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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

तात्पर्य

यह अवस्था देखकर रुष्ट हुआ । उस बन्दरको तीन जूते मारे । जूतोंकी मार खाकर वह बन्दर अलग जा खड़ा हुआ एवं सलाम करके चला गया । जमीनदार बन्दरको बुलाता एवं खुशामद करता ही रह गया । पर वह उसके पास नहीं आया चला ही गया ।

बच्चेको निकाला—तिलोकरामजी उदासीने अपनी आँखसे देखा था कि, गङ्गाके किनारे पर एक पीपलका वृक्ष था । उसपर एक बँदरी बैठी थी । उसका बच्चा दैवात् कुएँमें गिर पड़ा । वह उस वृक्षकी जड़से लग रहा था । वह बच्चा कुएँमें गिरा तब उसने चीख मारी, उससे अनेक बन्दर एकत्रित हो गये । उनमें एक बन्दर बड़ा ही दृढ़ तथा मोटा और भयानक था । उसने उस वृक्षकी जड़को दृढ़ताके साथ दोनों हाथोंसे पकड़कर अपने दोनों पाँव कुएँमें लटका दिये । दूसरा बन्दर उसकी टाँग पकड़कर लटक गया । फिर तीसरा बन्दर उस दूसरे बन्दरकी टाँग पकड़कर लटक गया । इसी प्रकार फिर चौथा, पाँचवाँ, छठवाँ, सातवाँ सभी क्रमशः एक दूसरेकी टाँग पकड़कर लटकते गये । जब जलतक पहुँच गये, ऊपरसे नीचेतक बराबर सीढ़ी लग गई । गिरा हुआ बच्चा उसी सीढ़ीपर चढ़कर बाहर निकल आया । इसके पीछे सबसे नीचेवाला बन्दर ऊपर चढ़ आया । फिर उस नीचेवालेके बाद जो था वह निकला इसी प्रकार सब बन्दर जैसे लटके थे वैसेही ऊपर चढ़ आये । उन्होंने अपनी बुद्धिमानीसे अपने सजातीय बच्चेकी प्राण रक्षा की ।

गाडी हॉकनेवाला—सन् १८५६ ई. में पञ्जाब देशके फिरोजपुर नामक स्थानमें मनोहरदास वैरागी फिरा करता था उसके साथ गाडी रहती थी । वह प्रत्येक गांवमें जाया करता था उसके पास कितनेही जानवर थे उसने बन्दरको गाडी हॉकना सिखाया था । उसके साथ एक छोटी तोप थी वह बन्दर तोप भी चलाया करता था । कितनेही आश्चर्यमय कार्य किया करता था । उसके पास गायें थीं वे दूकान दूकानपर जाकर भीख मांग लाया करती थीं । उसने तोता मेंना और कुत्ते आदिको भली प्रकार काम करना सिखाया था । वे सब उसकी शिक्षानुसार काम किया करते थे ।

बुद्धिमती वानरी—मैंने सुना था कि, अमृतसरके समीपकी बस्ती रविदासपुरमें एक वैरागी था, चमार जातिवाले उसके बहुतसे शिष्य थे । उसके पास एक बँदरी थी । उसका सेवक एक वृद्ध था जो अफीम खाया करता था । उस स्थानपर दर्शनार्थ जो कोई जाता वह बँदरी उसका कपड़ा अथवा पाँव पकड़ लेती । जब वह उससे पूछता कि, तू क्या पैसा कौड़ी चाहती है ? तो वह

सिर हिलाती कि, हों। जब कोई पैसा कौड़ी देता तो वह उसका पाँच छोड़ देती, सारे पैसे कौड़ियों लेकर अपने सेवा करनेवालेको सौंप देती थी। यदि वह मनुष्य कह दे कि, इसकी मुझे कोई आवश्यकता नहीं है तो वह उन्हें जिनसे लेती उन्हींको वापस कर देती उस साधुसे मिलकर जितने दर्शनाभिलाषी पलटते थे उन सबको वह पहचानकर उनकी कौड़ी वापस कर दिया करती थी। किसीके पैसा कौड़ीमें तनिक भी हेरफेर न पड़ता था। वह बंदरी बुद्धिके बहुतेरे आश्चर्यजनक कार्य किया करती थी।

सेवक बन्दर—एम. आर. एस. ली महाशयकी अंग्रेजी पुस्तकसे पशुओंकी बुद्धिके विषयकी कुछ कहानियाँ लिखता हूँ। फ्रांस देशकी राजधानी पेरिसमें एक मनुष्यने एक बन्दरको शिक्षा दी। वह बन्दर अनेक आश्चर्य और बुद्धिके कार्य किया करता था। लिखनेवाला लिखता है कि, जब मेरा उस बन्दरसे साक्षात् हुआ तब वह मेरी राह छोड़कर अलग हो गया। मैंने उससे कहा सलाम-तब उस बन्दरने अपनी टोपी उतार झुककर मुझे सलाम किया। मैंने उससे पूछा कि, तुम कहाँ जाते हो? तुम्हारे पास कोई पथ चलनेका आज्ञापत्र है? तो उसने अपनी टोपीमेंसे एक चौकोर कागज निकाला मुझे खोलकर दिखाया। उसके स्वामीने कहा कि, इन महाशयका कपड़ा मैला है। उस बन्दरने अपने मालिककी जेबसे तुरन्तही एक छोटा ब्रश निकाला। मेरे कपड़ेके किनारेको पकड़कर झाड़ दिया फिर मेरे जूतेको साफकर दिया। वह बड़ा ही शिक्षित तथा कृतज्ञ था। जब उसको भोजन दिया जाता था तो वह अन्यान्य बन्दरोंकी तरह तरह खानेको गालोंमें नहीं भरता था। किन्तु मनुष्यकी तरह उसी समय खा जाया करता था जब हम लोग उसको रुपये पैसे देते थे तो वह लेकर उन्हें अपने मालिकके हाथ पर धर दिया करता था।

चंपेन—एक प्रकारका बन्दर है जिसका मुख गम्भीर होता है, वह सब बन्दरोंकी अपेक्षा मनुष्यकी अच्छी तरह नकल कर सकता है। सारे कांध्य गम्भीरता सहित करता है। कभी कभी उसको बहुतही थोडा क्रोध आया करता है। अंग्रेजी भाषामें इस बन्दरको चम्पनजी कहते हैं। इसमें एक छोटी जाति और एक बड़ी जाति होती है। इसकी छोटी जातिका एक बन्दर प्यरिस नगरमें रहता था। उसकी बुद्धिके विषयमें अनेक कहानियाँ प्रचलित हैं। वह कुरसी पर बैठता था। ताला खोलता था फिर बन्द कर देता था। छोटा चमचा लेकर चाय पीता था। छुरी काटेसे भोजन किया करता था। अपना भोजन अलग रख देता था। जब अकेला होता था तब चिल्लाता था अपने को