कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
गरीब दास
ज्ञानी देखा दृष्टि पसारी । यहि ते नहीं बचे संसारी ॥
ज्ञानी बोले शब्द परचाई । तुही काल खाये दुनियाई ॥
निरञ्जन बचन
साखी—जाव ज्ञानी घर आपने, मानो बचन हमार ।
तीन लोक मोहि पुरुष दिये, स्वर्ग पताल संसार ॥
ज्ञानी बचन
चौ०—ज्ञानी बोले शब्द अपारा । मोकहैं पुरुष दीन टकसारा ॥
साखी—हम पठये हैं पुरुष को, करें हंसको काज ।
काल मारि संधार हूँ, दीन सकल मोहि राज ॥
चौ०—मारूँ काल शब्दके झारा । टूटै दन्त कबीर पसारा ॥
निरञ्जन बचन
तबै निरञ्जन बोले बानी । कैसे हंस छोड़ाये ज्ञानी ॥
जगके माँहि कीन हम बासा । पशु पछी सबमें मम आसा ॥
तीनसो साठ पेट हम लाई । ताते सकल सृष्टि अरुझाई ॥
जेहि दिनते सो पेट लगाई । दिनदिन अरुझे सरुझि नहिं जाई ॥
तापर काम क्रोध हम डारा । तृष्णा सकल जीव हम मारा ॥
इनमें जीव बँधे सब झारी । कैसे हँसने लेहु उबारी ॥
ता ऊपर कीन्हचों यक काजा । पुण्य पाप हम थापै राजा ॥
शुभ अरु अशुभ दोइ दलसाजा । ऐसै अलख निरञ्जन राजा ॥
ज्ञानी बचन
सत्य शब्द हम बोलें बानी । बचन हमार छूटिहैं प्रानी ॥
गहे शब्द मम मन चित लाई । भजे काल जिव लेब बचाई ॥
काल बचन ।
तबै काल अस बोले बानी । सकल जीव बस हमरे ज्ञानी ॥
तीनसौ साठ क्षेत्र अरुझाई । कैसे जीव लेहो मुकताई ॥
गङ्गा यमुना सरस्वती जानी । पुष्कर गोदावरि छौछक्का मानी ॥
बदरी केदार द्वारिका ठयऊ । जहाँ तहाँ हम तीरथ लयऊ ॥
मथुरा नगर उत्तम जो जानी । जगरनाथ बैठे यमध्यानी ॥
सेतु बन्ध पुनि कीन्ह ठिकाना । पुष्कर क्षेत्र आहि यमथाना ॥
हिङ्गलाज जैसे जिव सोई । कालिका नगरकोटमें होई ॥
गढ़ गिरिनार दत्तको थाना । ताहि घेर यम बैठ निदाना ॥
कमरू मांहि कमक्षा जानी । नीमक्षार मिश्री यम खानी ॥
नगर अयोध्या राम हैं राजा । कहहि दैतें बांधे सब साजा ॥
यही पैठ जग जीव भुलाई । केहि विधि जीव लेहु मुक्ताई ॥
ज्ञानी वचन
तब ज्ञानी बोले अस बानी । यमते जीव छोड़ैहौं आनी ॥
पुरुष नाम कहूँ समझाई । यम राजा तब छोड़ि पराई ॥
घाट बाट बैठे अरु झेरा । हमरे शब्दते होय निबेरा ॥
सुनुरे काल दुष्ट अन्याई । शब्द सन्धि हंसा घर जाई ॥
निरञ्जन वचन
केहि ज्ञानी देहु अधिकारा । हमसे नहि छूटे यम जारा ॥
पाँच पचीस तीन गुण आई । पहले सकल शरीर बनाई ॥
तामें पाप पुण्यका बासा । मन बैठे ले हमरो फाँसा ॥
जहाँ तहाँ सब जग भरमावे । ज्ञान सन्धि कछु रहन न पावे ॥
एक शब्दके केतक आसा । हमरे हैं चौरासी फाँसा ॥
ज्ञानी वचन
बोले ज्ञानी वचन विचारी । छूटे चौरासीकी धारी ॥
