कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
कबीर साहिबकी शिक्षा
मोटा है जैसे कि, भोगी धनियोंका हो, क्योंकि, बिना भोगके शरीर इतना मोटा कैसे रह सकता है ? आप तो शरीरके लिये भी कोई उद्योग नहीं करते । प्रह्लादजीके बचन सुनकर दत्तात्रेयजीने उत्तर दिया कि, भगवानकी कृपासे अनेक जन्मोंके पीछे मोक्षका द्वार यह मनुष्य देह मिला है । सुख पानके लिये घर गृहस्थ किया करते हैं परन्तु सुखकी जगह दुख देखकर यहाँ एकान्तमें आ बैठे हैं । आत्मप्रकाशका घातक तथा अवास्तविक समझ भोग तथा उद्यमका त्याग करके प्रारब्धपरही सन्तोष कर लेता हैं । सदा स्वरूपमें स्थिर रहकर सबको भुलाये रहता हैं । मुझे मौहरकी मखली और अजगरकी चव्या उत्तम लगी । उसी तरह उस प्रेम मदिरासे परितृप्त हुआ सदा यहीं रहा करता हैं । इसके सिवा और भी लोकोपकारिणी बात हुई जिनपर आरूढ़ होकर मनुष्य उत्तम लोकोंको पा सकता है । वे सब पुराण ग्रन्थोंमें विस्तारके साथ लिखी हुई हैं । प्रेम मदिराके दीवानोंका प्रकरण लेकर यहाँ थोडासा लिख दिया है ।
सनत्कुमार
ये परम भागवतोंमें हैं । इन्होंने निर्द्वन्द्व रहनेके लिये सदा बाल्यावस्था ही स्वीकार की है, ये किसीभी लोकमें आ जा सकते हैं, इनकी गति कहीं भी रुकी हुई नहीं है । हैं ये छोटेसेकी तरह रहनेवालेपर इनका ज्ञान यहाँतक बढ़ा हुआ है कि, नारदजीको भी इन्होंने उपदेश देकर सत्य पुरुषकी भक्तिमें लगाया था । ये सदा उस सुखका अनुभव करते हैं जिसकी कि, एक मात्रामें सारा संसार तृप्त रहता है । इनके जीवनकी अनेकों घटनाएँ उपनिषद् और पुराणोंमें भरी पड़ी हैं । जिन्हें इच्छा हो वो उठाकर देखलें, ये भी परा भक्ति, रूपा प्रेम मदिराको कबीर साहिबके कथनानुसार निकालकर पिये हुए मस्त दीवाने हैं ।
भवतबालक ध्रुव ।
विष्णुपुराणमें ध्रुवजीका वृत्तान्त इस प्रकार लिखा है कि, ध्रुवजी राजा उत्तानपाद चक्रवर्तीके पुत्र थे । जब ध्रुवजीका वय पाँच वर्षका था उस समय अपने पिताके गोदमें सिंहासनपर जा बैठे । उस समय ध्रुवजीकी सौतेली माता राजाके निकट बैठी थी । उसने ध्रुवजीको एक ऐसा थप्पड़ मारा कि, आप पृथ्वीपर गिर पड़े और कहा कि, तू सिंहासनारूढ़ होने योग्य नहीं । यदि तेरे भाग्यमें राज्य अथवा सिंहासन होता तो तू मेरे गर्भसे उत्पन्न होता । तब ध्रुवजी रोते २ अपनी माताके समीप गए और अपनी माताके व्यवहारका विवरण किया । तब ध्रुवकी माताने अपने पुत्रको गोदमें ले लिया और मुख चूम तथा प्यार करके कहने लगी कि, ए पुत्र ! इस संसारमें तेरा कोई नहीं । एक प्यारे परमेश्वरके अतिरिक्त तेरा कौन हैं ? तू उसीकी भक्ति कर । तब माताकी शिक्षासे ध्रुवजी
