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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

अम्बरीष, भगवान् शुक्रदेव

सन्तो राह दुनों हम डीठा ॥

हिन्दू तुरक हटा नहि मानें, स्वाद सबनको मीठा ॥ १ ॥

हिन्दू व्रत एकादशी साधें, दूध सिंघाड़ा सेती ।

अनको त्यागे मन नहि हटकें, पारनकरें सगोती ॥ २ ॥

तुरक रोजा नवाज गुजारें, विसमिल बाँग पुकारें ।

उनकी भिन्नत कहाँते, होइहै, साँझै मुर्गी मारें ॥ ३ ॥

हिन्दुकि दया मेहर तुरकनकी, दूनों घरसों त्यागी ।

वै हलाल वै झटका मारें, आगि दुनों घर लागी ॥ ४ ॥

हिन्दू तुरक कि, एक राह है सद्गुरु है बताई ।

कहहि, कबीर सुनो रे सन्तो, राम न कहेउ खोदाई ॥ ५ ॥

ए महात्मा पुरुषो ! हमने हिन्दू मुसलमान दोनोंकी एकही रासता देखी है । मैं हिन्दू और मुसलमान दोनोंको समझाता हूँ पर दोनोंही जिदपर आये हुए हैं कहना नहीं मानते । दोनोंको इसकी चोट लगी हुई है । हिन्दू पहले दिन तो एकादशीका व्रत दूध सिंघाड़ेसे करते हैं अन्नका तो त्याग करते हैं पर मनके विकारोंको छोड़कर मनको नहीं रोकते । न कभी एकादशीको विषय चिन्तन ही छोड़ा है । इसी तरह तुरक जब रोजा करते हैं उस दिन उपवास करते हैं नंमाज पढ़ते हैं, बाँग लगाते हैं, पर साँझको रोजाके खुलतेही मुर्गी मार पुलाक बनाकर खा जाते हैं । हिन्दुओंने दया तथा तुरकोंने मिर्ह, अपने अपने दिलसे निकालदी, एक हलाल करता है तो एक झटका मारता है । अज्ञानरूपी आग दोनोंके लगी हुई है । सत्यगुरुने मुझे यही बताया है कि, हिन्दू मुसलमान दोनोंकी एकही राह है । राम न कहा खुदा कहलिया, एवं खुदा न कहा राम कह लिया । दोनों नाम उसीके हैं सिर्फ नामोंमें अन्तर है । कबीर साहिब कहते हैं कि, राम और खुदाने किसीसे नहीं कहा हैं कि, जीवहत्या करो ।

शब्द—सन्तो पांडे निपुण कसाई ॥

बकरा मारि भैंसाको धावै, दिलमें दर्द न आई ॥ १ ॥

करि स्नान तिलक करि बैठे, विधिसों देबि पुजई ।

आतमराम पलकमो विनशे, रुधिरकी नदी बहाई ॥ २ ॥

अति पुनीत ऊँचे कुल कहिये, सभा माहि अधिकई ।

इनसों दीक्षा सब कोई मोंगे, हसि आवे मोहि भाई ॥ ३ ॥

पाप कटनको कथा सुनावै, कर्म करावै नौँचा ।

बूडत दोउ परस्पर देखे, गहे हाथ यमखौँचा ॥ ४ ॥

गाय बधे तँहि तुरका कहिये, उनते वेका छोटे ।
कहाँहि कबीर सुनो हो सन्तो, कलिके ब्राह्मण खोटे ॥ ५ ॥

कबीर दासजी वाममार्गी देवीकी पुजारीकी ओर लक्ष्य करके कहते हैं कि, ए महात्माओ ! यह पाण्डे कसाईसे भी चतुर मालूम होता है । बकरेकी तो सदाही बलि देता रहता है पर मोके झोके भेंसाके मारनेका भी इरादा करता है । स्नान करके लाल तिलक दे, सिद्ध बनके बैठ जाता है, देवीको बड़े ढोंगके साथ पुजाता है । जो अपने भीतर है वही उसकेभी भीतर है इस बातका ख्याल न करके सपाटसे जीव बध करके लोहूकी नदी बहा देता है । जब कभी सभामें बैठता है तो अपनेको अतिपुनीतकुलमें मानकर सभामें अपनेको कौल कहता हुआ बलिका माहात्म्य प्रकट करता है । जमाना इनका चेला होनेको चलता है, पर मुझे इसकी हँसी आती है, कथा तो सुनाते हैं पाप नाश करनेके लिये, पर काम करते हैं पापके पहाड़ोंका । ऐसे गुरु चले दोनों डबते देखे जाते हैं हाथ पकड़कर यमराजने दोनोंको जीव हत्याके फल भोगनेके लिये खींच लिया है । जो गाय मारते हैं वे तुर्क हैं भेंसा बकराके मारनेवाले क्या इनसे कम है । पहिले ऐसे ब्राह्मण नहीं थे कबीर कहते हैं कि, कलियुगके ऐसे ब्राह्मण जो ब्राह्मण शरीर पाकर जीवहत्या करें वे महा बुरे हैं । इस तरह कबीर साहिबने और भी अनेकों वचनोंमें बलि या कुर्बानीका निषेध किया है । वे हिन्दू मुसलमान दोनोंके लिये अनुचित समझते हैं ।

समस्त सूक्ष्मवेद इस विषयमें बराबर यह बात प्रगट करता चला आता है कि, रक्तपात कालपुरुषकी ओरसे है । तुम इस पापसे रूको परन्तु लोग नहीं हटते थे । कबीर साहबके साथ वँर करते, कहना न मानते, ऐसा विष और मंत्र कालपुरुषका समस्त जीवोंपर चढ़ रहा है । कि, कोई जीव सत्यपुरुषकी भक्तिको अच्छा नहीं समझता है । कालपुरुषकी ओर आपसे आप दौड़ता है । जैसे नीमके कीड़ेको नीमही पसंद है । वह मिसरी चीनी आदिको अच्छा नहीं समझता । सब जीव कामनाकी वासनामें फँसकर काम क्रोध लोभादिके प्रपञ्चोंमें फँस रहे हैं । समस्त जीवोंकी नस नसमें कालपुरुषका विष समा रहा है । बिना सत्यगुरुकी दयासे वह विष उनके भीतरसे न निकलेगा । कालपुरुषके पुत्र कालपुरुषके बनाये नियमोंपर समस्त मनुष्योंको आरूढ़ करते जाते हैं । हाँक मार मार कर समस्त मनुष्योंको फँसाते हैं, समस्त मनुष्य उनके धोखे और धूर्तताको देखते सुनते हैं तथापि उसी पथपर चले जाते हैं । फिर उनको क्या कहिये ? मनुष्यतासे बहिर्गत कहिये अथवा मनुष्य कहिये ? जो लोग जान-