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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

चक्रादिकोंका मान चित्र

हिरन तथा बाघकी खाल पहनता है । कोई विष्ठा खाता है एवं मूत्र पीता है । कोई अपनी जूजी छेदकर कड़ा पहन लेता है कोई उसको काटकर फँक देता है । कोई कोई ऐसे कार्य करते हैं कि, जो ऐसे घृणित हैं कि, जिनके लिखनेमें मुझको लज्जा आती है केवल इतना इज्जित कर देनाही यथेष्ट है कि, कोई परस्त्रीगमन करनाही अपना परम धर्म जानते हैं कोई सहस्र स्त्रियोंके साथ संभोग करने तथा उनके भगको देखनेहीसे अपनी मुक्ति समझते हैं, कोई उलटी खानेको बड़ी बात समझते हैं । कोई धूनी लगाकर बैठता है, कोई मौनी बन गया है ॥ कोई तीर्थमें नहाता फिरता है, कोई उलटा लटकता है, कोई धूँवा पीता है । कोई सदा सुहागिन बनकर स्त्रियोंका वस्त्र तथा उनके आभूषण पहनता है कोई घृंधरू पहनकर नाचता फिरता है कोई एक कुण्ड बनाता है पृथ्वीमें वह घृंधरू पहनकर नाचता फिरता है कोई एक कुण्ड बनाता है पृथ्वीमें वह कुण्ड खोदकर दाल भात रोटी तथा माँस और भौंति भौंतिके भोजनोंसे भर देता है । चेले और सांसारिक तथा साधु और ब्राह्मण शूद्र चमार सब एक साथ बैठकर इसी कुण्डमें से सब भोजन करते हैं । एक प्याले से मदिरा पान किया करते हैं इससे अपनी मुक्ति समझते हैं । कोई कहते हैं हम अमुक गुरु अथवा धर्मके अगुवा पर भरोसा रखते हैं उसके द्वारा हमारी मुक्ति निश्चय है यहाँतक कि, इस अगुवाको परमेश्वर समझते हैं । यद्यपि वह गुरु नितान्तही विवश तथा पराधीन हैं । कोई कहता है हमारे धर्मके अगुवामें मनुष्यता तथा परमेश्वरी दोनोंही हैं । उन्हें तनिक भी सुध भी नहीं कि, मनुष्य कहाँ ? तथा परमेश्वर एक साथ कहाँ, कहाँ अंधा, कहाँ आखोंवाला, कहाँ साधु कहाँ और चोर कहाँ झूठा कहाँ और सच्चा एकही समयमें कहाँ दिन और कहाँ रात । कोई योग समाधि लगाकर बैठता हुआ अपनेको अमर समझता है । कोई कहता है कि, मैं ब्रह्मा हूँ । अनगिनती ध्यान तथा अनगिनती रङ्ग ढङ्ग इन चारों पशुओंके हैं कि, जिनके विवरणका बल मुझमें नहीं है; जब मैं उनकी यह दशा यानी अवस्था देखता हूँ तो मुझको वह काशीका पागलखाना याद आ जाता है कि, इस आकाश छतके नीचे जो ये सब पशु रहते हैं वे कैसे कैसे कौतुक दिखाते हैं । हर एक अपनेको योग्य तथा श्रेष्ठ समझते हैं । कोई उनमें अपनेको परमेश्वर तथा कोई अपनेको शिष्य समझते हैं । समस्त सांसारिक मनुष्य साधुओंका अनुसरण करके मुक्तिपथसे वञ्चित रहे । उनको सच्चा सत्यगुरु नहीं मिलता । इन चारों प्रकारके लोगोंमें कोई गुरुमुख नहीं है, सब मनमुख हैं । यदि दैवात् इनमेंसे कोई गुरुमुख हो तो उसको अवश्यही आकाशी सहायता मिलेगी । उसको सत्य-

गुरुका दर्शन प्राप्त होगा वह इस गुरुमुखको अपनी ओर खींच लेगा। सत्यगुरु संसारमें आकर समझाते फिरते हैं कि, ए मनुष्यो ! तुम मेरी बात मानों, मैं तुमको वही रङ्ग रूप प्रदान करूँगा जो कठिनसे कठिन तपस्या करनेपर भी ऋषि मुनिगण नहीं पाते हैं। जैसे कीड़ेको भूङ्गी अपने रूपका बनाता है, इस प्रकार तुम मेरे स्वरूपके समान होगे। अनुरागसागर पृ ८ में मृतकभावके वर्णनमें भूङ्गीका दृष्टान्त आया है स्वामी परमानन्दजीने उसीको अति सुन्दर कविताके साथ कयहूँ रख दिया है।