तपस्याके निमित्त बनको चले । राजा उत्तानपादने सुना कि, ध्रुव बनको जाता है, तब लोगोंको भेजा कि, ध्रुवको समझाओ, परन्तु ध्रुवने किसीका कहना न माना और बनको सिधारे, वहाँ उनको ऋषियोंका उपदेश मिला, एक अँगूठे पर अपने शरीरका समस्त बोझ देकर खड़ा हो गया । छः महीने पर्यन्त बराबर खड़ा रहा, सब अन्न जल छोड़ दिया, केवल वायुही उसका भोजन था । इस अवसरमें राजा इन्द्रको अत्यन्त भय उत्पन्न हुआ कि, ध्रुव ऐसी कठिन तपस्या कर रहा है ? मेरा राज्य न छीनले । ध्रुवजीको अनेक प्रकारके त्रास दिखलाने लगा, जिससे तपस्या छोड़कर भाग जावे, परन्तु ध्रुवजी तनिक भी नहीं भयभीत हुए । व्याघ्र सर्प अग्नि और राक्षस इत्यादि पशु जो उन्हींने देखे सबमें विष्णुको जाना दूसरा कुछ न जाना, तब विष्णुकी कृपा हुई नील वर्ण घनश्याम चतुर्भुज शंख चक्र गदा पद्म इत्यादि लिए, गरुडपर सवार हो ध्रुवजीके सामने आकर कहा कि, माँग क्या चाहता है ? ध्रुवजीने कहा कि, ए महाराज ! अटल पदकी श्रेणी दीजिये, जहाँसे मैं कभी न गिर्छूँ । विष्णुने आज्ञा देदी कि, अभी तो तू राज्य कर फिर शरीर छोड़कर अटल पद पावेगा । जबलें पृथ्वी तथा आकाश है तबलें तू अटल रहेगा । सूर्य, चन्द्र, नक्षत्रादि सब तेरे चारों ओर फिरा करेंगे । फिर विष्णुने कहा कि और जो कुछ माँगेगा मैं तुझको दूंगा । तब ध्रुवने कहा कि, मुझे आत्मज्ञान प्रदान करो जिसके बलसे मैं यह जान सकूँकि, मैं क्या हूँ । तब विष्णुने कहा कि, ए ध्रुव ! यदि मैं तुझको इस प्रश्नका उत्तर देता हूँ तो मैं और अटल पद तीनों मिथ्या ठहरते हैं । इस कारण तुमको इस प्रश्नका उत्तर सन्त देवेंगे । इतना कहकर विष्णु तो चले गए । उसके उपरान्त तीन सन्त ध्रुवजीके समीप आए ; वामदेव, पराशर और दत्तजी । तब दत्तजीने कहा कि, ए ध्रुवजी ! तू अटल पदसे पृथक् है । तूने अटल पद क्यों माँग लिया ? ए मूर्ख ! तू सोच समझ कि, जब तू नहीं रहेगा तब अटल कहाँ रहेगा । आत्माको तो मृत्यु नहीं है । शरीर तो जैसे नवीन कपड़ा पहना और प्राचीन छोड़ दिया, इसी तरह है । तूने अपनेको अटल पदके बन्धनमें क्यों डाल दिया, जब उन श्रेष्ठपुरुषोंकी शिक्षासे ध्रुवको ज्ञान हुआ और अटल पदको मिथ्या जान लिया, तब पछताया । अटल पदके बखेड़ेसे मनको हटाकर सदा पराभक्तिमें लीन रहने लगा, इसकी दिव्यचर्या लोगोंको भक्तिका पाठ सिखानेवाली है । अब आप अटल पदपर विराजे हुए भी प्रेम मदिरामें मस्त रहा करते हैं । यहाँ तक कि, आपकी दीवानगीके गुण स्वयम् कबीर साहिबने भी गाये हैं ।
भक्त प्रह्लाद ।
विष्णुपुराणमें लिखा है तथा कबीर साहबका भी कथन है कि, जब प्रह्लादजीका वय सात वर्षका हुवा तब प्रह्लादका पिता जो कि, हिरण्यकशिपु था । वह बड़ा वेदान्ती था और कहता था कि, मैं स्वयम् परमेश्वर हूँ । दूसरा कौन है । सबसे अपनी पूजन करवाता था । प्रह्लाद उसका पुत्र बड़ा भक्त था । राम २ कहा करता था, कबीर साहबका वचन है कि, जब यह प्रह्लाद अपनी माताके गर्भमें था, तब नारदजीने उसकी माताके गर्भमें जाकर उसको रामनामकी दीक्षा दी थी । भक्ति सिखलायी थी ।