छूटे पाँच तीस गुण तीनी । ऐसो शब्द पुरुष मोहि दीनी ॥
निरञ्जन वचन
हो ज्ञानी क्या करो बड़ाई । हमते नहीं छूटि जिव जाई ॥
इतने युग हम तुम नहि पेखा । ज्ञानी हंस न एको देखा ॥
क्या तुम करो क्या शब्द तुम्हारा । तीनलोक परलय करि डारा ॥
साधु सन्त हम देखा रीता । परलय परे सकल जग जीता ॥
करम रेख बांधे सब साधू । सुरनर मुनी सकल जग बाँधू ॥
ज्ञानी वचन
ज्ञानी कहैं काल अन्याई । शब्द बिना तैं खाइ चबाई ॥
अब कैसे कहिये बटमारा । पुरुष शब्द दीना टकसारा ॥
जग जीवनको लेउँ उवारी । करम रेख तोरौं धरि न्यारी ॥
तीन सौ पाँच और गुण तीनी । तेहिंते हंसा लेइहौं छीनी ॥
पाँच जनैकी मेटूं आसा । पुरुष शब्द भाषूं विश्वासा ॥
शुभ अरु अशुभको करूँ निबेरा । मेटूं काल सकल अरुझेरा ॥
निरञ्जन वचन
निर्गुन काल तो बोले बानी । अरुझे जीव सकल यमखानी ॥
कैसेके तुम शब्द पसारो । कौन विधि तुम जीव उबारो ॥
ऐसे जीव सकल है धरनी । कैसे पहुँचे पुरुषकी शरनी ॥
जगमें जीव क्रोध विकारा । कैसे पहुँचे पुरुष दुवारा ॥
क्रोधी जीव प्रीति अभिमानी । धरे सो जन्म नरककी खानी ॥
लोभी होय सर्व विकारा । माटी भस्ने जीव अधिकारा ॥
लोभी जन्म शूकर औतारा । कैसे पावे मुक्ती द्वारा ॥
विषया विष सब विषकी खानी । यह सब है जनमकी सहिदानी ॥
ज्ञानी वचन
ज्ञानी कहैं सुनो बरियारा । हमतो कीन सकल निर्धारि ॥
जो कोइ प्राणी होय हमारा । काम क्रोधते रहे निनारा ॥
तृष्णा लोभ सब देइ बहाई । विषय जन्म तब दूर पराई ॥
उनको ध्यान शब्द अधिकारा । काम क्रोध सब होत निनारा ॥
नाम ध्यान हंसा घर जाई । कहा दूत यम करे बडाई ॥
उनपर यमकी परे न छाहीं । ताते हंस लोकको जाहीं ॥
निरञ्जन वचन
कहैं निरञ्जन सुनोहो ज्ञानी । कथिहौं ज्ञान तुम्हारी बानी ॥
जगत महात्म सबै बताई । नाम तुम्हारे पन्थ चलाई ॥
जगके जीव सभी भरमाऊँ । ज्ञानवन्तको करम दूढाऊँ ॥
मारि जीवको करूँ अहारा । कथूँ ज्ञान तुम्हरे टकसारा ॥
ज्ञान हमार रहे तन छाई । ते सब जीव काल धरि खाई ॥
कैसे जैहैं लोक तुम्हारे । ज्ञान सन्धिमें मूँदूँ द्वारे ॥
ज्ञानी वचन
ज्ञानी कहैं सुनौ बरियारा । हमरे हंस होई हैं न्यारा ॥
नाम जपै औ सुरति लगाई । मैल करम लागे नहिं भाई ॥
निरञ्जन वचन
ज्ञानी मोरा पिरियल ज्ञाना । वेद कितेब भरम हम साना ॥
यह विधि जगके जीव भुलाई । जरा मरण सब वन्द्य बँधाई ॥
सूतक पातक वेद विचारा । पूछे वेद तब करैं सँभारा ॥
एकादशी मुक्तिकी माई । यो युक्ति करिबे अधिकाई ॥
ज्ञानी बचन
सुनुहो काल ज्ञानकी सन्धी । छोडे जीव सकलकी फन्दी ॥
