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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र २२-२३ ] अध्याय ३ २४३

सूत्र २२-२३ ] अध्याय ३ २४३
वर्णन करके यह भाव दिखाया गया कि इनमें जो जड अंश है, वह तो उसकी
अपरा प्रकृतिका विस्तार है और जो चेतन है, वह जीवात्मारूप उसकी परा प्रकृति है
और इन दोनों सत्योंका आश्रयभूत वह परब्रह्म परमेश्वर इनसे भी पर अर्थात् श्रेष्ठ
है। अतः यहाँ 'नेति नेति' श्रुति सगुण परमात्माका प्रतिषेध करनेके लिये नहीं
है; किन्तु इसकी इयत्ता अर्थात् वह इतना ही है, इस परिमित भावका निषेध करके
उस परमेश्वरकी असीमता-अनन्तता सिद्ध करनेके लिये है। इसीलिये 'नेति नेति'
कहकर सत्यके सत्य परमेश्वरका होना सिद्ध किया गया है। अत यह परब्रह्म
परमेश्वर केवल निर्गुण निर्विशेष ही है, सगुण नहीं; ऐसी बात नहीं समझनी चाहिये।
सम्बन्ध-उस परब्रह्म परमात्माके सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूप
वास्तवमें प्राकृत मन-बुद्धि और इन्द्रियोंसे अतीत हैं, इस भावको स्पष्ट करनेके
लिये कहते हैं-
तदव्यक्तमाह हि ॥ ३ । २ । २३ ॥
हि=क्योंकि (श्रुति); तत्=उस सगुण रूपको; अव्यक्तम्=इन्द्रियोंद्वारा जाननेमें
न आनेवाला; आह=कहती है।
व्याख्या-केवल निर्गुण-निराकाररूपसे ही वह परब्रह्म परमेश्वर अव्यक्त
अर्थात् मन-इन्द्रियोंद्वारा जाननेमे न आनेवाला है, इतना ही नहीं, इसीकी भाँति
उसका सगुण स्वरूप भी इन प्राकृत मन और इन्द्रिय आदिका विषय नहीं है;
क्योंकि श्रुति और स्मृतियोंमें उसको भी अव्यक्त कहा गया है। मुण्डकोपनिषद्में
पहले परमेश्वरके सगुण स्वरूपका वर्णन इस प्रकार किया गया है-
यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ।
तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥
'जब यह द्रष्टा ( जीवात्मा ) सबके शासक, ब्रह्माके भी आदिकारण,
समस्त जगत्के रचयिता, दिव्यप्रकाशस्वरूप परम पुरुष परमात्माको प्रत्यक्ष कर
लेता है, उस समय पुण्य-पाप दोनोंकों भलीभाँति धो-बहाकर निर्मल हुआ ज्ञानी
सर्वोत्तम समताको प्राप्त कर लेता है।' (मु० उ० ३ । १ । ३) इसके बाद चौथे-
से सातवें मन्त्रतक सत्य, तप और ज्ञान आदिको उसकी प्राप्तिका उपाय बताया
गया। फिर अनेक विशेषणोंद्वारा उसके स्वरूपका वर्णन करके अन्तमें कहा है-
न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा।

२४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
'यह परमात्मा न तो नेत्रोंसे, न वाणीसे, न दूसरी इन्द्रिय या मनसे और न
कर्मोंसे ही देखा जा सकता है।' इसी प्रकारका वर्णन अन्यान्य श्रुतियोंमें भी
है, विस्तारभयसे यहाँ अधिक प्रमाण नहीं दिये गये हैं।
सम्बन्ध—इससे यह नहीं समझना चाहिये कि परब्रह्म परमेश्वरका किसी
भी अवस्थामें प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होता; क्योंकि—
अपि च संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॥ ३ । २ । २४ ॥
अपि च=इस प्रकार अव्यक्त होनेपर भी; संराधने=आराधना करनेपर
( उपासक परमेश्वरका प्रत्यक्ष दर्शन पाते हैं ); प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्=यह बात
वेद और स्मृति—दोनोंके ही कथनसे सिद्ध होती है।
व्याख्या—श्रुतियों और स्मृतियोमे जहाँ सगुण और निर्गुण परमेश्वरको
इन्द्रियादिके द्वारा देखनेमें न आनेवाला बताया है, वहीं यह भी कहा है कि वह
परमात्मा नामजप, स्मरण, ध्यान आदि आराधनाओंद्वारा प्रत्यक्ष होनेवाला भी
है। (मु० उ० ३ । १ । ८ श्वेता० १ । ३, १०; २ । १५ तथा
श्रीमद्भगवद्गीता ११ । ५४ )। इस तरहके अनेक प्रमाण हैं। वेद और स्मृतियो-
के इन वचनोंमें उस सगुण-निर्गुणस्वरूप परब्रह्म परमात्माको आराधनाके द्वारा
प्रत्यक्ष होनेवाला बताया गया है, इसलिये यह सिद्ध होता है कि उसके प्रत्यक्ष
दर्शन होते है। भगवान्ने स्वयं कहा है—'हे अर्जुन ! अनन्य भक्तिके द्वारा
ही मुझे तत्त्वसे जाना जा सकता है। मेरा दर्शन हो सकता और मुझमें प्रवेश
किया जा सकता है।' (११ । ५४) इसलिये भी यही सिद्ध होता है कि वह
परब्रह्म परमेश्वर अवश्य है और वह सगुण तथा निर्गुण — दोनो ही लक्षणोंवाला है।
सम्बन्ध—उस परमेश्वरका स्वरूप आराधनासे जाननेमें आता है, अन्यथा
नहीं, इस कथनसे तो यह सिद्ध होता है कि वास्तवमें परमात्मा निर्विशेष ही
है, केवल भक्तके लिये आराधनाकालमें सगुण होता है; ऐसी शङ्का होनेपर
कहते हैं—
प्रकाशादिवच्चावैशेष्यं प्रकाशश्च कर्मण्यभ्यासात् ॥ ३ । २ । २५ ॥
प्रकाशादिवत्=अग्नि आदिके प्रकाशादि गुणोंकी भाँति; च=ही;
अवैशेष्यम्=( परमात्मामे भी ) भेद नहीं है; प्रकाशः=प्रकाश; च=भी;
कर्मणि=कर्ममें; अभ्यासात्=अभ्यास करनेसे ही ( प्रकट होता है )।