जिस समय यह प्रह्लाद अपनी माताके गर्भमें आया तब राजा इन्द्रको अत्यन्त भय उत्पन्न हुवा । कारण यह कि, इन्द्रने पूर्वही सुन रक्खा था जो हिरण्यकशिपुका पुत्र उत्पन्न होगा वह इन्द्रासनपर बैठकर राज्य करेगा । इस भयसे राजा इन्द्रने यह युक्ति की कि, जब प्रह्लाद गर्भमें आया तब वह प्रह्लादकी माताको चुराकर निज लोकमें ले गया । चाहा कि, गर्भ गिराकर बच्चाका वध करें । तब नारदजीने इन्द्रको समझाकर कहा कि, तुम ऐसा कार्य कदापि न करना इस स्त्रीके गर्भसे भक्त उत्पन्न होगा, वह सब सुखोंका देनेवाला होगा । तब नारदजीके कहनेसे इन्द्रने मान लिया । वह स्त्री पुनः अपने गृहमें आई । उसके गर्भसे प्रह्लाद उत्पन्न हुआ । सातवर्षके वयमें पिताने प्रह्लादको पढ़नेके लिए बँठाया । तब आप कुछ न पढ़ते थे केवल राम राम कहा करते थे । स्वयम् तो प्रह्लाद राम राम कहतेही थे पर समस्त पाठशालाके लड़कोंको भी सिखला दिया जिससे पाठशालाके समस्त छात्र राम राम कहते हुए प्रेममें मग्न हो गए । सभीने पढ़ना छोड़ दिया, पढ़नेकी ओरसे ध्यान छोड़ दिया । पण्डित राजा हिरण्यकशिपुके समीप दोहाई देते हुए कहने लगे कि, ऐ राजा ? प्रह्लादने पाठशालाके समस्त बालकोंको बहका दिया । न स्वयं पढ़ता है और न दूसरोंको पढ़ने देता है समस्त बालक राम राम कहनेके आनन्दमें मग्न हो रहे हैं । यह बात सुनकर हिरण्यकशिपुने प्रह्लादको बुलाकर समझाया कि, ए पुत्र ! तू पढ़, कारण यह कि, तू ही मेरे सिंहासनपर आरूढ़ होनेवाला है । तब प्रह्लादजीने उत्तर दिया कि, ए पिता ! मैं न पढ़ूंगा, न राज्य करूँगा, मैं तो राम राम कहूँगा, किसी वस्तुकी मुझको इच्छा नहीं है । तब हिरण्यकशिपुको अत्यंत क्रोध आया और कहा कि, मैं शिव हूँ, मेरे अतिरिक्त और दूसरा कौन है, प्रह्लादने तो रामनामके प्रेमका प्याला पीलिया था । पिताकी बात कौन सुने, राम राम कहनेसे न हटते थे । इस कारण पिता तथा पुत्रमें महा विरोध उत्पन्न हुवा, हिरण्यकशिपुने
प्रह्लादको दंड देना आरंभ किया। प्रह्लादको हिरण्यकशिपुने पर्वतपरसे नीचे डाल दिया, हाथी झँकाया, अग्निमें डाल दिया और और अनेक दंड दिए, परन्तु जब प्रह्लादको दंड देता था तब विष्णु प्रह्लादको सामने खड़े दिखाई दे समस्त कठिनाइयोंको रोक लिया करते थे। पर दूसरे किसीको दिखलाई नहीं देते थे। विष्णु प्रह्लादको इक्षित करते जाते थे कि, भयभीत न होना, सशंकित होनेकी आवश्यकता नहीं है। मैं तेरा रखवाला तेरे सामने खड़ा हूँ। हिरण्यकशिपु प्रह्लादको स्तंभसे बाँधकर वधपर प्रस्तुत हुआ। तब स्तंभ फाड़कर वे नृसिंहजी निकल पड़े। हिरण्यकशिपुका वध किया, प्रह्लादको राज्य दिया। जब प्रह्लादजी-पर कठिनाई आन