ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ३३-३४ ] अध्याय २ १२५
सूत्र ३३-३४ ] अध्याय २ १२५
सम्बन्ध-यदि परब्रह्म परमात्माको जगत्का कारण माना जाय तो उसमें
विषमता ( राग-द्वेषपूर्ण भाव ) तथा निर्दयताका दोष आता है; क्योंकि वह
देवता आदिको अधिक सुखी और पशु आदिको अत्यन्त दुखी बनाता है तथा
मनुष्योंको सुख-दुःखसे परिपूर्ण मध्यम स्थितिमें उत्पन्न करता है । जिन्हें वह
सुखी बनाता है, उनके प्रति उसका राग या पक्षपात सूचित होता है और
जिन्हें दुखी बनाता है, उनके प्रति उसकी द्वेष-बुद्धि एवं निर्दयता प्रतीत
होती है । इस दोषका निराकरण करनेके लिये कहते हैं—
वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्तथा हि दर्शयति ॥ २ । १ । ३४॥
वैषम्यनैर्घृण्ये = ( परमेश्वरमे ) विषमता और निर्दयताका दोष; न = नहीं
आता; सापेक्षत्वात् = क्योंकि वह जीवोंके शुभाशुभ कर्मोंकी अपेक्षा रखकर सृष्टि
करता है; तथा हि = ऐसा ही; दर्शयति = श्रुति दिखलाती है ।
व्याख्या—श्रुतिमें कहा है, 'पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन ।'
( बृह० उ० ३ । २ । १३ ) अर्थात् 'निश्चय ही यह जीव पुण्य-कर्मसे पुण्य-
शील होता—पुण्य-योनिमे जन्म पाता है और पाप-कर्मसे पापशील होता—पाप-
योनिमे जन्म ग्रहण करता है ।' 'साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति ।'
( बृह० उ० ४ । ४ । ५ ) अर्थात् 'अच्छे कर्म करनेवाला अच्छा होता है—
सुखी एवं सदाचारी कुलमे जन्म पाता है और पाप करनेवाला पापात्मा होता
है—पापयोनिमे जन्म ग्रहण करके दुःख उठाता है ।' इत्यादि । इस वर्णनसे
स्पष्ट है कि जीवोंके शुभाशुभ कर्मोंकी अपेक्षा रखकर ही परमात्मा उनको कर्मा-
नुसार अच्छी-बुरी ( सुखी-दुखी ) योनियोमे उत्पन्न करते है । इसलिये अच्छे
न्यायाधीशकी भाँति निष्पक्षभावसे न्याय करनेवाले परमात्मापर विषमता और निर्दयता-
रचनामे समर्थ है । उनकी इस अद्भुत शक्तिको देखकर, सुनकर और समझकर भगवदीय
सत्ता और उनके गुण-प्रभावपर श्रद्धा-विश्वास बढ़ाने और उनकी शरणमें जानेसे मनुष्य
अनायास ही इस भव-बन्धनसे मुक्त हो सकता है । भगवान् सबके सुहृद् हैं, उनकी एक-
एक लीला जगत्के जीवोंके उद्धारके लिये होती है; इस प्रकार उनकी दिव्य लीलाका
रहस्य समझमें आ जानेपर मनुष्यका जगत्मे प्रतिक्षण घटित होनेवाली घटनाओके प्रति
राग-द्वेषका अभाव हो जाता है; उसे किसी भी बातसे हर्ष या शोक नहीं होता । अतः
साधकको इसपर विशेष ध्यान देकर भगवान्के भजन-चिन्तनमे संलग्न रहना चाहिये ।
१२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
का दोष नहीं लगाया जा सकता है। स्मृतियोमे भी जगह-जगह कहा गया है कि
जीवको अपने शुभाशुभ कर्मके अनुसार सुख-दुःखकी प्राप्ति होती है। जैसे
'कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।' (गीता १४ । १६) अर्थात्
'पुण्यकर्मका फल सात्त्विक एवं निर्मल बताया गया है।' इसी प्रकार भगवान्ने
अशुभ कर्ममे रत रहनेवाले असुर-स्वभावके लोगोको आसुरी योनिमे डालनेकी
बात बतायी है।* इन प्रमाणोंसे परमेश्वरमे उपर्युक्त दोषोंका सर्वथा अभाव सिद्ध
होता है; अतः उन्हे जगत्का कारण मानना ठीक ही है।
सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें कही गयी बातपर शङ्का उपस्थित करके उसका निराकरण
करते हैं—
न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वात् ॥ २ । १ । ३५ ॥
चेत्=यदि कहो; कर्माविभागात्=जगत्की उत्पत्तिसे पहले जीव और उनके
कर्मोंका ब्रह्मसे विभाग नहीं था, इसलिये; न=परमात्मा कर्मोंकी अपेक्षासे सृष्टि
करता है, यह कहना नहीं बन सकता; इति न=तो ऐसी-बात नहीं है;
अनादित्वात्=क्योकि जीव और उनके कर्म अनादि है।
व्याख्या—यदि कहो कि जगत्की उत्पत्ति होनेसे पहले तो एकमात्र सत्स्वरूप
परमात्मा ही था† यह बात उपनिषदोमे बार-बार कही गयी है। इससे सिद्ध है
कि उस समय भिन्न-भिन्न जीव और उनके कर्मोंका कोई विभाग नहीं था; ऐसी
स्थितिमे यह कहना नहीं बनता कि जगत्कर्ता परमात्माने जीवोके कर्मोंकी अपेक्षा
रखकर ही भोक्ता, भोग्य और भोग-सामग्रियोके समुदायरूप इस विचित्र
जगत्की रचना की है; जिससे परमेश्वरमे विषमता और निर्दयताका दोष न
आवे। तो ऐसी बात नहीं है; क्योकि जीव और उनके कर्म अनादि है।
श्रुति कहती है, 'धाता यथापूर्वमकल्पयत्।' परमात्माने पूर्व कल्पके अनुसार सूर्य,
- अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥ (गी० १६ । १८-१९)
'जो अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोधका आश्रय ले अपने तथा दूसरोंके शरीरोंमे
अन्तर्यामीरूपसे स्थित मुझ परमेश्वरसे द्वेष रखते हैं, निन्दा करते हैं; उन द्वेषी, क्रूर,
अशुभकर्मपरायण नीच मनुष्योंको मैं निरन्तर संसारमे आसुरी योनियोंमे ही डालता हूँ।'
† 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' (छा० उ० ६ । २ । १)