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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र ४३-४५ ] अध्याय २ १५९

सूत्र ४३-४५ ] अध्याय २ १५९
अङ्गभूत है; क्योकि वहाँ सङ्कर्षणको भगवान्‌का प्राण, प्रद्युम्नको मन और अनिरुद्धको
अहङ्कार माना गया है । अतः वहाँ जो इनकी उत्पत्तिका वर्णन है, वह भगवान्-
के ही अंशोका उन-उन रूपोमे प्राकट्य बतानेवाला है। श्रुतिमे भी भगवान्-
के अजन्मा होते हुए भी विविध रूपोमे प्रकट होनेका वर्णन इस प्रकार
मिलता है—'अजायमानो बहुधा विजायते ।' ( यजु० ३१ । १९० ) इसलिये
भगवान् वासुदेवका सङ्कर्षण आदि व्यूहोके रूपमें प्रकट होना वेद-विरुद्ध नहीं
है । जिस प्रकार भगवान् अपने भक्तोपर दया करके श्रीराम आदिके रूपमे प्रकट
होते हैं, उसी प्रकार साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर भगवान् वासुदेव अपने भक्तजनोपर
कृपा करके स्वेच्छासे ही चतुर्व्यूहके रूपमें प्रकट होते है । भागवत-शास्त्रमे इन चारोकी
उपासना भगवान् वासुदेवकी ही उपासना मानी गयी है । भगवान् वासुदेव
विभिन्न अधिकारियोके लिये विभिन्न रूपोंमे उपास्य होते है, इसलिये उनके चार
व्यूह माने गये है । इन व्यूहोकी पूजा-उपासनासे परब्रह्म परमात्माकी ही प्राप्ति
मानी गयी है । उन सङ्कर्षण आदिका जन्म साधारण जीवोकी भाँति नहीं है,
क्योकि वे चारो ही चेतन तथा ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज
आदि समस्त भगवद्भावोसे सम्पन्न माने गये हैं । अत सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और
अनिरुद्ध—ये तीनो उन परब्रह्म परमेश्वर भगवान् वासुदेवमे भिन्न तत्त्व नहीं है ।
अत इनकी उत्पत्तिका वर्णन वेद-विरुद्ध नहीं है ।
सम्बन्ध—यह पाञ्चरात्र-आगम वेदानुकूल है, किसी अगमे भी इसका
वेदसे विरोध नहीं है; इस बातको पुनः दृढ करते हैं—
विप्रतिषेधाच्च ॥ २ । २ । ४५ ॥
विप्रतिषेधात्=इस शास्त्रमे विशेषरूपसे जीवकी उत्पत्तिका निषेध किया
गया है, इसलिये; च=भी ( यह वेदके प्रतिकूल नहीं है ) ।
व्याख्या—उक्त शास्त्रमे जीवको अनादि, नित्य, चेतन और अविनाशी माना
गया है तथा उसके जन्म-मरणका निषेध किया गया है, इसलिये भी यह सिद्ध
होता है कि इसका वैदिक-प्रक्रियासे कोई विरोध नहीं है । इसमे जो यह कहा
गया है कि 'शाण्डिल्य मुनिने अङ्गोंसहित चारो वेदोंमें निष्ठा ( निश्चल स्थिति ) को
न पाकर इस भक्तिशास्त्रका अध्ययन किया ।' यह वेदोंकी निन्दा या प्रतिषेध

१६० वेदान्त-दर्शन [ पाद २
नहीं है, जिससे कि इसे वेदविरोधी शास्त्र कहा जा सके। इस प्रसङ्गद्वारा भक्ति-
शास्त्रकी महिमाका ही प्रतिपादन किया गया है। छान्दोग्योपनिषद्मे नारदजीके
विषयमें भी ऐसा ही प्रसङ्ग आया है। नारदजीने सनत्कुमारजीसे कहा है, 'मैंने
समस्त वेद, वेदाङ्ग, इतिहास, पुराण आदि पढ़ लिये तो भी मुझे आत्मतत्त्वका
अनुभव नहीं हुआ।' यह कथन वेदादि शास्त्रोंको तुच्छ बतानेके लिये नहीं,
आत्मज्ञानकी महत्ता सूचित करनेके लिये है। उसी प्रकार पाञ्चरात्रमें शाण्डिल्य-
का प्रसङ्ग भी वेदोंकी तुच्छता बतानेके लिये नहीं, अपितु भक्तिशास्त्रकी महिमा
प्रकट करनेके लिये आया है; अतः वह शास्त्र सर्वथा निर्दोष एवं वेदानुकूल है।
दूसरा पाद सम्पूर्ण।