पडती, तब तो विष्णुका ध्यान करते और “विष्णु विष्णु” पुकारते और जब वह बाधा टलजाती तब वेदशास्त्रानुसार अपने स्वरूपका ध्यान करते। ऐसे विचारोंको देखकर विष्णुने प्रह्लादकी निष्ठा बढ़ानेके लिये कहा कि, ए प्रह्लाद ! कठिनाईके समय तो तू मुझे पुकारता है। जब बला टल जाती है तब तू अनुमान करता है कि, समस्त संसार मैं ही हूँ मैं ही हूँ समस्त संसार मेराही स्वरूप है। यदि समस्त संसारमें तूही तू है तो आपत्तिकालमें मुझको क्यों पुकारता है। तेरे चित्तकी दुविधा नहीं गई फिर विष्णुने प्रह्लादको सिंहासपर बैठा दिया तथा प्रह्लादके उत्तरको सुनकर परम प्रसन्न हुए। ये भी प्रेम मदिराके दीवाने हैं।
अम्बरीष ।
जब भक्तोंकी कथाएँ चलती हैं तो भक्तवर राजर्षि अम्बरीषकी जीवनी भी आखोंके सामने आ खड़ी होती है। ये परम भक्त थे सब कुछ होते हुए भी अपनेको भक्तोंके चरणकी धूलिही समझते थे। यद्यपि ये भक्त गोष्ठीसे तो छिपे हुए नहीं थे पर ऐसी घटना घटी कि, ये सर्व साधारणकी दृष्टिमें आगये। दुर्वासा ऋषि बड़े तपस्वी तथा अत्यंत क्रोधी थे। एक बार राजा अम्बरीषके गृह आप पधारे और वे राजा बड़े भक्त थेही और ठाकुर पूजा करतेही थे। राजाने ठाकुरका चरणामृत लिया तब दुर्वासाको अत्यंत क्रोध आया कि, विना मुझे भोजन कराए तूने चरणामृत क्यों लेलिया ? मैं तुझको शाप दूंगा। तब राजा हाथ बाँधकर खड़ा हो बोला कि, महाराज ! मेरा अपराध क्षमा करो। दुर्वासा ऋषि अत्यंत क्रोधमें थे। जब उन्होंने उसे मारनेके लिये कृत्या उत्पन्न की तो उस समय विष्णुका चक्र सुदर्शन दुर्वासाके ऊपर छूटा कि, भस्म करदो। तब दुर्वासा भागा। जहाँ जाते थे वहाँ चक्र सुदर्शन दुर्वासाके पीछे जाते। जब दुर्वासाने देखा कि, यह चक्र सुदर्शन मुझको न छोड़ेगा तब विष्णुके शरण गए कि,
मुझको चक्र सुदर्शनसे बचाओ । तब विष्णुने कहा कि, ए दुर्वासा ! तुम राजा अम्बरीषके शरणमें जाओ । तुमने भक्तसे क्यों वैर किया तब दुर्वासा भागकर राजाके शरणमें आए, राजासे अपना अपराध क्षमा करवाया । राजाने चक्र सुदर्शनकी बड़ी स्तुति की । चक्र सुदर्शन शान्त हुवा । दुर्वासाके प्राण बचे । कबीर साहिबने इन्हें भी परा भक्तिरूपी प्रेम मंदिराका दीवाना मानकर अत्यन्त आदरके साथ स्मरण किया है ।
भगवान् शुक्देव ।
प्रेम मंदिराके दीवानोंमें व्यासपुत्र शुक्देवजीका नाम बड़े आदरके साथ लिया जाया करता है । ऋषियोंमें वामदेव और शुक् सत्यलोकवासी संभाले जाते हैं । देवीभागवतमें इन्हें अयोनिज तथा अरणिसे उत्पन्न हुआ कहा है । ये किस तरह प्रकट हुए इस प्रकरणपर विचार किया जाता है । जब व्यासजी सरस्वती नदीके किनारे गए देखो देवीभागवत १-स्कंध, ४-अध्यायमें इस प्रकार लिखा है कि, इस नदीके तटपर बैठकर तपस्या करने लगे उस समय आपके मनमें किसी प्रकारकी कामना नहीं