जब निज हंसा बीरा पावै । योग युक्ति तब सबै नसावै ॥
वेद कितेबकी छोडो आशा । हंसा करें शब्द विश्वासा ॥
योग यज्ञ तप होईहै छारा । अमृत नाम सदा रखवारा ॥
शब्द हमारे छूटे फन्दा । पहुँचे लोक मिटे यम द्वन्दा ॥
आवागमन बहुरि ना होई । काल फन्द तजि न्यारा सोई ॥
निरञ्जन बचन
ज्ञानी कहो मर्म सोई भाई । मेरो फन्द तोरको जाई ॥
कर्म जञ्जीर धांबि संसारा । योनी हम जञ्जाल पसारा ॥
तीन लोक योनी उत्तरि हैं । आवागमन फेरि फिरि परि हैं ॥
सिद्ध साधु और बड बड ज्ञानी । बाँधि बाँधि कीन्हा पिसमानी ॥
कर्म रेखते कोई न न्यारा । तीन देव सुर असुर पसारा ॥
ज्ञानी बचन
ज्ञानी कहें सुनु काल पसारा । करिहैं दूर जञ्जीर तुम्हारा ॥
हंसन लेइहैं तुरत उबारी । पुरुष शब्द दीना मोहिं मारी ॥
खण्ड खण्ड तोरूँ तोरवाना । मारूँ काल करूँ पिसमाना ॥
पुरुष अंश नौतम है अंशा । तेजमें प्रकट कहावै वंशा ॥
तिन्हके शरण हंस जो जाई । काटि कर्म सब देहिं बहाई ॥
निरञ्जन बचन
मान्यो ज्ञानी बचन तुम्हारा । हंस ले जाव पुरुष घरबारा ॥
चौदह काल काल यम मेरा । घाट वाट घेरें सब घेरा ॥
सुरनर मुनि आवें वहि घाटा । दश औतार जाँय वहि वाटा ॥
दुष्ट जगाती बड सरदारा । विना जगात न होइ कोई पारा ॥
भव जल नदी घाट नहिं थाहूँ । उत्तरन काज किये सब काहूँ ॥
ज्ञानी बचन
वंश छाप जो पावें प्राणी । ताको नहिं रोके दूग दानी ॥
शब्द सार दे हंस बहोरी । तेहि चढ़ि जाय काल मुख तोरी ॥
निरञ्जन बचन
हो ज्ञानी क्या करो बडाई । तमके काल निरञ्जन राई ॥
पौंव पताल शीश आकाशा । सोलह योजन अग्नि प्रकाशा ॥
नौबाब विजलीखां, रविदास
गरजै काल महा विकरारा । सत्रह लक्षलों पाँव पसारा ॥
लपक जीभ यम टूटे तारा । यह बिजली चमकै अधिकारा ॥
ओंठ भयावन दन्त अतिबाढा । मध्य घेर ज्ञानीको डाढा ॥
हमरो पौरुख हम बरियारा । तुम ज्ञानी क्या करो हमारा ॥
ज्ञानी बचन
ज्ञानी पुरुष शब्द कियो जोरा । पकडे दन्त मुण्ड घुमेरा ॥
मान्यो शब्द पाय कर पेले । तोन्यो सुण्ड समुन्दर मेले ॥
पुरुष स्वरूप तबहीं पुनि धारा । योनि स्वरूप काल औतारा ॥
निरञ्जन बचन
भया अधीन काल करचोरी । तुम सत्पुरुष हम अंश तुम्हारी ॥
तुमसे बाल बुद्धि हम धारा । तुम जीवनके तारन हारा ॥
तुम सत्पुरुष दीन्ह मोहि राजू । अरु मोहि दीन्ह सकल सुख साजू ॥
अब लगि साहब हम नहि चीन्हां । सत्यपुरुष तुम दर्शन दीन्हा ॥
दोउ कर जोरि चरणचित लावा । धन्य भाग्य हम दर्शन पावा ॥
अब मोहि साहब देव बताई । पाऊं चिह्न वंश मुकताई ॥
ज्ञानी बचन
