सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र २०-२३ ] अध्याय ३ २२३

सूत्र २०-२३ ] अध्याय ३ २२३
यहाँ चौथी स्वेदज अर्थात् पसीनेसे उत्पन्न होनेवाली श्रेणीको क्यों छोड़ा गया ?
इसपर कहते हैं—
तृतीयशब्दावरोधः संशोकजस्य ॥ ३ । १ । २१ ॥
संशोकजस्य = पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले जीवसमुदायका; तृतीयशब्दा-
वरोधः = तीसरे नामवाली उद्भिज्ज-जातिमे संग्रह ( समझना चाहिये ) ।
व्याख्या—इस प्रकरणमे जो पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले स्वेदज जीवोका वर्णन
नहीं हुआ, उसका श्रुतिमे तीसरे नामसे कही हुई उद्भिज्ज-जातिमे अन्तर्भाव
समझना चाहिये; क्योकि दोनो ही पृथिवी और जलके संयोगसे उत्पन्न होते हैं ।
सम्बन्ध—अब स्वर्गलोकसे लौटनेकी गतिपर विचार करनेके लिये अगला
प्रकरण आरम्भ किया जाता है। छान्दोग्योपनिषद् ( ५ । १० । ५,६ ) मे
कहा गया है कि स्वर्गसे लौटनेवाले जीव पहले आकाशको प्राप्त होते हैं, आकाश-
से वायु, धूम, मेघ आदिके क्रमसे उत्पन्न होते हैं। यहाँ यह जिज्ञासा होती
है कि जीव उन-उन आकाश आदिके रूपमें स्वयं परिणत होते हैं या उनके
समान हो जाते हैं ? इसपर कहते हैं—
तत्साभाव्यापत्तिरुपपत्तेः ॥ ३ । १ । २२ ॥
तत्साभाव्यापत्तिः = उनके सदृश भावकी प्राप्ति होती है; उपपत्तेः = क्योकि
यही बात युक्तिसे सिद्ध होती है ।
व्याख्या—यहाँ जो आकाश, वायु आदि बनकर लौटनेकी बात कही गयी है,
इस कथनसे जीवात्माका उन-उन तत्त्वोके रूपमे परिणत होना युक्तिसंगत नहीं है,
क्योकि आकाश आदि पहलेसे विद्यमान है और जीवात्मा जब एकके बाद दूसरे
भावको प्राप्त हो जाते है, उसके बाद भी वे आकाशादि पदार्थ रहते ही हैं । इसलिये
यही मानना युक्तिसंगत है कि वे उन आकाश आदिके सदृश आकारवाले बनकर
लौटते है । उनका आकाशके सदृश सूक्ष्म हो जाना ही आकाशको प्राप्त होना
है । इसी प्रकार वायु आदिके विषयमे भी समझ लेना चाहिये ।
सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि वे जीव उन-उन तत्त्वोंके आकारमें बहुत
दिनोंतक टिके रहते हैं या तत्काल ही क्रमसे नीचे उतरते जाते हैं, इसपर कहते हैं—
नातिचिरेण विशेषात् ॥ ३ । १ । २३ ॥
विशेषात् = ऊपर गमनकी अपेक्षा नीचे उतरनेकी परिस्थितिमें भेद होनेके

२२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
कारण; नातिचिरेण=जीव उन आकाश, वायु आदिके रूपमे अधिक कालतक
न रहकर क्रमशः नीचे उतर आते है।
व्याख्या-ऊपरके लोकमे जानेका जो वर्णन है, वह कर्मोंके फलभोगसे
सम्बन्ध रखता है, इसलिये बीचमें आये हुए पितृलोक आदिमें विलम्ब होना भी
सम्भव है, परन्तु लौटते समय कर्मभोग तो समाप्त हो जाते हैं, इसलिये बीचमें
कहीं विलम्ब होनेका कोई कारण नहीं रहता । इस प्रकार ऊपरके लोकोंमें जाने
और वहाँसे लौटनेकी गतिमे विशेषता होनेके कारण यही सिद्ध होता है कि लौटते
समय रास्तेमे विलम्ब नहीं होता ।
सम्बन्ध-अब यह जिज्ञासा होती है कि परलोकसे लौटनेवाले उस जीवात्मा-
का जो धान, जौ, तिल और उड़द आदिके रूपमें होना कहा गया है, उसका
क्या भाव है ? क्या वह स्वयं वैसा बन जाता है या उस योनिको भोगनेवाला
जीवात्मा कोई दूसरा होता है, जिसके साथमें यह भी रहता है, इसपर कहते हैं—
अन्याधिष्ठितेषु पूर्ववदभिलापात् ॥ ३ । १ । २४ ॥
पूर्ववत्=पहलेकी भाँति ही; अभिलापात्=यह कथन है, इसलिये;
अन्याधिष्ठितेषु=दूसरे जीवात्मा अपने कर्मफलभोगके लिये जिनमे स्थित हो रहे
हैं, ऐसे धान, जौ आदिमें केवल सन्निधिमात्रसे इसका निवास है ।
व्याख्या-जिस प्रकार पूर्वसूत्रमे यह बात कही गयी है कि वह लौटनेवाला
जीवात्मा आकाश आदि नहीं बनता, उनके सदृश होकर ही उनसे संयुक्त होता
है, उसी प्रकार यहाँ धान आदिके विषयमे भी समझना चाहिये; क्योकि यह
कथन भी पहलेके सदृश ही है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि उन धान,
जौ आदिमे अपने कर्मोंका फल भोगनेके लिये जो दूसरे जीव पहलेसे ही स्थित
हैं, उनसे संयुक्त होकर ही यह चन्द्रलोकमे लौटनेवाला जीवात्मा उनके साथ-साथ
पुरुषके उदरमे चला जाता है; धान, जौ आदि स्थावर-योनियोंको प्राप्त नहीं होता।
सम्बन्ध-इसपर शङ्का उपस्थित करके ग्रन्थकार उसका निराकरण करते हैं -
अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ॥ ३ । १ । २५ ॥
चेत्=यदि कहा जाय कि; अशुद्धम्=यह तो अशुद्ध ( पाप ) कर्म होगा; इति
न=तो ऐसी बात नहीं है; शब्दात्=श्रुतिके वचनसे इसकी निर्दोषता सिद्ध होती है।
व्याख्या-यदि यह शङ्का की जाय कि अनाजके प्रत्येक दानेमें जीव रहता