थी । इस नदीतटपर गुलबंग नामक एक पक्षी रहता था, इस गुलबंगकी स्त्री गर्भिणी थी, अल्पकालके उपरान्त उसको बच्चा उत्पन्न हुवा । बच्चा जन्मनेसे गुलबंग अतिहर्षित हुवा, बारम्बार बच्चेको चाटने और प्यार करने लगा । इस पक्षीको देखकर व्यासजीके मनमें यह कामना उत्पन्न हुई कि, यदि मेरा पुत्र भी उत्पन्न होता तो कैसा अच्छा होता, कारण, यह कि, बिना पुत्रके गति नहीं । इस समय व्यासजीके बुढ़ापेका समय था, समस्त पुराण और वेद महाभारतादि बनाचुके थे । तब इस नदीतटपर पुत्रकामनासे तपस्या करने लगे । तब समस्त देवतागण प्रसन्न हो, व्यासजीके सामने आए । तब नारदजीने व्याससे कहा कि ए व्यास ! सब देवता भगवतीके पूजनसे अपने मनोरथको पहुँचते हैं इस कारण तुम देवीका पूजन करो । तब नारदके उपदेशानुसार वे भगवतीकी वंदनामें लगे ।
फिर देखो दशवें अध्यायमें लिखा है कि, व्यासजीने पर्वतकी चोटीपर जाकर समाधि लगादी । जब आधी तपस्या होचुकी तब राजा इन्द्रको भय उत्पन्न हुवा कि, व्यास जो कठिन तपस्या कर रहा है कहीं मेरा सिंहासन नछीनले, और शिवजीसे जाकर कहा तब शिवजीने समझाया कि, तुम भय न करो । व्यासजी बरदान लेकर अपने स्थानपर आये वहाँ अग्निहोत्रके लिये अरणि मथन करते सोचने लगे कि जैसे नीचेकी अरणिसे मन्थाके संयोगसे मथनेसे अग्नि प्रकट हो जाता है, इसी तरह मुझे भी पुत्र मिलजाय । इसके साथही गृहस्थाश्रम
को तुच्छसमझनेवाली ज्ञानधारा भी बहती जाती थी। इतनेहीमें बहो घृताची नामकी अप्सरा आ उपस्थित हुई पर उसे उन्होंने अपने लिये उचित न समझा अतः उसके शरीरको न छुआ तथा न मुग्धदृष्टिसे देखाही ऋषिकी स्थिर वृत्तिसे तपस्वियोंके ठगनेवाली वो लचीली अप्सरा तोती बनकर उड़ती बनी। अरणीके प्रति जो अग्नि जैसे पुत्रकी भावना हुई थी वो इतनी प्रबल हो उठी कि, उन्हें इसका भान भी न हुआ उनका तेज अरणिमें प्रविष्ट हो गया, मथते मथते व्यास जैसी आकृतिके शुक्रदेव उसीसे प्रकट हो गये। भगवान् व्यास देवके इन्हें गृहस्थके उपदेश देनेपर इन्होंने पितासे कह दिया कि, मैं गृहस्थ न होऊँगा न कर्मकाण्ड ही पढ़ूँगा। मुझे योग, भक्तियोग, ज्ञानयोग, तथा और भी प्रारब्धके भंजक शास्त्रोंको पढ़ाइये, दूसरे विषयोंको मैं कदापि न पढ़ूँगा। पुत्रके ऐसे भावोंको देखकर व्यासदेवजीने उन्हें बेही शास्त्र पढ़ाये तथा परमहंसोंकी संहिता श्रीमद्भागवत भी पढ़ा दी। अन्तमें जीवन्मुक्तिका उपदेश लेनेके लिये जनकजीके पास भेजा कि, बहो इनकी रही सही कमी पूरी हो जाय। ये गृहस्थचव्यसि नितान्त उदासीन थे। राजा जनकके समझानेपर जीवन्मुक्तोंकी तरह गृहस्थों में रहे। पीछे सबका त्याग करके संन्यासी हो गये। पीछे महाराज परिक्षित् को उपदेश देनेके लिये हस्तिनापुर पधारे थे। बहोसे आपने परीक्षित्को मुक्त करनेके लिये भागवत सुनाई थी। आपके तेजके सामने सबका तेज फीका पड़ जाया करता था। कबीर साहिबने इन्हें अधर कटोरीक दीवानोंमें याद किया है कि, ये अब भी पराभक्तिरूपी प्रेम मदिराको पीकर दीवाने बने फिर रहे हैं।