साखी—जो निज मेरा पाइ है, आवे लोक हमार ।
ताको खूट तु मत गहो, सुनो काल बट मार ॥
निरञ्जन बचन
चौ०—हे साहब एक विनती मोरा । वेंरा पायकरहु कछु औरा ॥
ज्ञान कथे अन्ते चित सासा । आवागमनको राख्यो आसा ॥
ज्ञानी बचन
सुनो निरञ्जन बचन हमारा । नहीं हंस वह जीव तुम्हारा ॥
काल बचन
कहे काल तुम भली निकारी । सन्धि देख हम क्रोध उतारी ॥
कीन्ह दण्डवत् और प्रणामा । सुन्न शिखर कीन्ह्यो विश्रामा ॥
ज्ञानी बचन
धर्मदास तब मनमें आई । गाहुर देशमें धारा पाई ॥
सतयुग सत्यनाम मम नाऊ । देही धरि मैं मनुष कहाऊँ ॥
प्रथमैं सतयुग लागा भाई । नूप हीचन्द दे तहाँको राई ॥
तहँवा जाय शब्द गोहराई । जो चीन्हें तेहि लोक पठाई ॥
इससे पाठकोंको अच्छी तरह मालूम हो गया होगा कि, सत्य पुरुष ही कबीर हैं । सद्गुरुके मुखसे निकले हुए वाक्योंको अच्छी तरह समझो उसके बिना दूसरा कोई भी उसे परास्त नहीं कर सकता ।
यहाँपर इस विषयके लिखनेसे मेरा यही अभिप्राय है कि, पाठकगणोंको विदित हो कि, यह वही कबीर साहब हैं जिनके सम्मुख निरञ्जन तथा आद्याका गर्व चूर्ण हो गया । फिर दूसरा कौन है एवं उसमें क्या सामर्थ्य तथा बल है जो इनकी समता कर सकता है, इस कबीरके सम्मुख किसका गर्व रह सकता है, ये दोनों बड़े बलिष्ठ तथा प्रभावशाली थे परन्तु कबीर साहबके चरणोंपर गिरकर आधीन हुए । ऐसे कबीर साहबको जो "मनुष्य" जाने यह उसकी भूल है क्योंकि वे मनुष्य नहीं हैं । सत्यपुरुष हैं स्वयम् मालिक धनी हैं । यह अन्धा जीव उनको पहचानता नहीं, इसी कारण भवसागरमें पड़कर गोते खाया करता है । जो मनुष्य होगा वह अवश्यही विचार करेगा कि, आद्या तथा निरञ्जन जैसे सर्वशक्तिमान् संसारके सिर्जनहार जिसके चरणोंपर गिरकर नम्रता करें वह "मनुष्य" कैसे ठहर सकता है ? वह तो निस्संदेह स्वयम् सत्यपुरुषका प्यारा भक्त है जिसे सत्य-पुरुषने अपनी समता दे रखी है; दूसरा कोई नहीं है ।
वेही कबीर साहब पृथिवीपर आकर मनुष्योंको उपदेश करते हैं । फिर जो कोई उससे विमुख हुआ उसका कहाँ ठिकाना रहा ? वह निश्चयही आद्या तथा निरञ्जनके आधीन होगा । जो स्वयम् विमुख होगा उसका तो यह दण्ड है । जो स्वयम् विमुख नहीं है पीछेसे उसके अनुयायीही विमुख हुए हैं तो वे आचार्य्य निपराध ठहरेंगे, केवल उनके अनुयायीही दण्ड पावेंगे । इस लिये उन्हें भी भिन्न पन्थमें रहकर भी सच्चे गुरुकी भवितसे विमुख न होना चाहिये । नाम मालामें भी यही विषय आया है उसको भी यहीं उद्धृत करते हैं —
नाममालाका संक्षेप
कबीर-कथा रसाल' कहीं कछु वाणी । जो बूझे सोई ब्रह्मज्ञानी ॥
