कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
एक परमेश्वरपर कुरान
फोड़वाई थी। सब पुकारने लगे कि, इस पहलेके अंधेने हमारी आँख फोड़वाई है। उस पहलेके अंधेका पाजीपना पूरा प्रगट हो गया।
नकटोंका पन्थ।
मैंने सुना था कि, एक राजाके पास एक मोडा जार रहता था। राजा उसकी बहुत कुछ मान मर्यादा किया करता था, वह बड़ा पाजी तथा दुष्ट था, बहुत पाजीपना किया करता था, पर राजा दयापूर्वक उसको टाल देता, उसको दण्ड न देता था। उसकी विद्याके कारण उसकी बुराई ढाँपता। एक बार वह महादोषके कारण पकड़ा गया। कि, जिसके निमित्त दण्ड न देना राजाको नितान्तही अनुचित मालूम हुआ तो भी राजाने इतना पक्ष किया कि केवल उसकी नाक कटवाकर देशसे बाहर निकाल दिया। उस पाजीने देशसे बाहर निकलकर कुछ यंत्र मंत्र इत्यादिकी साधनाकी। कितनीक जादूगरी इत्यादिसे अपनेको बड़ा चढ़ा लिया जब अपना कार्य सम्पूर्ण करचुका तब अनेक मनुष्योंको धोखा देने लगा। मुक्तिकी आशा दिलाने लगा। आप गुरु बन लोगोंको उपदेश देदेकर शिष्य बनाने लगा। कितनेही लोग उसके भृत्य बनगए। जो कोई उसका चेला बनता उससे वह यही कहता कि, यदि अपनी मुक्ति चाहते हो, तो तुम अपनी नाक कटाओ नकटे बन जाओ। उसके सब शिष्योंने नाकें कटवाई। जैसे कि, मुसलमानों तथा इब्रानियोंका खुतना होता है। इसी प्रकार उनकी नाककी खुतना होने लगा। नकटोंका एक बड़ा झुण्ड उसके साथ हुआ। वह मोडा साधुकी सूरतमें भस्म इत्यादि रमाकर अवधूत बन गया। नकटे पंथका अगुवा हुआ। अपने शिष्योंसहित उसी देशमें पहुँचा बहुत दिवस बीत चुके थे। इस पाजी मोडेकी बात लोग भूल चुके थे इस कारण उसको किसीने नहीं पहचाना। भुज नगरमें रहने तथा उपदेश देने लगा। कितने मनुष्य उस नगरमेंभी उसके शिष्य होगए। उसकी बड़ी प्रशंसा होने लगी। लोगोंको उसने बडे कौतुक दिखाए। यहाँतक कि, स्वयम् राजा उनके दर्शनके निमित्त आए, राजाको भी उसने भौति भौतिके खेल दिखाए जिससे राजाके मनमें उसका विश्वास जम गया। तब राजाको वह समझाने लगा कि, ए राजा ! यह देह तुच्छ तथा घृणित है। यदि परमेश्वरके अर्थ लगाई जावे तो मनुष्यकी मुक्ति हो जावे इस कारण हे राजा ! तू अपनी नाक कटवा कर मुक्ति ले। राजाने अपनी नाक कटवाई उसका शिष्य बन गया। जब राजा शिष्य हो चुका, तब वह पिशाच रानीके पास जाकर समझाने लगा कि, ए रानी ! यह शरीर तो चार दिवसोंमें मिट्टीमें मिल जावेगा तू अपनी नाक कटवा कर
मुक्ति लेले । रानीने कहा कि, मैं न अपनी मुक्ति चाहती हूँ न नाक कटवाती हूँ यद्यपि उसने समझाया पर रानीने न माना । कुछही दिवसोंके बाद वह दुष्ट किसी महापापमें फँसा । किसी महादोषमें पकडा जाकर राजाके समक्ष लाया गया जाँच होने लगी । लोगोंने पहचान लिया कि, यह वही मोडा है जो नाक कटवाकर देश बाहर किया गया था । जाँचके पीछे राजाने जाना कि, उसने मुझसे उस धोखेबाजीसे अपना प्रति शोधलिया । मैंने उसकी नाक कटवाई थी । उसनेभी मेरी नाक कटवाली । तब राजाने उस मोडेको जीवितही पृथ्वीमें गड़वा दिया । फिर नकटापंथके लोग तितिर-बितिर हो गए । यदि वह कुछ दिवसोंपर्यन्त और जीवित रहता तो कदाचित नाककटाईका कार्य भी प्रचलित रहता ।
वेदपशु ।
इस संसारमें चार वेद हैं । वे पूर्वदेशको दिये थे उनके अभाव पश्चिम देशवासियोंको प्रदान किए गए । इस आठोंकी आज्ञापर समस्त मनुष्य चल रहे हैं । वेदपशु वे हैं जो वेद तथा पुस्तकोंको पढ़ते हैं, वेदोंके यथार्थ तात्पर्यसे पूर्णतया अनभिज्ञ हैं । वेदका तात्पर्य तो अन्य है । मनुष्योंको अन्य उपदेश देकर वहका देते हैं । वेदपशु एक अर्थ निकालता है । जिसपर सहस्रों नर पशु विश्वास करके सत्य मानते हुए प्रशंसा करते कहते हैं कि, वाह वाह स्वामीजी ! आपने जो अर्थ किया वोही सत्य है । दूसरोंने जो अर्थ किया वह कदापि सत्य नहीं है । लोग प्रसन्न होकर कहते हैं कि, धन्य स्वामीजी ! आपके समान अर्थ और कौन कर सकता है ? आपके समान पहले न कोई हुआ और न होगा । समस्त नर पशु मिलकर प्रशंसा करते हैं । वेदपशु सुन सुनकर घमंड करता हुआ कहता कि, वास्तवमें मैं ऐसाही जानी हूँ । इस एक वेदपशुके पीछे सहस्रों तथा लाखों नरपशु लगे हुए प्रशंसा किया करते हैं । इस वेदपशुको भलीभाँति फुलाकर घमण्डी करदेते हैं । वह वेदपशु ऐसा फूल जाता है कि, अपने सामने किसीको कुछ नहीं गिनता, समझता है कि, मैं वेदपाठियोंमें प्रथम श्रेणीका पण्डित हूँ । यद्यपि उसको वर्णमालाकी सुध भी नहीं है । वेदके वास्तविक तात्पर्यको वह क्या समझे ? वेदकोशमें एक शब्दके अनेक अर्थ कहे हैं । एक अर्थ नहीं वरन् अनेक अर्थ हैं । शब्दोंके समस्त अर्थोंमेंसे एक अर्थको अपनी इच्छानुसार चुनके वेदमंत्रका अर्थ करके लोगोंको समझाता हुआ समस्त नर पशुओंको अपनी ओर खींचता है । इसी प्रकार वेदपशु लोगोंको अपने जालमें फँसाता है । जितने वेदपशुके शिष्य हैं सब वेदपशु हैं । इन सब वेदपशुओंके भाँति-भाँतिके ध्यान