कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
गोरखजीका प्रश्न
रमैनी—सतयुग तप कीन्हे रघुराजा । कारन कर्म नन्द घर गाजा ॥
एक नांरि रघुवर दुख पावा । सोलह सहस गोपि निरमावा ॥
कारन कर्म केलि भव कीन्हा । कुञ्ज कुञ्ज गोपिन सुख दीन्हा ॥
जहँ तहँ गोरस जाय चुरावा । जहँ जहँ कर्म तहाँ ले खावा ॥
कर्म कंस ठीका आयो जबहीं । मारन कृष्ण विचान्यो तबहीं ॥
कर्म पूतना भेष बनायो । कर्म पयोधर कृष्ण लगायो ॥
कर्म कारण जो तहाँ सिधारा । कारन कर्म पीव विषधारा ॥
मारि तासु कीन्ही गति चारा । कर्म फाँस बोन्यो संसारा ॥
कर्म इन्द्र बरस्यो दिन साता । कर्म कृष्ण गिरि लीन्यो हाथा ॥
कर्महि मारि विध्वंस जो कीना । कर्म फाँस सबही आधीना ॥
कुबजा कछु कर्म जो कीन्हा । कारन कर्म कृष्ण गति दीन्हा ॥
कर्म पाताल कालेश्वरनाथा । साँवर अङ्ग भयो तेहि साथा ॥
अश्वमेध यज्ञ करत बलिराजा । कर्म ते जाय पाताल विराजा ॥
कर्महि बावन रूप बनाया । बलि राजापै दान दिवाया ॥
कर्म अहूठ नापि पग लीन्हा । तीनैं पग तीनों पुर कीन्हा ॥
आधा पाँव कर्म अधिकारी । बाँधि नृपति पातालहि डारी ॥
जहँ लगि जीव जन्तु उत्पानी । तहँ लगि कर्म राय परबानी ॥
कर्म फाँसते कोई न छूटे । कर्म पाँस सबहिन घर लूटे ॥
साखी—कर्म फाँस छूटे नहीं, केतौ करो उपाय ।
सद्गुरु मिले तो ऊबरै, नहीं तो परलय जाय ॥ ३ ॥
रमैनी—जो कुछ कर्म जगतमें करई । करि करि कर्म बहुरि भवपरई ॥
एक न होय यज्ञ व्रत ठाना । एक न पाप पुण्य पहचाना ॥
एक कर्म कुल लीन्ह उठाई । कर्म अकर्म न जानै भाई ॥
एक छापा और तिलक बनावै । पहिरि मेखला साधु कहावै ॥
वैष्णव होय करे षट् कर्मा । वेद विचार सदा शुचि धर्मा ॥
कथा पुराण सुनै चितलाई । कर्महि सुमिरै बहुविधि भाई ॥
विष्णु सुमिरि तब बहुविधिकियो । सो निःकर्म विष्णु नहीं भयो ॥
कर्मकी डोरि बँधा संसारा । क्यों छूटे उतरे भवपारा ॥
एक अभङ्ग एकादशी करई । तन छूटे वैकुण्ठहि तरई ॥
यह वैकुण्ठ न स्थिर होई । अन्त कर्मगति परलय सोई ॥
करै कर्म वैकुण्ठहि जाई । कर्म घटे भव जल फिरि आई ॥
योगी योग कर्मको साथे । किरिया कर्म पवन आराधे ॥
योगी कर्म पवनको किरिया । भुगतै कर्म देहु पुनि धरिया ॥
संन्यासी जो बन बन फिरही । होय निःकर्म कर्म फिर परही ॥
जीयत दग्ध देहको करई । जटा बढाय व्यसन परिहरई ॥
कोई नगन कोई वज्र कछोटा । भरमत फिरै सहे पग ढोटा ॥
राजद्वार पावै औतारा । भुगतै कर्म अकर्म व्यवहारा ॥
पण्डित जन सब कर्म बखानी । नख शिख कर्म फाँस अरुझानी ॥
कर्म धर्मकी युक्ति बतावे । दान पुण्य बहुविधि अरथावे ॥
वज्र दानले जन्म गँवावे । होई ऊँट बहु भार लदावे ॥
एक जो करे बरत अवतारा । होइहै शूकर स्वान सियारा ॥
शूकर श्वान हो कर्म जो भुगता । विन निःकर्म न होईहैं मुकता ॥
साखी-कबीर-बहुबन्धनसे बांधिया, एक विचारा जीव ।
जीव बेचारा क्या करे, जो न छुडावे पीव ॥
रमैनी-शब्द भेद निःशब्द बताओं । करि निःकर्म हंस मुकताओं ॥
निरालम्ब अवलम्ब न जाने । शब्द निरन्तर भेद बखाने ॥
पाप पुण्यकी छोड़े आशा । कर्म धर्मते रहे उदासा ॥
रहे उदास नाम लौ लाई । तत्त्वभेद निःतत्त्व समाई ॥
तीरथ व्रतके निकट न जाई । भरम भूतको दर्ई बडाई ॥
सुख सम्पति नहिं विपत्तिविचारे । काम क्रोध तृष्णा परचारे ॥
क्रिया कर्म आचार विसारे । होय निःकर्म कर्म निरवारे ॥
सो ग्रहै जो निग्रह काया । अभि अन्तरकी मेटै माया ॥
शील स्वभाव शरीर बसावे । अन्तर स्थिर ध्यान लगावे ॥
ब्रह्म अग्नि मनमें परजाले । ताको विष्णु चरन परछाले ॥
गहै तत्व निःतत्व विचारा । काम क्रोधको करै अहारा ॥
सहज योग सो योगी करई । कर्म योग कबहुँ नहिं परई ॥
धन योवनकी करै न आशा । कामिनि कनकसे रहे उदासा ॥
चहुँ दिशि मंसा पवन ककोले । ज्ञान लहर अभ्यन्तर डोले ॥
उन मुनि रहे भेद नहिं कहई । तत्वभेद निःतत्वहिं लहई ॥
जो कोई आय अग्नि होय दहई । आप नीर होय नीचा बहई ॥
मन गयन्द गुरुमतसे मारा । गुरु गम लूटे ज्ञान मँडारा ॥
भरा होय सो सन्मुख जूझै । भोदू शब्द भेद नहिं बूझै ॥