भूंगी कीटका दृष्टान्तकी कविता ।

भूङ्गी जो आन कीटको खुद रङ्ग लगावे ।
आवाज अपनी आनसिक्ख कान सिखावे ॥
वह रूप पहला रहा एक न बाकी ।
गुरु शब्दसे फिलफौर रङ्ग पटल सो जावे ॥
कोई और क्रिस्म कर्मको जिनदार न देखे ।
भूङ्गी जो अपने ढङ्ग कीट टूँढके लावे ॥
वह टूँढ काम अपनेही हम रङ्ग हमेशा ।
दिलदेके उसको तवही अपने रूप बनावे ॥
दिल उसको दिया चाहिए दिलदार कोई हो ।
हिन्दू या मुसलमान खरीदार कोई हो ॥

भावार्थ—भौरा स्वयं ही आकर कीड़ेको रंग लगाता है बारबार अपनी आवाजको कीड़ेके कानमें डालता है। इसका नतीजा यह होता है कि, कीड़ेका पहिला रूप रंग बाकी नहीं रह जाता। गुरुके शब्दसे उसका रूपरंग शीघ्रही बदल जाता है। वो कीड़ा भौरोंके ध्यानके या उसके शब्दके दूसरी बात नहीं देखता, भूंग भी उसे आप ही टूँढकर अपने पास लाता है, अपनी ही इच्छासे सदा अपने रंगका बनानेकी चेष्टा करता है वो अपना दिल देकर अपने रूपका बना लेता है। उसे दिलदे जो दिलदार हो। वो चाहें हिन्दू हो या मुसलमान हो, पर उसका खरीदनेवाला हो ॥

हैं कोट लाख सदमें कोई एकही मेरा ।
जहाँ जाके बारबार भूङ्ग करता है फेरा ॥
वही कीट जेहल अपनेसे गुरुबात न माने ।
तब जाके पास उसके भूङ्ग करता है डेरा ॥
कहता है कीट तुझको लगी आन खराबी ।

नहिं अकल ठिकाने रही नहिं इल्म है तेरा ॥
तू बात मेरी मान अबकी बार कान धर ।
हो मेरी तू दमशकल तेरा होवे निबटेरा ॥
दिल उसको दिया चाहिए दिलदार कोई हो ।
हिन्दू या मुसलमान खरीदार कोई हो ॥

भावार्थ—हजारों लाखोंमें कोई एक ऐसा होता है जहाँ वो भौरा जाता जाता है । जब वो कीट गुरु भृंगके बार २ के कहे सडुपदेशोंको भी नहीं मानता तो फिर भौरा उसीके पास अपना आसन जमा देता है, कहता है कि, ए कीड़े ! तुझे बड़ी खराबी लगी हुई है न तो तेरी बुद्धिही ठिकानेपर रही है एवं न तुझे इसका इल्म ही है, तू अबकी मेरी, बातको अपने कान धर ले इससे तू मेरी सूरतका हो जायगा । ए शिष्य ! मेरे उपदेशके सुनते ही गोबररूपी विषयोंसे तेरा पीछा छूट जायेगा । उसेही दिल देना चाहिये जो कोई दिलदार हो वो चाहे हिन्दू हो भले ही मुसलमान हो, परदिल दे दिलको खरीद ले ॥

मुरशिद जो मेहबान जिसे आन जगाया ।
भूले जो जीव जगत् भगत फेर लगाया ॥
जो अन्ध जीव जगमें कोई बात न माने ।
रही घेर उपर उनके महाकालकी माया ॥
फरमान मानबाज्ज कोई जीव अंकूरी ।
सत पुरुष भगत भाव बहुत बार बताया ॥
समझाए सबको जाय जगमें आपही ज्ञानी ।
आजिज्ज न माने जीव जिसे जमने फँसाया ॥
दिल उसको दिया चाहिए दिलदार कोई हो ।
हिन्दू या मुसलमान खरीदार कोई हो ॥

