ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र २०—२३ ] अध्याय ३ २६९
सूत्र २०—२३ ] अध्याय ३ २६९
दर्शयति च ॥ ३ । ३ । २२ ॥
दर्शयति च=श्रुति यही बात दिखलाती भी है।
व्याख्या—जहाँ इस प्रकार स्थान और नामका भेद हो, वहाँ एक जगह
कहे हुए गुण दूसरी जगह नहीं लिये जाते; यह बात श्रुतिद्वारा इस प्रकार
दिखलायी गयी है। छान्दोग्योपनिषद्मे आधिदैविक सामके प्रसङ्गमे सूर्यस्थ
पुरुषका वर्णन करके फिर आध्यात्मिक सामके प्रसङ्गमें आँखमे स्थित पुरुषका
वर्णन किया गया है और वहाँ सूर्यस्थ पुरुषके नाम-रूप आदिका आँखमें स्थित
पुरुषमे भी श्रुतिने स्वय विधान करके दोनोकी एकता की है (छा० उ० १ । ७ ।
५ ) इससे यह सूचित होता है कि ऐसे स्थलोमें विद्याकी एकता मानकर एकके
गुणोका अन्यत्र उपसंहार नहीं करना चाहिये; क्योकि ऐसे स्थलोंपर यदि
सामान्यतः विद्याकी एकता मानकर गुणोका उपसंहार अभीष्ट होता तो उक्त
प्रसङ्गमे श्रुति स्वयं सूर्यमे स्थित पुरुषके गुणोंका नेत्रवर्ती पुरुषमे विधान नहीं करती।
सम्बन्ध—नेत्रवर्ती तथा सूर्यमण्डलवर्ती आदि पुरुषोंमे ब्रह्मके किन-किन
गुणोका उपसंहार (अध्याहार) नहीं किया जा सकता ? इसका निर्णय ग्रन्थकार
दो सूत्रोंद्वारा करते है—
संभृतिद्युव्याप्त्यपि चातः ॥ ३ । ३ । २३ ॥
च=तथा; अतः = इसीलिये अर्थात् विद्याकी एकता न होनेके कारण ही;
संभृतिद्युव्याप्ती-समस्त लोकोको धारण करना तथा द्युलोक आदि अखिल
ब्रह्माण्डको व्याप्त करके स्थित होना—ये दोनों ब्रह्मसम्बन्धी गुण; अपि=भी
अन्यत्र (नेत्रान्तर्वर्ती आदि पुरुषोंमे) नहीं लेने चाहिये।
व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद् ( ३ । ८ । ३ ) मे गार्गी और याज्ञवल्क्य-
के संवादका वर्णन आता है। वहाँ गार्गिने याज्ञवल्क्यसे पूछा है—'जो द्युलोक-
मे ऊपर है, जो पृथिवीसे नीचे है और जो द्युलोक एवं पृथिवीके मध्यमे है तथा
स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं; इनके सिवा जिसे भूत, वर्तमान और
भविष्य कहते हैं; वह सब किसमे ओतप्रोत है ?' इसके उत्तरमे याज्ञवल्क्यने
कहा—'द्युलोकसे ऊपर और पृथिवीसे नीचेतक यह सब कुछ आकाशमें ओत-
प्रोत है।' ( ३ । ८ । ४)। गार्गिने पूछा—'आकाश किसमे ओतप्रोत है?'
( ३ । ८ । ७) याज्ञवल्क्य बोले—'गार्गि ! उस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्ता पुरुष
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अक्षर कहते है, वह न मोटा है, न पतला है, न छोटा है, न बड़ा है, न लाल
है, न चिकना है, न छाया है, न तम है, न वायु है, न आकाश है, न सङ्ग है,
न रस है, न गन्ध है, न नेत्र है, न कान है, न वाणी है, न मन है, न तेज है,
न प्राण है, न मुख है, न माप है, न भीतर है, न बाहर है, वह कुछ भी नहीं
खाता, उसे कोई भी नहीं खाता ।' ( ३ । ८ । ८ ) इस प्रकार अक्षरब्रह्मके
स्वरूपका वर्णन करके याज्ञवल्क्यने यह भी बताया कि 'ये सूर्य, चन्द्रमा, द्युलोक
और पृथिवी आदि इसीके शासनमे है, इसीने इन सबको धारण कर रक्खा है।'
( ३ । ८ । ९ ) । इस प्रसङ्गमें अक्षरब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन करते
हुए दो बातें मुख्यरूपसे बतायी गयी है, एक तो वह द्युलोकसे ऊपर
और पृथिवीके नीचेतक समस्त ब्रह्माण्डमे व्याप्त है और दूसरी बात
यह है कि वही सबको धारण करनेवाला है । इन दोनो गुणोका नेत्रान्त-
र्वती और सूर्यमण्डलवर्ती पुरुषोमे अध्याहार नहीं किया जा सकता; क्योकि
प्रतीक उपासनाके लिये सीमित स्थानोमे स्थित कहे हुए पुरुष न तो सर्वव्यापक
हो सकते हैं और न सबको धारण ही कर सकते है। इसी प्रकार अन्यत्र भी,
जहाँ पूर्ण ब्रह्मका वर्णन नहीं है, उन प्रतीकोंमें इन गुणोंका उपसंहार नहीं हो
सकता; यह भलीभाँति समझ लेना चाहिये ।
सम्बन्ध- 'उक्त पुरुषोंमें ब्रह्मके गुणोंका उपसंहार न हो, यह तो ठीक है,
परन्तु पुरुषविद्यामें जो पुरुषके गुण बताये गये है, उनका उपसंहार तो अन्यत्र
जहाँ-जहाँ पुरुषोंका वर्णन हो, उन सबमें होना ही चाहिये ।' ऐसी आशङ्का
होनेपर कहते हैं—
पुरुषविद्यायामिव चेतरेषामनाम्नानात् ॥ ३ । ३ । २४ ॥
पुरुषविद्यायाम् = पुरुषविद्यामे जो गुण बताये गये है; इव = वैसे गुण;
च = भी; इतरेषाम् = अन्य पुरुषोके नहीं हो सकते; अनाम्नानात् = क्योकि
श्रुतिमे उनके ऐसे गुण कहीं नहीं बताये गये है ।
व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्मे ( २ । १ । २ से १० तक ) अक्षरब्रह्मका
पुरुषके नामसे वर्णन किया गया है । वहाँ पहले अक्षरब्रह्मसे सबकी उत्पत्ति
और उन्हींमें सबका लय ( २ । १ । १ ) बताकर उसे दिव्य अमूर्त पुरुष
कहा गया है ( २ । १ । २ ) । फिर २ । १ । ३ से लेकर २ । १ । ९