भगवान् व्यास।
संसारमें ऐसा कोई व्यक्ति न होगा जो भगवान् व्यासदेवको न जानता हो। चाहे कोई हिन्दू हो वा अहिन्दू सबको इसीका अध्यात्मप्रकाश मिल रहा है। इसीके बनाये ब्रह्मसूत्रके भाष्योंका निर्माण करके आज आचार्य कहलाये जा रहे हैं। शुक्र जैसे पुत्र पानेका सौभाग्य आपको ही मिला था।
उनके अवतार।
सूतजी कहते हैं कि, सातवें मन्वन्तरमें और अट्ठाईसवें युगमें जो मनु उत्पन्न हुवा वह व्यास था और उन्नीसवें युगमें द्रोणी नामक व्यास उत्पन्न होगा और सातवें युगमें अनन्त नामक व्यास होंगे। यह बात सुनकर शौनकजीने सूतजीसे पूछा कि, ए महाराज! व्यासजीके अवतारोंका विवरण सविस्तार रूपसे कहो कि, किस २ युगमें कौन २ अवतार हुए? तब सूतजीने कहा कि, पहले द्वापरमें (१) स्वयम् वेद नामक व्यास जिसको स्वयम्भू कहते हैं
उत्पन्न हुए । (२) दूसरे द्वापरमें प्रजापति नाम हुआ । (३) कृष्ण (४) बृहस्पति (५) सिवता (६) सविता (६) भूत (७) मध्वा (८) वसिष्ठ (९) सारस्वत (१०) धाता (११) भारद्वाज (१२) तृवृष (१३) अन्तर्यक्ष (१४) धर्म (१५) त्रिपुरारणी (१६) धनञ्जय (१७) मेधातिथि (१८) व्रती (१९) अत्रि (२०) गौतम (२१) उत्तम (२२) बाजश्रवा (२३) त्रोतलवेदव्यास (२४) भार्गव (२५) आग्नेय (२६) मुक्ति (२७) महामति (२८) कृष्णद्वैपायन व्यास ।
ये सब वेदव्यास जीवन्मुक्त हैं । पहले भी जीवन्मुक्त थे अब भी जीवन्मुक्त हैं और भविष्यमें जब उत्पन्न होंगे, तब भी श्रद्धेय जीवन्मुक्तिके पदको प्राप्त प्राप्त होंगे । कबीर साहबने इन्हें अपने प्रेम मदिराके दीवानोंमें मानकर वही श्रद्धा प्रकट की है ।
जैनके तीर्थंकर ।
ऐसेही जैनके चौबीस समस्त तीर्थंकर हैं, पहले तीर्थंकर ऋषभनाथजी थे, इनका विवरण देखनेसे जान पड़ेगा । कबीर साहबका कथन है कि वनमें आग लगी निर्मही आप जल मरे । येही परमहंसचर्याके प्रवर्तक हैं । जबलों ये तीर्थंकर जीवित रहते हैं तबही आपके दिव्य ज्ञानका निर्णय हो जाता है । जैसे वेदधर्मके केवल ज्ञानियोंकी दशा है वैसेहीवही जैनधर्मके केवल ज्ञानियोंका विवरण है । तनिक भी विभिन्नता नहीं । ये केवल ज्ञानी चाहें जीवन्मुक्त है, नाम मात्रके निमित्त है प्रारब्धसे करते रहते हैं । केवल ज्ञानी कहलाते हैं । यथार्थमें हैं भी । अन्तके तीर्थंकर महावीर हैं महावीरनाथका यह विवरण है कि, कशाला नामक एक मनुष्यके शापसे आपको छः मासपर्यन्त बराबर रक्त पड़ता रहा, बड़ा कष्ट पाया, पर उन्हें कुछ भी पता न चला क्योंकि शरीर-राध्यास नहीं था और व्यवहारसूत्रके चूलकामें लिखा है कि, पाँचवें कालमें मुक्ति नहीं । दूसरे उत्तरार्धसूत्रमें भी यही लिखा है कि, पाँचवें कालमें किसी मनुष्यकी मुक्ति नहीं होगी । इनके उपदेशकी शैली मनोहर है ।