जो जीव जगतके फेरमें पड़कर सबको भुलाये बैठा था उसे सदगुरुने कृपा करके जगा दिया पर जो अन्धा सदगुरुके वचन न माने तो समझना चाहिये चाहिये कि, उसे काल पुरुषकी माया घेर रही है । जिसके दिलमें मुक्त होनेके अंकुर हैं वोही अनुशासनमें श्रद्धा रखनेवाला अनुशासनको मानेगा । ज्ञानीजी सबके समझानेके लिये आते हैं एवम् सत्यपुरुषकी भक्ति अनेक बार वचा चुके हैं । पर जिसे अज्ञानसे घेर रखा है वो किसी तरह भी नहीं मानता । उसे दिल देना चाहिये जो दिलदार हो, वो चाहे हिन्दू मुसलमान कोई भी क्यों न हो ॥

मनुष्यताका उपदेश ।

मनुष्य कहिए आदमी । पहले पाशविक गुणोंका विवरण किया था अब मनुष्यके गुण लिखता हूँ कि, मनुष्य उसको कहते हैं जिसमें मानुषिक बुद्धि हो । मनुष्यकी मूर्ति होनेमात्रसे ही मनुष्य कभी समझा नहीं जा सकता ।

बैत — जो असल काँच कहते हैं गौहर बनामको ।

विन वासनाको फूल कहो कौन कामको ॥

कांचके मोती नाममात्रके मोती होते हैं वास्तवमें बेकाँच हैं । इसी तरह बिना वासनाके फूल, किस कामका होता है ? यानी वो किसी कामका नहीं होता । जिसमें मानुषिक बुद्धि हो वही मनुष्य कहलाता है । बाकी सबी पूरे पशु हैं । खाना, पीना, सोना, विषयसम्भोग इत्यादि सब कुछ पशु तथा मनुष्योंमें समानही हैं । जिसमें मानुषिक बुद्धि नहीं वह वस्तुतः पशु है । मिथ्यावादी गुरुगण झूठे भेष धर, सांसारिकों को धोखा देते फिरते हैं । मनुष्यको उनसे भागना तथा बचते रहना उचित है । जब मनुष्यकी पाशविक चालें दूर हो जावें तथा मानुषिक ढङ्ग आजावें तब मनुष्य बनेगा नहीं तो बनना बड़ा कठिन है । मनुष्यतासे ही मुक्ति हुआ करती है । भौति भौतिके भेष बनाने और राख मलनेसे कदापि मनुष्यता नहीं आती । जब मनुष्य मनुष्यताको ग्रहण करता है तब उसको सत्यगुरु मिलता है उसको मनुष्यताका वस्त्र पहनाता है वे मानुषिकवस्त्र पहनाने-वाले गुण ये हैं—धीरज, दया, शील, विचार और सत्य ।

जब सत्यगुरु देखता है कि 'यह मनुष्य अब, मनुष्य हुवा । तब यह पाँचों वस्त्रका उपहार प्रदान करता है । इन वस्त्रोंको पहनकर मनुष्य अमर तथा अजर हो जाता है । उसके आवागमनका बन्धन टूट जाता है । इन सब भली आदतोंको मनुष्य ग्रहण करता है । १—माँस नहीं खाता है । २—किसी नशेको व्यवहारमें नहीं लाता है । ३—विषयसम्भोगमें लिप्त नहीं होता है । ४—सांसारिक कष्टोंको ध्यानमें नहीं लाता है । ५—अचेत होकर सोया नहीं करता है । ६—मोह उसमें प्रवेशित नहीं होता है । ७—सत्य बोलता है । ८—बिना विचारके कोई काम नहीं करता है । ९—प्रत्येक जीवपर दया करता है । १०—सब कार्योंको बीरताके साथ करता है । ११—सिवाय उस सर्वशक्तिमान् जगदीश्वरके और किसीसे कोई आशा न करे । १२।मिथ्या तथा सत्यगुण तथा अवगुणको फभलीप्रकार पहचानकर स्वीकार करे । १३—भ्रम तथा धोखेमें न पड़े । १४—बुद्धि और ज्ञानकी प्रतिमूर्ति बन जावे । १५—अपने गुरुपर विश्वास

करे । १६-गुरुकी सेवा तथा कृतज्ञता करे । १७-कुल फलदायक वस्तुओंको तुच्छ जाने । १८-स्वच्छरूपसे विचार करे ।

