । कहो रोवे लक क्योंकर न उसपर ॥
कहूँ क्योंकर गुनह शाहो गदाका । यही है धरम इस नई सम्प्रदाका ॥
न आजिज खौफ़ रहम उसमें खुदाका । कहो रोवे फ़लक क्यों कर न उसपर ॥
मुसलमानोंके अत्याचार और निर्दयताको पहलेसेही कबीर साहबने जान कर, मक्कामें प्रगट हो, मुहम्मदको मिथ्या धर्म द्वेष निरर्थक रक्तपातसे बहुत मना किया सत्य पुरुषका दर्शन कराया । मुहम्मद साहब तो, कबीर साहबका उपदेश मानकर, इस अन्यायसे रहित हुये पर उनके अनुयायियोंने नहीं छोड़ा ।
सच्चे हिन्दू और मुसलमान
मुसलमानो हदीस, तारिख मुहम्मदी तथा मौलवी अमाउद्दीन कृत तालीम मुहम्मदीमें लिखा है कि, मुसलमान लोग पहले मदिरा पीते और शूकर-का मांस खाते थे। मद्य पीकर निमाज पढ़ना विधि थी, पीछे हराम (निषेध) हो गया। इसी प्रकार बलपूर्वक मुसलमान करना भी हराम हो गया। मुसलमानोंने दो बातोंका तो हराम मान लिया पर तीसरी बात नहीं मानी। कबीर साहबने कहा है कि—
बाँधे भक्ति न होयरे भाई । बाँधे करे सो करम कसाई ।
जो लोग बलपूर्वक मुसलमान करते हैं वे स्वयम् मुसलमान नहीं हैं जो परवश मुसलमान हुये हैं वे भी मुसलमान नहीं। जो यथार्थमें मुसलमान हैं वे न तो बलपूर्वक मुसलमान करते हैं, न होते हैं।
जो गुण मने हिन्दुओंके ऊपर लिखा है, जिसमें वे गुण होंवे वे ही हिन्दू हैं। देखो हकीकतराय को मुसलमानोंने कितना दुःख दिया, प्राण तक हरण कर लिया पर वीर क्षत्रिय बालकने अपनी धर्म दृढ़ता न छोड़ी। ऐसेही पुरुष हिन्दुओंमें परिगणित होनेके योग्य हैं। जो लोग मुसलमान अथवा ईसाई होगये वे प्रथमही हिन्दू नहीं थे, न मुसलमान अथवा ईसाई, नाम धरानेपर मुसलमान अथवा ईसाई हुये। जैसे गदहेने व्याघ्रका चमड़ा ओढ़ लिया तो क्या? बैलका ओढ़ लिया तो क्या? असलमें वह गदहा ही है। वैसे ऐसे अव्यवस्थित चित्त और धर्मवाले लोगोंका कुछ भी धर्म नहीं होता। उनको धर्म बदलते, गंगादाससे यमुनादास, यमुनादाससे गोमती दास बनते कुछ भी विलम्ब नहीं है। कोई किसी धर्ममें क्यों न हो पर अपने सदाचार और पुण्यसे ही उसका कल्याण होगा क्योंकि ईश्वर एक और सम है, उसकी आज्ञा उलंघन करना पाप और नियमको न छोड़ना पुण्य है। यदि ईश्वरके नियमके विरुद्ध चलेगा तो पापी होकर दण्डका भागी होगा। सदाचरण (ईश्वरी नियम) को ही पूर्णता पर पहुँचाना सर्व धर्मोंका मूल है। जो लोग नीच घृणित मादक पदार्थ और मांस आदि हिंसा प्राप्त पदार्थोंको ग्रहण करते हैं वे भी हिन्दू नहीं हैं। केवल हिन्दुओं के ही लिये यह बात नहीं बरन् जो ईसाई अथवा मुसलमान हैं, इञ्जील तथा कुरानकी आज्ञाओं पर नहीं चलते वे ईसाई या मुसलमान नहीं हो सकते क्योंकि, मुखसे कहना और बात है, मानना और उसके ऊपर चलना और बात है। कोई क्यों न हो? जिनका जो धर्म है, वह धर्म ईश्वरी नियम (प्रकृति) के विरुद्ध न हो, उसको भली प्रकार बर्तनेसे कल्याण प्राप्त करेगा। प्रकाश और श्रेष्ठता सत्य-
