कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
इञ्जीलका कथन, कुरान व हदीस, समीक्षा
तक माया और मायिकोंमें फँसा रहता है, तब तक अद्वितीयसत्यपुरुषकी उपासनाके योग्य नहीं होता । क्योंकि, दोनोंमें ही भेद वाद है । दोनोंका उपदेश भेद ही है, भेदसे भिन्न उनका उपदेश कदापि नहीं हो सकता चारों वेदोंने स्वरूप प्रगट किया, तो प्रथम भारत वासियोंको प्राप्त हुये, लोगोंने उनकी आज्ञापार चलना आरम्भ किया । यद्यपि कतिपय धर्मोंके लोग आजकल उसके विरुद्ध भी चल रहे हैं ।
वेदके टीकाकारोंने, ऊँकारके यथार्थ आशय और अर्थको न समझा, इसका कारण केवल उनके ज्ञानकी अपूर्णता है । वेद तो किसीसे स्वयं कुछ नहीं कहते न बोलतेही हैं, जिससे कि अपने उपदेशको प्रगट कर सकें लोगोंको शिक्षा दें तथा कहें कि, तुम अमुक वेद मन्त्रकी व्याख्या इस प्रकार करो इस प्रकार न करो । इसी कारण सब टीकाकारोंने अपनी २ बुद्धि और पहुँचके अनुसार जैसा चाहा टीका करदी उन्होंने यह कुछ भी न सोचा कि, मेरा विचार सत्य अथवा असत्य । इस कारण वेदके आशयको वही समझ सकते हैं, जिनका अन्तःकरण ज्ञानके यथार्थ प्रकाशसे पूर्ण है । दूसरे नहीं ।
इस ऊँकार की यथार्थताको न जाननेके कारण ही वेदपाठी लोग आवागमनमें फँसे रहते हैं । अद्वैतमें कुछ विकार नहीं, द्वैतमें है । अद्वैतमें वेद वाणी कुछ नहीं । जितने वेदपाठी हैं अपनी बुद्धिपर भरोसा रखते हैं, जिस बुद्धिपर भरोसा रखते हैं उस बुद्धि की पहुँच अद्वैत तक है ही नहीं, फिर वेदपाठियोंको क्या सहारा रहा, वे असहाय हैं । जो अद्वैतके खोजा हैं वे द्वैतमें कदापि वृत्ती नहीं लगाते । जो अनेकमें मन लगाते हैं वे एककी प्राप्ति नहीं कर सकते । आशा तृष्णा द्वैतमें है, अद्वैतमें पग धरते ही सांसारिक विचार और सङ्कल्प छोड़ने पड़ेंगे । जब तक सांसारिक ध्यान है तब तक माया है, कोई उपाय क्यों न करे छुटकारा नहीं हो सकता ।
तौरेतकी आज्ञाएं ।
१-एक खुदाकी पूजा करो, २-बुतपरस्ती मत करो, ३- खुदाका नाम बे फ़ाइदा मत ला, ४-सबतका दिन पाक रखो, ५-माता पिताकी प्रतिष्ठा करो, ६-खून मत करो, ७-व्यभिचार मत करो, ८-चोरी मत करो, ९-अपने पड़ोसीको प्यार करो, १०-झूठ गवाही मत दो । ये दश आज्ञायें तौरेतके सार हैं । प्रगट तो इनका अर्थ सब कोई समझ लेता है, परन्तु यथार्थमें इनका अर्थ इस प्रकार समझना चाहिये ।
१-एक खुदा (ईश्वर) की पूजा-करो—कहनेवालेका आशय तो यह
है कि, मेरी पूजा करो, सुननेवाला भी यही समझता है कि जो ईश्वर मुझसे बातकर रहा है उसीकी पूजा उचित है। वक्ता श्रोता दोनोंके आशय और संमति उनके अनुसारही है।
समोक्षा—पर मेरी सम्मति तो एक ईश्वरकी पूजाके ावषयमें यह है कि जो कुछ आँखोंसे देखा जाता है, कानोंसे सुना जाता है, स्पर्श किया जाता है, रस लिया जाता है, संधा जाता है अथवा किसी बाहरी वा भीतरों ज्ञानेन्द्रियसे कर्म अनुभव होता है यह सब द्वैतरूप माया है। वहाँ अद्वैतका पता नहीं बरन् अनेक हैं। अतः हजरत मूसाने खुदाकी बातको अपने कानसे सुना खुदाको अपने आँखोंसे देखा। जो देखा सुना जाता है वह द्वैत है, अद्वैतमें नहीं है। इससे मूसाने खुदाको अपनी आँखोंसे देखा उससे जो कुछ सुना सब माया ही हुई। मूसाने मायाहीकी आज्ञाको माना। एक खुदाको न किसीने देखा और न किसीने उसका वचन सुना। क्योंकि, अन्तरदृष्टिसे जो कोई एक ईश्वरको देखता है तो उसको खुदाको देखने एवं उसके वचनको सुननेकी आवश्यकता नहीं होती। वह सबमें सब जगह एक समान वर्तमान है फिर किसका वचन सुनें, किसको देखें। उनके अपने ही मन और वचनसे खुदाके वचन खण्डित होते हैं। क्योंकि भीतर और बाहर तो सब वही है। परमात्मा सदा वर्तमान है फिर किस विशेष स्थानमें जाकर ईश्वरका वचन सुनें एवं सुननेका मुहताज बनें, श्रोताकी ऐसी क्या जरूरत है।
निराकार निरवयवका पता नहीं—यदि मूसा अपने अन्तरकी ज्ञान-दृष्टिसे ईश्वरको पहचानते उसके पदको जानते तो अवश्य वर्णन करते कि यह खुदा कौन है। किधरसे आया? किधरको गया? उसको रहनेकी जगह कहाँ है? क्या सामर्थ्य रखता है? विस्तारसे सारा हाल प्रगट हो जाता, कदापि न छिपा रहता। अरबदेशमें जितने विश्वासी पेंगम्बर हुये किसीने इस खुदाका विस्तृत वृत्तान्त प्रगट नहीं किया केवल प्रकाश और थोडा सामर्थ्य देखकर उसकी आज्ञा मानते आये। किसीने उसको न पहचाना। सब एक दूसरे की बातपर विश्वास करते चले आये। केवल बाहरी भड़क देख लो, भीतरी भेदको किसीने नहीं जाना। ऐसा अन्तरप्रकाश उनमेंसे किसीको नहीं हुआ कि यथार्थ को मालूम कर सके जिस खुदाके शासनको मूसाने माना उसी खुदाकी भक्ति आदमसे लेकर आजतक सब करते आते हैं। उसी खुदाकी आज्ञायोंको मानना अपना धर्म सममत है यही उनका विश्वास है। जो कुछ उन पीर पेंगम्बरोंने देखा वह सब भ्रम है, वह बेचून बेचारा खुदा यानी निराकार निरवयव परमात्मा