समस्त मानषिक गुण हों, जो तीन गुण हैं-काम, क्रोध और बुद्धि सो उस बुद्धिसेही समस्त देवतागण हैं, काम क्रोधसे समस्त पशुगण हैं । क्रोधसे नार-कियोंका शरीर है । मनुष्य तीनों गुणोंसे विभूषित है । यदि यह बुद्धिकी ओर, ध्यान दे तो देवता है । यदि यह काम क्रोधही को ओर झुके तो पशु है, क्रोध को ओर झुके तो नारकी है । इस कारण इसको उचित है कि, बुद्धिकी ओर ध्यान देकर मनुष्यताकी श्रेणीपर अधिकृत होकर हंसस्वरूप हो जावे उसीको मनुष्य कहते हैं ।

बीजक साखी ।

कबीर - मानुष जन्म पायके, चूके अबकी घात ।
जाय परे भवचक्रमें, सह्यो घनेरी लात ॥ ११२ ॥

कबीर साहिब कहते हैं कि, मनुष्य जन्म पाकर जो अबकी चूक गये तो फिर भवचक्रमें पड़ो वहाँ अनेको लाते खाओ यानी अपने उद्धारके बिना किये मर जायेंगे तो भव सागरमें पड़ जाओगे वहाँ अनेकों देहोंको धरकर सुख दुख भोगते फिरों ॥ ११२ ॥

कबीर - दुर्लभ मानुष जन्म है, होय न दूजी बार ।
पक्का फल जो गिर पड़ा, बहुर न लगै डार ॥ ११४ ॥

मनुष्य जन्म बड़ा दुर्लभ है, दुवारा नहीं होता यह जानते हो कि, फल पककर जब पेडसे गिर जाता है तो फिर वो डार पर नहीं लग सकता ॥

कबीर - मानुष हो कोई मुवा नहीं, मुवासो डंगर धूर ।
कोई जीव ठौरन लागियो, भयो सो हाथी घोर ॥ १०८ ॥

जो मनुष्य बनकर अमर बन गया वही मनुष्य है, जिसने मनुष्य होकर भी अपना बचाव नहीं किया मरा ही वो मनुष्य नहीं निरा पशु है । जो अपने ठिकाने पर नहीं पहुँच सका वो चँटीसे लेकर हाथी तक बनता चला जाता है । कभी छुटकारा नहीं पाता ॥ १०८ ॥

कबीर - पाँच तत्त्वको पूतला, मानुष धरिया नाम ॥
एक तत्त्वके बिचले, व्याकुल भया सब ठाम ॥ २३ ॥

पृथिवी, पानी, तेज, वायु आकाश इन पाँचों तत्वोंका बना हुआ पुतला यह देह है जिसका मनुष्य नाम रख छोड़ा है । एक तत्त्वके विछुरते ही सब जगह व्याकुल हुआ फिरता है यानी इसे राम तत्त्वका भान नहीं रहा इस कारण भटकता फिरता है ॥ २३ ॥

कबीर—मानुष वेचारा क्या करे, कहै न खुलै कपाट ।

श्वान चौक बैठायके, फिर फिराय पन चाट ॥ ११० ॥

जब उसे कहनेपर भी बोध नहीं हो तो वो क्या करे ? क्योंकि, कुत्तेको चौकपर बिठानेपर भी वो बारंबार चौकेके चूनको ही चाटता है यानी समझानेपर भी मनुष्य नहीं समझते बारंबार कुत्तेकी तरह विषयोंमें ही मरते हैं ॥११०॥

कबीर मनुष वेचारा क्या करे, जाको शून्य शरीर ।

जूझ झॉक नहि ऊँचिए, कहें पुकार कबीर ॥ १११ ॥

वो मनुष्य क्या करेगा जिसके दिलमें धोखा ही ब्रह्म बनकर बैठो हुआ, है, जिसके कि, हृदयमें अणु मात्र भी प्रकाश नहीं है वो यह समझता हुआ भी कि, इनमें कुछ भी सार नहीं है फिर भी फँसा रहता है वो छुटकारेका उपाय नहीं करता ॥ १११ ॥

कबीर—पूरब उग पच्छिम अयै, भखै पवनको फूल ।

ताहू राहू ग्रासिए, नर काहे को भूल ॥ २३१ ॥

जो सूर्य पूर्वसे उदय होकर पश्चिममें छिप जाता है खानेके लिये भी पवनका ही लहरिया है पर उसको भी राहू ग्रसता है फिर मनुष्य क्यों भूल रहा है कि, मैं ऐसाही रहा आऊँगा ॥ २३१ ॥

