कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
अथ आदि मंगल
मृतुअंधा इक दूत हमारा । सुकित ग्रह लैहै अवतारा ॥
प्रथम दूत मम प्रगटे जायी । पीछे अंस तुम्हारा आयी ॥
यहि विधि जीवनको भरमाऊँ । पुरुष नाम जीवन समझाऊँ ॥
द्वादश पथ जीव जो ऐहैं । सो हमरे मुख आन समैहैं ॥
एतिक विनती करों बनाई । कीजे कृपा देउ बनसाई ॥
कालका कबीरसाहबसे जगन्नाथस्थापनाका बरदान माँगना ।
कलियुग प्रथमचरण जब आयब । तब हम बौद्ध शरीर बनायब ॥
राजा इन्द्रदवन पहुँ जायब । जगन्नाथ हम नाम धरायब ॥
राजा मंडप मोर बनैहै । सागर नीर खसावत जैहै ॥
पुत्र हमार विस्तु जो आही । सागर ओइल सात तेंहि पाही ॥
ताते मंडप बचन न पाई । उमँगे सागर लेइ डुबाई ॥
ज्ञानी एक मता निरमाऊ । प्रथमै सागर तीर सिधाऊ ॥
तुम कहैं सागर लौधि न जाई । देखत उदधि रहे भुरझाई ॥
यहि विधि मो कहैं थापिहु जायी । पीछे आपन अंश पठायी ॥
भवसागर तुम पंथ चलाओ । पुरुष नामते जीव बचाओ ॥
संधि छाप मोहि देहु बतायी । पुरुषनाम मोहि देहु सुझायी ॥
विना सन्धि जो उत्तरै घाटा । सो हंसा नहिं पावे बाटा ॥
ज्ञानी बचन ।
छन्द-- धरम जस तुम मांगहुँ सो, चरित हम भल चीन्हिया ।
पंथ द्वादश तुम कहेउ सो, अमी घोर विष दीन्हिया ॥
जो मेटि डारों तोहिको अबहिं, पलटि कला दिखावऊँ ।
लै जीव बंध छुडाय जम सो, अमर लोक सिधावऊँ ।
सोरठा--पुरुष बचन अस नाहिं, यहै सोच चित कीन्हेऊ ।
लै पहुँचावहुँ ताहि, सत्य शब्द जो दिढ़ गहे ॥
द्वादश पंथ कहेउ अन्याई । सो हम तोहि दीन्ह बगसाई ॥
पहिले प्रगटै दूत तुम्हारा । पीछे लेहि अंश औतारा ॥
उदधि तीर कहैं मैं चलि जायब । जगन्नाथको माड मडायब ॥
ता पाछे हप पंथ चलायब । जीवन कहैं सत लोक पठायब ॥
धर्मराय का कबीर साहब को धोखा देकर उनसे गुप्त भेद का पूछना ।
धर्मराय बचन ।
संधि छाप मोहि दीजे ज्ञानी । जैसे देही हंसहि सहिदानीई ॥
जो जीव मो कहैं संधि बतावे । ताके निकट काल नहि आवे ॥
नाम निसानो भी कह दीजे । हे साहिब यह दायो कीजे ॥
ज्ञानी बचन ।
जो तोहि देहैं संधि लखाई । जीवन काज होइहो दुखदाई ॥
तुम परंपंच जान हम पावा । काल चलै नहि तुम्हरो दावा ॥
धरमराय तोहि परगट भाखों । गुप्त अंक बीरा हम राखों ॥
जो कोई लेइ नाम हमारा । ताहि छोड़ितुम होहु नियारा ॥
जो तुम हंसहि रोको जायी । तो तुम काल रहन नहि पायी ॥
धर्मराय बचन ।
कहैं धर्म जाओ संसारा । आनहु जीव नाम आधारा ॥
जो हंसा तुम्हरो गुन गावैं । ताहि निकट तो हम नहि जावैं ॥
जो कोइ जैहैं सरन तुम्हारी । हम सिर पग दै होवैं पारी ॥
हम तो तुम सन कीन्ह ढिठाई । पिता जान कीन्ही लरिकाई ॥
कोटिन औगुन बालक करई । पिता एक हिरदय नहि धरई ॥
जो पितु बालक देइ निकारी । तब को रच्छा करे हमारी ॥
धरमराय उठ सीस नवायो । तब ज्ञानी संसार सिधायो ॥
इति प्रमाण अनुरागसागरका ।
दशवाँ प्रकरण
सत्य सुकृतका ब्रह्मादिकोंको उपदेश देना ।
( सत्ययुगमें कबीर साहबका पृथ्वीपर आना और सत्य सुकृतजीके नामसे प्रख्यात होना और मनुष्यों को मुक्ति प्रदान करनेका वृत्तान्त ।
जब पहले ज्ञानीजी (कबीर साहब) ने पृथ्वीपर पदार्पण किया वह सत्ययुगका समय था, सत्ययुगमें आपका नाम सदैव सत्यसुकृत प्रख्यात होता है, आप सत्यगुरु पहले ब्रह्मा विष्णु और शिवके पास गये और उनको मुक्तिका मार्ग समझाया । किन्तु, ये तीनों अपने राज्य और प्रभुत्वके घमंडमें थे आपकी बातोंपर ध्यान नहीं दिया, यहाँ तक कि, अहंकार स्वार्थ तथा इर्षासे हाथ तक नहीं उठाया । तब कबीर साहबन राजा धोंधल और राजा हारीत इत्यादिको अपनी दीक्षा देकर, उनको समस्त परिवार सहित परमधामको पहुँचा दिया—