यह गुरु गम' सन्त कोई लेखे । प्रकट ज्ञान तब तत्त्व परेखे' ॥
अनुभवादि कछु कहूं वखानी* । सुनिये सद्गुरु गमकी' वाणी ॥
अनन्त कोटि युग एक चलि गयेऊ । अचल अमान' तत्त्वमें रहेऊ ॥
साठ कोटि युग और जो बीता । सृष्टि करन तब इच्छा कीता* ॥
वह तो पुरुष अचल बेअन्ता । बिन गुरु दया न भज भगवन्ता ॥
कोटि कथै कछु कथन न पावै । जब लगि नहिं गुरु गम वतलावै ॥
साखी पद कोटिन बहु वाणी । पुरुष एकको सुमिरौ प्राणी ॥
ज्ञान सुरति औ शब्द अपारा । यह सब दिया तब किया पसारा ।
अचल पुरुष सुमिरे जो कोई । जीवितमुक्ति^१^ तासुकी होई ॥
साखी पद बोले बहु वाणी । आदिनाम कोई विरला जानी ॥
साखी—कहैं कबीर निज नाम विनु, मिथ्या जन्म गवौंय ।
निर्भय मुक्ति निःअक्षर^२^, गुरु विनु कबहुँ न पाय ॥
चौ०—अगम अगोचर अति व्यवहारा । कहन सुननसे होवैं पारा ।
यह धन राखि जीवकी नौई । करो बणिज टोटा कछु नाहीं ॥
यह पूँजी है अगम अपारा । खरचै खाय बडे विस्तारा ॥
यह धन मिले जब भाग बडेरा । धन सञ्चित गाँहक भितेरा ॥
साखी—पूँजी मेरा नाम है, जाते सदा निहाल ।
कहैं कबीर जो पुरुष बल, चोरी करै न काल ॥
चौ०—जो जो जिव निज नामहि जाना । भये मुक्त सो पुरुष समाना ॥
सोई जीव हंसका लेखा । अक्षर में निःअक्षर देखा ॥
धर्मदास वचन
कह धर्मदास दास के दासा । सद्गुरु मेटो मेरी आसा ॥
नाम निःअक्षर केहि उत्पाना^४^ । अकथ कथा तब कैसै जाना ॥
सत्यगुरु वचन
कह कबीर सुन धर्मनि बानी । अकथ कथा तोहि कहूँ बखानी ॥
तब नहि लोक वेद वस्तारा । तब नहि कूरम नहि संसारा ॥
नहि तब धरणी अमर सुमेरु । नहि तब हते जो इन्द्र कुबेरु ॥
तब नहि सृष्टी सकल पसारा । आप आप थे अकह निनारा ॥
सकल सृष्टि उत्पति कछु नाहीं । तब सब रहे अकहके माहीं ॥
होते आप तब शब्द न सवाला । इच्छा भई तब कीन्ह उँजाला^५^ ॥
इच्छाते अनहद^६^ धुनि बानी । सुरति सम्हार सृष्टि उत्पानी ॥
इच्छा अनुभव शब्द उपाना । सुरति^७^ निरति ता मांहि समाना ॥
तबते अच्छर भेद बिचारा । साखी शब्द कीन संसारा ॥
अकह अचल पुरुष तेहि आपू । नहीं तहां दुःख सन्तापू ॥
सबका मूल वाहि सो लागा । उलटसमाय होई बड़ भागा ॥
निर्भय हो सो करे गुरवाई । गुप्त मता में कहूँ समझाई ॥
१ जीवनमुक्ति, २ रामनाम, ३ अक्षर रहित, ४ उत्पन्न किया, ५ प्रकाश, ६ पराध्वनि या दशमध्वनि, ७ अजपा जापभी ।
साखी-सुरति निरति ले खेलई, रहि सूरति लवलीन ।
कहैं कबीर ते सुरतिसे, निश्चय पुरुषहि चीन्ह ॥
सुरति सँभारे काज है, राखो सुरति सँभार ।
सुरति सँभारे मुक्ति है, जाय पुरुष दरबार ॥
