ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ९-१० ] अध्याय १ ५३
सूत्र ९-१० ] अध्याय १ ५३
विशेष रूपसे जाननेवाला है, वह आत्मामे ही क्रीडा करनेवाला, आत्मामें ही रति-
वाला, आत्मामे ही जुड़ा हुआ तथा आत्मामे ही आनन्दवाला है।' इत्यादि ।
इन सब धर्मोंकी संगति परब्रह्म परमात्मामे ही लग सकती है, अतः वही इस
प्रकरणमे 'भूमा'के नामसे कहा गया है।
सम्बन्ध—पूर्व प्रकरणमें भूमाके जो धर्म बताये गये हैं, वे ही बृहदारण्य-
कोपनिषद् ( ३ । ८ । ७) में 'अक्षर' के भी धर्म कहे गये हैं। अक्षर शब्द
प्रणवरूप वर्णको भी कहते हैं; अतः यहाँ 'अक्षर' शब्द किसका वाचक है ?
इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
अक्षरमम्बरान्तधृतेः ॥ १ । ३ । १० ॥
अक्षरम् = ( उक्त प्रकरणमे ) अक्षर शब्द परब्रह्म परमात्माका ही वाचक
है; अम्बरान्तधृतेः = क्योकि उसको आकाशपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्को धारण करने-
वाला बताया गया है ।
व्याख्या—यह प्रकरण इस प्रकार है—'स होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य
दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद् भूतं च भवच्च भविष्यच्चे-
त्याचक्षते कस्मिन् तदोतं च प्रोतं चेति ।' ( ३ । ८ । ६) गार्गीने याज्ञवल्क्य-
से पूछा—'याज्ञवल्क्य ! जो द्युलोकसे भी ऊपर, पृथिवीसे भी नीचे और इन
दोनोंके बीचमे भी है तथा जो यह पृथिवी और द्युलोक है, ये सब-के-सब एवं
जिसको भूत, भविष्यत् और वर्तमान कहते हैं, वह काल किसमे ओतप्रोत
है ?' इसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने कहा—'गार्गि ! यह सब आकाशमें
ओतप्रोत है।' इसपर गार्गीने पूछा—'वह आकाश किसमे ओतप्रोत है ?'
( ३ । ८ । ७) तब याज्ञवल्क्यने कहा—'उस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्तालोग 'अक्षर'
कहते हैं।' ( ३ । ८ । ८) इस प्रकार वह अक्षर आकाशपर्यन्त सबको
धारण करनेवाला बताया गया है, इसलिये यहाँ 'अक्षर' नामसे उस परब्रह्म
परमात्माका ही वर्णन है, अन्य किसीका नहीं ।
सम्बन्ध—कारण अपने कार्यको धारण करता है, यह सभी मानते हैं ।
जिनके मतमें प्रकृति ही जगत्का कारण है, वे उसे ही आकाशपर्यन्त सभी
भूतोंको धारण करनेवाली मान सकते हैं। अतः उनके मतके अनुसार यहाँ 'अक्षर'
९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
शब्द प्रकृतिका ही वाचक हो सकता है । इस शङ्काका निवारण करनेके लिये
कहते हैं—
सा च प्रशासनात् ॥ १ । ३ । ११ ॥
च=और, सा=वह आकाशपर्यन्त सब भूतोको धारण करनारूप
क्रिया, ( परमेश्वरकी ही है ); प्रशासनात्=क्योकि उस अक्षरको सबपर
भलीभाँति शासन करनेवाला कहा है ।
व्याख्या—इस प्रकरणमे आगे चलकर कहा है कि 'इसी अक्षरके प्रशासन-
मे द्युलोक, पृथिवी, निमेष, मुहूर्त, दिन-रात आदि नामोसे कहा जानेवाला काल—
ये सब विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित है । इसीके प्रशासनमे पूर्व और
पश्चिमकी ओर बहनेवाली सब नदियों अपने-अपने निर्गम-स्थान पर्वतोसे निकल-
कर बहती है।' इत्यादि । ( बृह० उ० ३ । ८ । ९ ) इस प्रकार उस
अक्षरको सबपर भलीभाँति शासन करते हुए आकाशपर्यन्त सबको धारण करने-
वाला बताया गया है । यह कार्य जड प्रकृतिका नहीं हो सकता । अतः वह
सबको धारण करनेवाला अक्षरतत्त्व ब्रह्म ही है, अन्य कोई नहीं ।
सम्बन्ध—इसके सिवा—
अन्यभावव्यावृत्तेश्च ॥ १ । ३ । १२ ॥
अन्यभावव्यावृत्तेः—यहाँ अक्षरमे अन्य ( प्रधान आदि ) के लक्षणोका
निराकरण किया गया है, इसलिये; च=भी; 'अक्षर' शब्द ब्रह्मका ही
वाचक है ।
व्याख्या—उक्त प्रसङ्गमे आगे चलकर कहा गया है —'वह अक्षर देखनेमे
न आनेवाला, किन्तु स्वयं सबको देखनेवाला है, सुननेमे न आनेवाला, किन्तु स्वयं
सुननेवाला है, मनन करनेमे न आनेवाला, किन्तु स्वयं मनन करनेवाला है; जाननेमे
न आनेवाला, किन्तु स्वयं सबको भलीभाँति जाननेवाला है' इत्यादि । ( बृह० उ० ३।
८।११ ) इस प्रकार यहाँ उस अक्षरमे देखने, सुनने और जाननेमे आनेवाले प्रधान
आदिके धर्मोका निराकरण किया गया है;* इसलिये भी 'अक्षर' शब्द विनाशशील जड
- उपर्युक्त श्रुतिमे अक्षरको सर्वद्रष्टा बताकर उसमे प्रकृतिके जडत्व और जीवात्माके
अल्पज्ञत्व आदि धर्मोंका निराकरण किया गया है ।