तीसरा पाद
सम्बन्ध—इस शास्त्रमें जो ब्रह्मके लक्षण बताये गये हैं, उनमें स्मृति और
न्यायसे जो विरोध प्रतीत होता है, उसका निर्णयपूर्वक समाधान तो इस अध्याय-
के पहले पादमें किया गया, उसके बाद दूसरे पादमें अपने सिद्धान्तकी सिद्धिके
लिये अनीश्वरवादी नास्तिकोंके सिद्धान्तका तथा ईश्वरको मानते हुए भी उसको
उपादान कारण न माननेवालोंके सिद्धान्तका युक्तियोंद्वारा निराकरण किया गया ।
साथ ही भागवतमतमे जो इस ग्रन्थके सिद्धान्तसे विरोध प्रतीत होता था,
उसका समाधान करके उस पादकी समाप्ति की गयी । अब पूर्व प्रतिज्ञानुसार
परब्रह्मको समस्त प्रपञ्चका अभिन्ननिमित्तोपादान कारण माननेमें जो श्रुतियोंके
वाक्योंसे विरोध प्रतीत होता है, उसका समाधान करनेके लिये तथा जीवात्माके
स्वरूपका निर्णय करनेके लिये तीसरा पाद आरम्भ किया जाता है—
श्रुतियोंमें कहीं तो कहा है कि परमेश्वरने पहले-पहल तेजकी रचना की,
उसके बाद तेजसे जल और जलसे अन्न—इस क्रमसे जगत्की रचना हुई ।
कहीं कहा है कि पहले-पहल आकाशकी रचना हुई, उससे वायु आदिके क्रमसे
जगत्की उत्पत्ति हुई । इस प्रकारके विकल्पोंकी एकता करके समाधान करनेके
लिये पूर्वपक्षकी उत्थापना करते हैं—
न वियदश्रुतेः ॥ २ । ३ । १ ॥
वियत्=आकाश; न=उत्पन्न नहीं होता; अश्रुतेः=क्योकि ( छान्दोग्यो-
पनिषद्के सृष्टि-प्रकरणमे ) उसकी उत्पत्ति नहीं सुनी गयी है ।
व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्में जहाँ जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया है, वहाँ
पहले-पहल तेजकी रचना बतायी गयी है ।* फिर तेज, जल और अन्न—इन
तीनोंके सम्मेलनसे जगत्की रचनाका वर्णन है (छा० उ० ६ । २ । १ से
६ । ३ । ४ तक ), वहाँ आकाशकी उत्पत्तिका कोई प्रसङ्ग नहीं है तथा आकाशको
विभु ( व्यापक ), माना गया है ( गीता १३ । ३२ ) । इसलिये यह सिद्ध
होता है कि आकाश नित्य है, वह उत्पन्न नहीं होता ।

  • 'तत्तेजोऽसृजत ।' ( छा० उ० ६ । २ । ३ )
    वे० द० ११—

१६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
सम्बन्ध—इस शङ्काके उत्तरमें कहते हैं—
अस्ति तु ॥ २ । ३ । २ ॥
तु=किन्तु ( दूसरी श्रुतिमे ); अस्ति=आकाशकी उत्पत्तिका वर्णन भी है।
व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्में 'ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनन्त है' इस
प्रकार ब्रह्मके लक्षण बताकर फिर उसी ब्रह्मसे आकाशकी उत्पत्ति बतायी गयी है,*
इसलिये यह कहना ठीक नहीं कि वेदमें आकाशकी उत्पत्तिका वर्णन नहीं है।
सम्बन्ध—उक्त विषयको स्पष्ट करनेके लिये पुनः पूर्वपक्षको उठाया जाता है—
गौण्यसम्भवात् ॥ २ । ३ । ३ ॥
असम्भवात्=आकाशकी उत्पत्ति असम्भव होनेके कारण; गौणी=यह
श्रुति गौणी है।
व्याख्या—अवयवरहित और विभु होनेके कारण आकाशका उत्पन्न होना
नहीं बन सकता, अतः तैत्तिरीयोपनिषद्मे जो आकाशकी उत्पत्ति बतायी है, उस
कथनको गौण समझना चाहिये, वहाँ किसी दूसरे अभिप्रायसे आकाशकी उत्पत्ति
कही गयी होगी।
सम्बन्ध—पूर्वपक्षकी ओरसे अपने पक्षको दृढ करनेके लिये दूसरा हेतु दिया
जाता है—
शब्दाच्च ॥ २ । ३ । ४ ॥
शब्दात्=शब्दप्रमाणसे; च=भी ( यह सिद्ध होता है कि आकाश उत्पन्न
नहीं हो सकता )।
व्याख्या—बृहदारण्यकमें कहा है कि 'वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतम्'—'वायु
और अन्तरिक्ष—यह अमृत है' ( बृह० उ० २ । ३ । ३ ), अतः जो अमृत हो,
उसकी उत्पत्ति नहीं हो सकती; तथा यह भी कहा है कि 'जिस प्रकार यह
आकाश अनन्त है, उसी प्रकार आत्माको अनन्त समझना चाहिये।'
'आकाशशरीरं ब्रह्म' 'ब्रह्मका शरीर आकाश है' ( तै० उ० १ । ६ । २ ) इन

  • तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः । आकाशाद्वायुः । वायोरग्निः ।
    अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी । इत्यादि । ( तै० उ० २ । १ । १ )