जाके दिल अनुराग' है, पावेगा जन सोय ॥
बिन अनुराग न पावई, कोटि करे जो कोय ॥
बल मेरे यक नामके, सात द्वीप नौखण्ड ॥
यम डरपै भय मानै, गाजि रहा ब्रह्मण्ड ॥
चौ०- सार शब्द जब आवे हाथा । सकल काल तब नावै माथा ॥
नाम अमर मलयागिरि भाई । पीयत विष अमृत होइ जाई ॥
निसि दिन रह मलयागिरिसंगा । विष नहिं लागे तिनके अङ्गा ॥
साखी-काल फिरै सर साधिकै, करमें गहे कमान ॥
कहैं कबीर निज नाम गहि, छोड मान अपमान ॥
चौ०- कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । शब्द बाण है हमरे पास ॥
काहि डरो डर देहैं छुड़ाई । काल डरे सुनि नाम दुहाई ॥
जब हम रहे अकहके माहीं । केहि बोधौ दूसर कोई नाहीं ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । होहु निशङ्क मेटि यम आसा ॥
भयो परकाश गुरु भेद बतावा । जीव बोधिके लोक पठावा ॥
जबते अमर पुरुषको चीन्हा । तबते काल भयो आधीना ॥
साखी-राह पाय जनि, छाडहू, काल रहा शर सांधि ॥
सुरति सँभारे चेतहू, परे न यमका बाध ॥
आदि नाम निज पु रुषको, सुनत तजै अभिमान ॥
कहैं कबीर सुन सन्तहो, तजो नरककी खान ॥
चौ०- कासे कहूँ कहा नहिं जाहीं । मेरी गति' कोई चीन्हत नाहीं ॥
यहां वहां पावैं दोउ ठाऊँ । सत्य कबीर कलिमें मोर नाऊँ ॥
जो था तब कलिमें हम सोई । नाम धरैं भूलै नर लोई ॥
साखी-कोटि नाम संसार में, ताते मुक्ति न होय ।
आदि नाम जपि गुप्तही, बूझै बिरला कोय ॥
चौ०- मुक्ति न होवै नाचे गाये । मुक्ति न होवै मूदङ्ग बजाये ॥
मुक्ति न होवे साखि पद बोले । मुक्ति न होये तीरथ डोले ॥
गुप्त जाप जानें जब कोई । कहैं कबीर मुक्ति भल होई ॥
कथा कीरतन गदगद वाणी । मुक्ति न होय बिना सहिदानी ॥
केता कहूँ कहा नहि जाई । नाम गहे सो पुरुष मिलाई ॥
सार शब्द परवाना दइहैं । जीव छोडाय कालते लइहैं ॥
साखी—जैसे फण पति मंत्र लखि, फणको रहे सकोरि ।
तैसे नाम कबीर लखि, काल रहे मुख मोरि ॥
जो जन होइहैं जौहरी, सो धन लेई बिलगाय ॥
सोहं सोहं जपि मुये, मिथ्या जन्म गँवाय ॥
साखी पद संसारमें कहन सुननको दीन ।
जाको चीठी मूलकी, सोले साधन कीन ॥
चौ०—कोटि यतन कर जिव समझावे । भाग बिना सो नाम न पावे ॥
गुरुकी सन्धि सन्त तेहि पासा । सो नहि परे कालके फाँसा ॥
आदि पुरुष अपना कर जाना । सोई भक्ति अन्तरगत ठाना ॥
तुमको दीनी भगति अपारा । नाम अजर तुम जपो हमारा ॥
जो नहि बूझे कहा न करई । मुक्ति न होय नरकमें परई ॥
श्रवणनमें कह दीन्हा नाऊँ । ताहि बोलहू अपने ठाऊँ ॥
नाम सुनै औ मोंको जाने । यमराजा तेहि देखि डेराने ॥