चौबीस तीर्थंकरसे लेकर जितने तिरसठ शलाका पुरुष हैं सबके वृत्तान्तकी जाँच करनेसे समस्त विवरण भली प्रकार मालूम हो जावेगा कि, प्रत्येक संप्रदायके विशिष्ट पुरुषमें कुछ सार अवश्यही होता है । मुक्तिका विचार करते २ एक जगह आपने कह डाला है कि, मुक्तिपथमें किसी संप्रदायका नियम नहीं हैं कि, इसके मुक्त हों इसके न हों किन्तु, यही नियम है कि, चाहें कोई हो “सम-
भावभावितात्मा लभते मोक्षं न सन्देहः” हृदयमें पूरी समता हो, सब बातोंमें समता समाई हुई हो, मोक्ष मिल जायेगा।
योगी गोरखनाथ।
गोरखनाथजी बड़े योगी हुए। समस्त योगियोंमें शैव गोरखनाथकी श्रेष्ठता है। गोरखनाथने चौरासी कल्प करके अपने शरीरको वज्र कर लिया। जैसे शिव वैसेही गोरखनाथको जानना चाहिए। इनका कबीरसाहबसे वाद विवाद हुवा था वह वृत्तान्त पढ़नेसे समस्त ए सब विवरण जाना जावेगा। योगक्रियाका जिनको अभिमान हो समझते हैं कि, योगक्रिया द्वाराही हमारी मुक्ति होगी, वो उनकी मूर्खता जानली जावेगी कि, योगक्रियामें केवल इतनाही बल है कि, समाधिमें ही मिला देवे। इससे विशेष नहीं। इस कारण योगभी व्यर्थ है। यद्यपि समस्त प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, सो समस्त सिद्धियाँ अस्थायी तथा जलपरके फूल बूँटे हैं।
भगवाग बुद्ध।
मगध देशका राजा सिद्धोदन था उनकी रानीका नाम माया था। रानीको गर्भ रहा उससे बौद्ध उत्पन्न हुवा। उस बौद्धका नाम शाक्यमुनि रक्खा गया। वह उत्पन्न होनेके समय गर्भके बाहर निकल नहीं सका। माता मर गई तथा पेट फाड़कर बालक निकाला गया ऐसी किंवदन्ती है। जब वह बालक गर्भके बाहर निकला उसी समय खड़ा हो गया। पृथ्वीपर सात पग चला पुकारकर बोला कि, पृथ्वी तथा आकाशके बीचमें मेरे समान पूजनीय अन्य कोई देवता नहीं है। जब इस बालकका वय सत्रह वर्षका हुवा तो उसके तीन विवाह हुए। एक पुत्र उत्पन्न हुवा। इस शाक्यमुनिको सांसारिक धन तथा राजपाटकी कामना नहीं थी, यह उन्नीस वर्षके वयमें तपस्या करनेके निमित्त चला गया, बारहवर्षके उपरान्त परमेश्वरके दर्शन पाकर अपना धर्म, वेद यानी पूर्व भीमांसा (कें) विरुद्ध प्रचलित किया, बड़ी धूमधामसे यह धर्म प्रचलित हुवा। उसने हिंसाकी बड़ी निन्दा की। जैन तथा बौद्ध यह दोनों हिंसाके विरुद्ध हैं। जब इस धर्मकी प्रबलता हुई तो तब हिंसा दब गयी। यह बौद्ध विष्णुका अवतार कहलाता है। ये भी सत्य पुरुषका एक बड़ा अवतार है। इस धर्मके लोग अर्थात् बौद्ध कहते हैं कि, हमारा गुरु अर्थात् शाक्यमुनि आठसहस्र बेर उत्पन्न हुवा मरा, फिर भी अमर है कभी नहीं मरता, केवल आपका चोला बदलता जाता है। अब इस धर्मके लोग भारत वर्षमें नहीं हैं। परन्तु सब धर्मोंसे