ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र १८-२१ ] अध्याय १ १३
सूत्र १८-२१ ] अध्याय १ १३
का जड प्रकृतिमे अथवा अपने ही-जैसे परतन्त्र दूसरे किसी जीवमे लय होना
नहीं बन सकता। इसलिये एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही 'आनन्दमय' शब्दका
वाच्यार्थ है और वही सम्पूर्ण जगत्का कारण है; दूसरा कोई नहीं।
सम्बन्ध—तैत्तिरीय-श्रुतिमें जहाँ आनन्दमयका प्रकरण आया है, वह
'विज्ञानमय' शब्दसे जीवात्माको ग्रहण किया गया है, किन्तु बृहदारण्यक
( ४ । ४ । २२ ) में 'विज्ञानमय' को हृदयाकाशमें शयन करनेवाला अन्तरात्मा
बताया गया है। अतः जिज्ञासा होती है कि वहाँ 'विज्ञानमय' शब्द जीवात्मा-
का वाचक है अथवा ब्रह्मका ? इसी प्रकार छान्दोग्य ( १ । ६ । ६ ) में जो
सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुषका वर्णन आया है, वहाँ भी यह शङ्का हो
सकती है कि इस मन्त्रमें सूर्यके अधिष्ठाता देवताका वर्णन हुआ है या ब्रह्मका ?
अतः इसका निर्णय करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ॥ १ । १ । २० ॥
अन्तः = हृदयके भीतर शयन करनेवाला विज्ञानमय तथा सूर्यमण्डलके भीतर
स्थित हिरण्मय पुरुष ब्रह्म है; तद्धर्मोपदेशात् = क्योकि ( उसमे ) उस ब्रह्मके
धर्मोंका उपदेश किया गया है।
व्याख्या—उपर्युक्त बृहदारण्यक-श्रुतिमे वर्णित विज्ञानमय पुरुषके लिये इस
प्रकार विशेषण आये हैं—'सर्वस्य वशी सर्वस्येशान. सर्वस्याधिपतिः' एष
सर्वेश्वर एष भूतपालः' इत्यादि। तथा छान्दोग्यवर्णित सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती पुरुषके
लिये 'सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः' ( सब पापोंसे ऊपर उठा हुआ ) यह विशेषण दिया
गया है। ये विशेषण परब्रह्म परमेश्वरमें ही सम्भव हो सकते हैं। किसी भी स्थिति-
को प्राप्त देव, मनुष्य आदि योनियोंमें रहनेवाले जीवात्माके ये धर्म नहीं हो सकते।
इसलिये वहाँ परब्रह्म परमेश्वरको ही विज्ञानमय तथा सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय
पुरुष समझना चाहिये; अन्य किसीको नहीं।
सम्बन्ध—इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं—
भेदव्यपदेशाच्चान्यः ॥ १ । १ । २१ ॥
च=तथा; भेदव्यपदेशात् = भेदका कथन होनेसे; अन्यः = सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती
हिरण्मय पुरुष सूर्यके अधिष्ठाता देवतासे भिन्न है।
१४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
व्याख्या-बृहदारण्यकोपनिषद्के अन्तर्यामिब्राह्मणमें कहा है कि- 'य
आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य आदित्यमन्तरो
यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।' अर्थात् जो सूर्यमें रहनेवाला सूर्यका अन्तर्वर्ती
है, जिसे सूर्य नहीं जानता, सूर्य जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर सूर्यका
नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ।' इस प्रकार वहाँ
सूर्यन्तर्वर्ती पुरुषका सूर्यके अधिष्ठाता देवतासे भेद बताया गया है; इसलिये वह
हिरण्मय पुरुष सूर्यके अधिष्ठातासे भिन्न परब्रह्म परमात्मा ही है ।
सम्बन्ध-यहाँतकके विवेचनसे यह सिद्ध किया गया कि जगत्की उत्पत्ति,
स्थिति और प्रलयका निमित्त और उपादान कारण परब्रह्म परमेश्वर ही है;
जीवात्मा या जड प्रकृति नहीं। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि श्रुति (छा० उ०
१ । ९ । १ ) में जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण आकाशको भी
बताया गया है, फिर ब्रह्मका लक्षण निश्चित करते हुए यह कैसे कहा गया
कि जिससे जगत्के जन्म आदि होते हैं, वह ब्रह्म है । इसपर कहते हैं-
आकाशस्तल्लिङ्गात् ॥ १ । १ । २२ ॥
आकाशः=( वहाँ ) 'आकाश' शब्द परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है;
तल्लिङ्गात्=क्योकि ( उस मन्त्रमे ) जो लक्षण बताये गये हैं, वे उस ब्रह्मके ही हैं।
व्याख्या-छान्दोग्य ( १ । ९ । १ ) में इस प्रकार वर्णन आया है-
'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशम्प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो
ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् ।' अर्थात् 'ये समस्त भूत ( पञ्चतत्त्व और
समस्त प्राणी ) निःसन्देह आकाशसे ही उत्पन्न होते है और आकाशमे ही विलीन
होते हैं । आकाश ही इन सबसे श्रेष्ठ और बड़ा है । वही इन सबका परम
आधार है ।' इसमे आकाशके लिये जो विशेषण आये है, वे भूताकाशमे सम्भव
नहीं हैं; क्योंकि भूताकाश तो स्वयं भूतोंके समुदायमे आ जाता है । अतः उससे
भूतसमुदायकी या प्राणियोंकी उत्पत्ति बतलाना सुसङ्गत नहीं है । उक्त लक्षण
एकमात्र परब्रह्म परमात्मामे ही सङ्गत हो सकते है । वही सर्वश्रेष्ठ, सबसे बड़ा
और सर्वाधार है; अन्य कोई नहीं । इसलिये यही सिद्ध होता है कि उस श्रुतिमे
'आकाश' नामसे परब्रह्म परमेश्वरको ही जगत्का कारण बताया गया है ।