ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र २०-२१ ] अध्याय १ ३७
सूत्र २०-२१ ] अध्याय १ ३७
सम्बन्ध—उन्नीसवें सूत्रमे यह बात कही गयी है कि द्रष्टापन आदि
चेतनके धर्म जड प्रकृतिमे नहीं घट सकते; इसलिये वह अन्तर्यामी नहीं हो
सकती । इसपर यह जिज्ञासा होती है कि मुण्डकोपनिषद्में जिसको अदृश्यता,
अग्राह्यता आदि धर्मोंसे युक्त बतलाकर अन्तमे भूतोंका कारण बताया गया है,
वह तो प्रकृति हो सकती है; क्योंकि उस जगह बताये हुए सभी धर्म प्रकृतिमें
पाये जाते हैं। इसपर कहते हैं—
अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः ॥ १ । २ । २१ ॥
अदृश्यत्वादिगुणकः=अदृश्यता आदि गुणोंवाला परब्रह्म परमेश्वर ही है;
धर्मोक्तेः=क्योंकि उस जगह उसीके सर्वज्ञता आदि धर्मोंका वर्णन है ।
व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्मे यह प्रसङ्ग आया है कि महर्षि शौनक विधि-
पूर्वक अङ्गिरा ऋषिकी शरणमे गये । वहाँ जाकर उन्होने पूछा—'भगवन् !
किसको जान लेनेपर यह सब कुछ जाना हुआ हो जाता है ?' इसपर
अङ्गिराने कहा—'जानने योग्य विद्याएँ दो हैं, एक अपरा, दूसरी परा । उनमेसे
अपरा विद्या तो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण,
निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष है और परा वह है, जिससे उस अक्षर ब्रह्मको
जाना जाता है ।' यह कहकर उस अक्षरको समझानेके लिये अङ्गिराने
उसके गुण और धर्मोंका वर्णन करते हुए ( मु० १ । १ । ६ मे ) कहा—
'यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम् ।
नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं तद् भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥'
अर्थात् 'जो इन्द्रियोंद्वारा अगोचर है, पकड़नेमे आनेवाला नहीं है, जिसका
कोई गोत्र नहीं है, वर्ण नहीं है, जो आँख, कान तथा हाथ-पैरसे रहित है, नित्य,
व्यापक, सर्वत्र परिपूर्ण, अत्यन्त सूक्ष्म और सर्वथा अविनाशी है । उसको
धीर पुरुष देखते है, वह समस्त भूतोका परम कारण है ।'
फिर नवम मन्त्रमे कहा है—
'यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः ।
तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥'
३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
'जो सर्वज्ञ, सबको जाननेवाला है, ज्ञान ही जिसका तप है, उसीसे
यह विराट्रूप समस्त जगत् तथा नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होते हैं।'
यहाँ जिन सर्वज्ञता आदि धर्मोंका वर्णन है, वे परब्रह्म परमेश्वरके ही
हैं। तथा एक ब्रह्मको जान लेनेपर ही सब कुछ जाना हुआ हो सकता है,
अन्य किसीके जाननेसे नहीं। इसलिये उस प्रकरणमें जिसे अदृश्यता आदि
गुणोंवाला बताया गया है, वह परब्रह्म परमात्मा ही है, जीवात्मा या
प्रकृति नहीं।
सम्बन्ध—इसी बातकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति देते हैं—
विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यां च नेतरौ ॥ १ । २ । २२ ॥
विशेषणभेदव्यपदेशाभ्याम् = परमेश्वरसूचक विशेषणोंका कथन होनेसे तथा
प्रकृति और जीवात्मासे उसको भिन्न बताये जानेके कारण; च = भी; इतरौ = जीवात्मा
और प्रकृति; न = अदृश्यता आदि गुणोंवाला जगत्कारण नहीं हो सकते।
व्याख्या—इस प्रकरणमे जिसको अदृश्यता आदि गुणोसे युक्त और सब भूतोंका
कारण बताया गया है, उसके लिये 'सर्वज्ञ' आदि विशेषण दिये गये हैं,
जो न तो प्रधान (जड प्रकृति) के लिये उपयुक्त हो सकते हैं और न
अल्पज्ञ जीवात्माके लिये ही। इसके सिवा, उन दोनोको ब्रह्मसे भिन्न कहा
गया है। मुण्डकोपनिषद् (३। १। ७) मे उल्लेख है कि—'पश्यत्स्विहैव निहितं
गुहायाम्।' अर्थात् वह देखनेवालोके शरीरके भीतर यहीं हृदय-गुफामे छिपा हुआ
है।' इसके अनुसार जीवात्मासे परमात्माकी भिन्नता स्वतः स्पष्ट हो जाती है।
इसके सिवा, मुण्डक० ३। १। २ मे भी कहा है कि—
'समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥'
'शरीररूप वृक्षपर रहनेवाला यह जीवात्मा शरीरमे आसक्त होकर
डूब रहा है। अपनेको असमर्थ समझकर मोहित हो शोक करता रहता है।
परन्तु वह जब वहीं स्थित तथा भक्तजनोद्वारा सेवित अपनेसे भिन्न परमेश्वरको
देख लेता है और उसकी महिमाको समझ लेता है, तब सर्वथा शोकरहित
हो जाता है।' इस प्रकार इस मन्त्रमे स्पष्ट शब्दोद्वारा परमेश्वरको जीवात्मासे
तथा शरीररूपी वृक्षसे भी भिन्न बताया गया है। अतः यहाँ जीव और