पुरुषको प्रसन्न करनेका द्वार है, सदाचरणसे मिलता है सत्यपुरुषकी कृपासे मुक्ति होती है । परमात्माको सदाचार स्वीकार है दुराचारसे घृणा है ।
जिसने इस संसारमें आग लगाई उसीमें बुझाने की भी सामर्थ्य है । जिसने कालपुरुषको प्रगटकर उसको राज्य दे दिया वही इससे बचा भी सकता है । जिसने सब प्रपंच प्रगट किया वही इसको शांत भी कर सकता है, दूसरेकी क्या शक्ति है कि, कुछ भी कर सके । मनुष्यको चाहिये कि, उसीकी दया और कृपाका ध्यान रखे, उसीके कृपापात्र बननेका प्रयत्न करे, दूसरा कोई उपाय नहीं है, सब युक्तियाँ निरर्थक हैं । केवल उसीकी कृपादृष्टि प्राप्त करनी चाहिये, दूसरा कुछ भी प्राप्त करना नहीं है ।
हिन्दू, मुसलमान, ईसाई और यहूदी लोगोंसे प्रार्थना ।
प्रथम हिन्दू महाशयोंसे यह विनय है कि, जिन जिन बातोंपर उनका विश्वास और भरोसा है, जिनमें उनकी स्थिति है, वे क्या हैं ? उसमें कुछ स्थिरता है अथवा नहीं ? निर्गुण और सगुण दोनों ही तुच्छ हैं । क्योंकि, निर्गुण (जिसमें कुछ गुण नहीं) कर्ता नहीं हो सकता सगुण नाशमान तथा निर्मूल है । जब ये दोनों निर्गुण और सगुण अव्यवस्थित नाशमान हैं तो इससे लाभ की क्या आशा हो सकती है ? फिर लोग कहते हैं । ब्रह्म, जीव और माया तीनों एक ही हैं, तीनोंका एक ही मूल है । वे केवल जीवकी अज्ञानतासे तीन भासते हैं नहीं तो यथार्थमें एक ही हैं । ज्ञानकी दशामें अवाच्य पद है कुछ कहा सुना नहीं जाता । जो कुछ मन बुद्धिका गोचर है सो सब भ्रम माया है ।
तत्वमसिके तीनों पद भ्रम और धोखा हैं । भ्रम और धोखा ही इन्द्रिय गोचर होता है । भ्रमको ग्रहण करनेसे भ्रम ही मिलता है, सत्यको धारण करनेसे सत्यपदकी प्राप्ति होती है । जो सत्यकी ओर झुकेगा वह अवश्य सत्यमें ही प्राप्त होगा ।
मुसलमान महाशयोंसे कहना है कि, आप लोग कहते हैं कि, “जो मुहम्मदी कलमा पढ़नेसे मुक्ति हो जायेगी, वह विहिश्रतको जावेगा, शेष सब नकको ।” मुसलमान अपने भिन्न सब धर्मवालोंको काफ़िर कहते हैं । यदि मुसलमान होकर अपनेसे कुफ़पर ध्यान देते तो कभी किसीको किसी प्रकार दुःख नहीं देते, अत्याचार और अन्यान्यको निकट न फटकने देते, पर पक्षपात, धर्म, द्वेष, ऐसी मूर्खता है कि, जिससे मनुष्य क्या २ पाप ओर बुराई नहीं कर सकता ? जिस कलमापर उनका विश्वास है, जिसको अपने धर्म और ईमानका मूल समझते हैं वह क्या है ? केवल भ्रम और धोखा है । मूर्खोंके ठगनेकी एक युक्ति है ।