कबीर—राम सुमिरिए क्यों फिरे, और की डौल ।

मानुष केरी खालड़ी, ओढे देखा बैल ॥ २७५ ॥

राम राम भी कहते सुनते हैं दूसरोंसे शास्त्रार्थ भी करते फिरते हैं, बिना सोचे समझे दूसरोंके पीछे फिर रहें हैं वे बैल मनुष्यकी खालको ओढें फिरते हैं ॥ २७५ ॥

कबीर—मानुष तेरा गुण बड़ा, माष न आवे काज ।

हाड़ न होते मरनको, त्वचा न बरजत पाज ॥ १९५ ॥

ए मनुष्य ! तू देहाभिमान क्यों कर रहा है, क्या यही तेरा बड़ा गुण है कि, तेरा मांस भी निकम्मा है, हाड़ भी किसी कामके नहीं, उनके भी आभरण नहीं बनाये जाते । न चामसे बाजे ही मढे जाते हैं ॥ १९५ ॥

कबीर—मानुष तेई बड़ पापिया, अच्छर गुरुहि न मान ।

बारबार बनको कहे, गर्भधरे चौखान ॥ १०८ ॥

एक मनुष्य ? तू बड़ा पापी है तूने अकाल पुरुष अक्षरका कहना भी न माना, जैसे बनकी मुर्गी चारों ओर अण्डे देती फिरती है उसी तरह तू भी जनता जन्माता रहा चौरासी लाखमें भ्रम २ करके दुख पा रहा है ॥ १०८ ॥

फुटकर-कबीर-जेहि बेरियां साई मिले, ताहि न भावे और ।

सबको सुखदे शब्द कर, अपनी अपनी ठौर ॥

कबीर-मनुष बेचारा क्या करे, जाका हृदया सुन्न ।

श्वान चौक बिठायके, फिर फिर चारै चुन्न ॥

कबीर-अंकुर भखै सो मानों, मांस भखै सो श्वान ।

जीव बधे सो काल है, सदा सो नरक निधान ॥

जिसका सत्य पुरुष वा उसके प्यारे मिल गये उसे दूसरा कुछ भी अच्छा नहीं लगता क्योंकि, अपने दिव्य शब्दसे सबको सुख देते हुए अपने सच्चे स्थान-पर कर देते हैं । जिस मनुष्यका हृदय सूना हो वो विषयलंपट न हो तो क्या करे? क्योंकि, कुत्तेको जब चाहो तब चौक बिठा देखो वो मोका मिलतेही चूनही चाटेगा । अंकुरोंका भोजन करनेवाला मनुष्य तथा गोशतखोर कुत्ता एवम् जीवघाती काल है जो जीव हत्या करता है उसे अवश्यही नरक होगा, इसमें अणुमात्र भी सन्देह नहीं है । कहे हुए चारों तरहके पशुओंमेंसे किसीमें भी बुद्धि नहीं है इसी कारण वे सदा आवागमनके चक्करमें फँसे रहते हैं ।

निर्बुद्धिताके अङ्गकी साखियाँ ।

कबीर- 'अकलविहीना आदमी, जानै नहीं गँवार ।

जैसे कपि परवश परा, घर घर नाचै बार ॥

कबीर- अकलविहीना सिंह, ज्यो गया सत्यके संग ।

अपनो प्रतिमा देखके, भयो जो तनको भङ्ग ॥

कबीर- अकलविहीना अंधगज, पन्यों फंदमें आय ।

ऐसेही सब जग बंधा, कहा कहूँ समझाय ॥

कबीर- पछताता परवश परचो, सुवाके बुधनाहि ।

अकलविहीना आदमी, यों बन्धा जग माहि ॥

कबीर- अकल असँसे उत्तरी, विन्धों दीनी बाँट ॥

एक अभागी रह गया, एकन लीनी छौट ।

कबीर- बिना वसीले चाकरी, बिना बुद्धिकी देह ॥

बिना ज्ञानको जोगना, फिरे लगाए खेह ॥

कबीर- जल पर पावे मछली, कुलपर "भाते बुद्धि ।

जाको जैसा गुरु मिला, ताकी तँसी सुद्धि ॥


१ निर्बुद्धि, २ बंदर, ३ चमकना अस्त्र, ४ मदान्ध हाथी, ५ अयो, ६ ऊपर, ७ परमात्मा, ८ दूसरे बुद्धिमान, ९ जरिये, संसर्ग, १० शरीर, ११ विभूति या साधु व साधु १२ रदी, १३ धरानेके अनुसार, १४ होती है, १५ स्मृति या बुद्धि,