मेरो नाम अमर है भारी । ताहि नामको राखु सँभारी ॥
तजि अभिमान मिलै जो आई । ताको दीजै नाम दूढाई ॥
सब तजि रहनि रहे ठहराई । और तजे सब लोक बढाई ॥
ताको दीजे वस्तु अपारा । कह कबीर सुनु शब्द हमारा ॥
गलित गरीबी रहन सम्हारे । तन धन मन सन्तनपर वारे ॥
लोक लाज कुल तेज बढाई । तब पग परस भरम मिटि जाई ॥
बिन विश्वासन भगति प्रकासा । प्रीति बिना नहि दुबिया नासा ॥
गुरुते शिष्य करे चतुराई । सेवाहीन नरकमें जाई ॥
वारै तन मन औ धन धाना । सोई सन्त मेरे मन माना ॥
कहैं लगि कहूँ वार नहि पारा । नाम गहे सो सन्त हमारा ॥
आदि नाम है शरकी गौसी । लागै बान पडा रह जासी ॥
जब लगि भक्ति अङ्ग नहि आवै । सार शब्दसो कैसे पावै ॥
सत्यनाम श्रवन धुनि होखे । जो मतवाला ताको पोखे ॥
साखी—सुरति समावे नाममें, जगते रहे उद्दास ॥
कहैं कबीर गुरुचरण (में), दूढ राखै विश्वास ॥
चौ०—जगमें जेते हैं विश्वासी । माया आहि ताहिकी दासी ॥
जाके दिल विश्वास न आवे । भक्ति अङ्ग सो कैसे पावे ॥
जो जिव मायासे मन लावे । गहे काल मुख बात न आवे ॥
साखी—गुरुकी, शब्द साधुकी पूंजी, वनिज करे जो कोय ॥
कहैं कबीर सवाई बढे, हानि कबहुँ ना होय ॥
चौ०—जाको है गुरुको विश्वासा । निश्चय जाय पुरुषके पास ॥
कहैं कबीर मिलै विश्वासी । बिन विश्वास है यमकी फांसी ॥
सोहं कोहं आये संदेशा । सो गुरु दीन्हो मोहिं उपदेशा ॥
ताको मर्म जान जो पावे । सो तो नहिं भवसागर आवे ॥
गुरुको शब्द जीव दूढ धरई । सोई सन्त भवसागर तरई ॥
होई न दास धरै अभिमाना । ताहि न दीजै अनुभव ज्ञान ॥
नाम मालमें परिचय आने । सकल सन्तमें सद्गुरु जाने ॥
साखी—पुरुष सबनते न्यार है, और सबनके माहिं ।
ज्ञान दृष्टि करि देखहूँ, साखी पदमें नाहि ॥
साखी पदमें सो पढें, पुरुष बसे तेहि पार ॥
पोथी वाणी भेष बहु, सो सबहिन ते न्यार ॥
गुरु पूरा सुख शूरा, बाग मोडि रण पैठ ।
सत्य सुकृतको चीन्हके, एक तख्त चढ़ि बैठ ॥
सुकृतआदिभेदसे ग्रन्थ ।
चौ०—चले ज्ञानी समरथ शिर नाये । मकर तार होय तिरबेनी आये ॥
जहाँ काल बैठा अन्याई । ज्ञानी बेगि तहाँ चलि आई ॥
देखि काल बहुतै दुख पावा । उठि ज्ञानीके सन्मुख धावा ॥
कौन अंश तुमहो बटपारा । हमरे झांझरिमें पग धारा ॥
ज्ञानी वचन
कहैं ज्ञानी जनि जाव भुलाई । सोहं पुरुष सन्धि हम लाई ॥
समरथ हुकुम मान तुम भाई । नहिं तो बांध तोहिं ले जाई ॥
अब जनि भूलो मूर्ख गँवारा । छिनमें करूँ तोर संहारा ॥
यह सुनि काल उठा रिसियाई । विकल रूप होइ सन्मुखधार्ई ॥
बारह बाण काल ले आई । ज्ञानी शब्दसे लीन्ह बचाई ॥