ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ४५--४७ ] अध्याय ३ २८९
सूत्र ४५--४७ ] अध्याय ३ २८९
सम्बन्ध—उसी बातको दृढ करते हैं—
अतिदेशाच्च ॥ ३ । ३ । ४६ ॥
अतिदेशात्=अतिदेशसे अर्थात् विद्याके समान कर्मोंको मुक्तिमें हेतु बताया
जानेके कारण; च=भी ( ऊपर कही हुई बात सिद्ध होती है )।
व्याख्या—केवल प्रकरणके बलपर ही कर्म मुक्तिमे हेतु सिद्ध होता है, ऐसी
बात नहीं है । श्रुतिने विद्याके समान ही कर्मका भी फल बताया है । यथा—
'त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू ।' ( क० उ० १ । १ । १७ ) अर्थात् 'यज्ञ, दान,
और तपरूप तीन कर्मोंको करनेवाला मनुष्य जन्म-मृत्युसे तर जाता है ।' इससे
भी कर्मोंका मुक्तिमे हेतु होना सिद्ध होता है ।
सम्बन्ध—पहले दो सूत्रोंमें उठाये हुए पूर्वपक्षका सूत्रकार उत्तर देते हैं—
विद्यैव तु निर्धारणात् ॥ ३ । ३ । ४७ ॥
तु=किन्तु; निर्धारणात्=श्रुतियोद्वारा निश्चितरूपमे कह दिया जानेके
कारण; विद्या एव=केवलमात्र ब्रह्मविद्या ही मुक्तिमे कारण है ( कर्म नहीं ) ।
व्याख्या—श्रुतिमे कहा-है कि 'तमेव विदित्वाऽति मृत्युमेति नान्यः पन्था
विद्यतेऽयनाय ।' अर्थात् 'उस परब्रह्म परमात्माको जानकर ही मनुष्य जन्म-मरणको
लाँघ जाता है । परमपद ( मोक्ष ) की प्राप्तिके लिये दूसरा कोई मार्ग
( उपाय ) नहीं है,' ( श्वेता० उ० ३ । ८ ) । इस प्रकार यहाँ निश्चितरूपसे एकमात्र
ब्रह्मज्ञानको ही मुक्तिका कारण बताया गया है; इसलिये ब्रह्मविद्या ही मुक्तिका
हेतु है, कर्म नहीं । ब्रह्मविद्याका उपदेश देते समय नचिकेतासे स्वयं यमराजने
ही कहा है कि—
एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥
'जो सब प्राणियोंका अन्तर्यामी, एक, अद्वितीय तथा सबको अपने वशमे
रखनेवाला है, जो अपने एक ही रूपको बहुत प्रकारसे बना लेता है, उस
अपने ही हृदयमे स्थित परमेश्वरको जो ज्ञानी देखते हैं, उन्हींको सदा रहनेवाला
आनन्द प्राप्त होता है, दूसरोंको नहीं ।' ( क० उ० २ । २ । १२ ) । अतः
पहले अग्निविद्याके प्रकरणमे जो जन्म-मृत्युसे छूटना और अत्यन्त शान्तिकी
वे० द० १९—
२९० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
प्राप्तिरूप फल बताया है, वह कथन स्वर्गलोककी स्तुति करनेके लिये गौणरूपसे
है, ऐसा समझना चाहिये ।
सम्बन्ध—उसी बातको दृढ़ करते हैं—
दर्शनाच्च ॥ ३ । ३ । ४८ ॥
दर्शनात्=श्रुतिमे जगह-जगह ब्रह्मज्ञानसे मुक्तिकी प्राप्तिका वर्णन देखा जानेसे;
च=भी ( यही दृढ़ होता है ) ।
व्याख्या—श्रुतिमे यज्ञादि कर्मोंका फल स्वर्गलोकमें जाकर वापस आना
( मु० उ० १ । २ । ९, १० ) और ब्रह्मज्ञानका फल जन्म-मरणसे छूटकर
परमात्माको प्राप्त हो जाना ( मु० उ० ३ । २ । ५, ६ ) बताया गया है, इससे भी
यही सिद्ध होता है कि एकमात्र ब्रह्मविद्या ही मुक्तिमे हेतु है, यज्ञादि कर्म नहीं ।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पूर्वपक्षका उत्तर देते हुए इस प्रकरणको समाप्त
करते हैं—
श्रुत्यादिबलीयस्त्वाच्च न बाधः ॥ ३ । ३ । ४९ ॥
श्रुत्यादिबलीयस्त्वात्=प्रकरणकी अपेक्षा श्रुतिप्रमाण और लक्षण आदि
बलवान् होनेके कारण; च=भी; बाधः=प्रकरणके द्वारा सिद्धान्तका बाध; न=
नहीं हो सकता ।
व्याख्या—वेदके अर्थ और भावका निर्णय करनेमे प्रकरणकी अपेक्षा श्रुतिका
वचन और लक्षण आदि अधिक बलवान् माने जाते हैं, इसलिये प्रकरणसे सिद्ध
होनेवाली बातका निराकरण करनेवाले बहुत-से श्रुतिप्रमाण हों तथा उसके विरुद्ध
लक्षण भी पाये जायँ तो केवल प्रकरणकी यह सामर्थ्य नहीं है कि वह सिद्धान्तमें
बाधा उपस्थित कर सके । इससे यही सिद्ध होता है कि परमात्माका साक्षात्
करनेके लिये बताये हुए उपासनादि उपाय अर्थात् ब्रह्मविद्या ही परमात्माकी प्राप्ति
और जन्म-मरणसे छूटनेका साधन है, सकाम यज्ञ आदि कर्म नहीं।
सम्बन्ध—अब श्रुतिमें बताये हुए ब्रह्मविद्याके फलभेदका निर्णय करनेके
लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है।
सभी ब्रह्मविद्याओंका उद्देश्य एकमात्र परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार करा देना
और इस जीवात्माको सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे मुक्त कर देना है, फिर