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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र ७ ] अध्याय ३ २३१

सूत्र ७ ] अध्याय ३ २३१
ऐसा भी कहा गया है कि 'जब यह शयन करता हुआ किसी तरहका स्वप्न
नहीं देखता, सब प्रकारसे सुखी होकर नाड़ियोंमें व्याप्त हो जाता है, उस समय
इसे कोई पाप स्पर्श नहीं कर सकते।' (छा० उ० ८। ६। ३) । भाव यह है
कि उस समय अज्ञातमें इसके शरीरकी क्रियाद्वारा किसी जीवकी हिंसादि पापकर्म
हो जाय तो वह नहीं लगता। तथा कहीं ऐसा भी कहा है कि 'हे सौम्य ! उस
सुषुप्तिके समय यह पुरुष सत्‌से सम्पन्न होता है' (छा० उ० ६। ८। १) एक स्थान-
पर ऐसा वर्णन आता है कि 'उस समय परमात्माके स्पर्शको प्राप्त हुआ यह
जीवात्मा न तो बाहरकी किसी वस्तुको जानता है और न शरीरके भीतरकी
ही किसी वस्तुको जान पाता है' (बृह० उ० ४। ३ । २१)।
इन सब वर्णनोंसे यही मालूम होता है कि नाड़ियोंका मूल और इस
जीवात्मा तथा परब्रह्म परमात्माका निवासस्थान हृदय है, उसी जगह सुषुप्तिमें
जीवात्मा शयन करता है; इसलिये उसकी स्थिति हृदयस्थ नाड़ियोंमें और परमात्मामें
भी बतायी जा सकती है । इसमें कोई विरोध नहीं है । स्थानकी
एकताके कारण ही कहीं उसको ब्रह्मकी प्राप्ति, कहीं प्रलयकी भाँति परमात्माके
साथ संयुक्त होना आदि कहा गया है; परन्तु इससे यह नहीं समझना चाहिये
कि यह भी 'समाधिकी भाँति मुक्तिमें सहायक है । यह तो महान् तामसी सुखका
उपभोग करानेवाली अज्ञानमयी स्थिति है (गीता १८ । ३९) । अतः
शरीररक्षाके लिये कम-से-कम आवश्यक समयतक ही शयन करना चाहिये,
श्रेष्ठ सुखकी बुद्धिसे नहीं।
प्रश्नोपनिषद्‌में स्पष्ट ही यह वर्णन है कि 'वह मन जब तेजसे अर्थात्
उदानवायुसे दब जाता है—उदान-वायु इन्द्रियोंसहित मनको हृदयमें ले जाकर
मोहित कर देता है, तब इसकी सुषुप्ति-अवस्था होती है, उस समय यह स्वप्नको
नहीं देखता। इस शरीरमें जीवात्माको यह सुषुप्तिजनित सुख होता है' (प्र० उ०
४। ६)। इस विषयमें दूसरी श्रुतिमें जो यह बात कही है कि 'उस समय
तेजसे सम्पन्न होता है।' (छा० उ० ८। ६ । ३) वहाँ भी तेजका अर्थ उदान-
वायु ही समझना चाहिये, ब्रह्म नहीं; क्योंकि प्रश्नोपनिषद्‌में तीसरे प्रश्नका उत्तर देते
हुए नवें और दसवें मन्त्रमें स्पष्ट ही उदानवायुकी और तेजकी एकता की गयी
है । अतः ऐसा माननेसे ही वहाँ किये हुए वर्णनके साथ छान्दोग्यश्रुतिकी
एकवाक्यता सिद्ध होगी।

२३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
सम्बन्ध—सुषुप्तिकालमें जो परमात्माके साथ हृदयदेशमें जीवात्माकी
स्थिति बतायी गयी है, उसीकी पुष्टि करते हैं—
अतः प्रबोधोऽस्मात् ॥ ३ । २ । ८ ॥
अतः = इसलिये; अस्मात् = यहाँसे; प्रबोधः = जीवात्माका जगना ( श्रुतिमे
कहा गया है ) ।
व्याख्या—जो वस्तु जिसमें विलीन होती है, वह वहींसे प्रकट भी होती
है । इस न्यायसे जीवात्मा सुषुप्तिका अन्त होनेपर जब जगता है, तब यहाँसे
अर्थात् परमात्माके निवास-स्थान हृदयसे ही जाग्रत् होता है, इसलिये उसके लय
होनेका स्थान भी वही है, यह अपने-आप सिद्ध हो जाता है। यह जगना उस
परमात्माकी ही व्यवस्थासे होता है। जितने समयतक उसके प्रारब्धानुसार
सुषुप्तिका सुखभोग होना चाहिये, उतना समय पूरा हो जानेपर उस परमेश्वरकी
व्यवस्थासे जीवात्मा जाग्रत् हो जाता है; यह भाव भी यहाँ समझ लेना चाहिये ।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जो जीवात्मा सुषुप्ति-अवस्थामें
विलीन होता है, वही जगकर वापस आता है या शरीरके किसी अङ्गमें पड़ा
हुआ दूसरा ही कोई जीव जगता है ? इसपर कहते हैं—
स एव तु कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः ॥ ३ । २ । ९ ॥
तु = निस्संदेह; स एव = वही जगता है; कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः =
क्योंकि कर्म, अनुस्मृति, वेदप्रमाण और कर्म करनेकी आज्ञा इन सबकी सिद्धि
तभी होगी, इसलिये यही मानना ठीक है।
व्याख्या—जो जीवात्मा सोता है, वही जागता है। सोता दूसरा है और
जगता दूसरा है, ऐसा माननेमे बहुत दोष आते हैं। अतः वैसा नहीं माना जा
सकता; क्योंकि यह देखा जाता है कि मनुष्य पहले दिन जिस कर्मको आरम्भ
करता है, उसके शेष भागकी पूर्ति दूसरे-तीसरे दिनोंतक करता रहता है। आधा काम
दूसरेने किया हो और शेष आधे कामको अपना ही छोड़ा हुआ समझकर उसकी पूर्ति
दूसरा करे यह सम्भव नहीं है। तथा जगनेके बाद पहलेकी सब बातोंकी स्मृतिके साथ-
साथ यह भी स्मरण अपने-आप होता ही है कि जो अबतक सोता था, वही मैं अब जगा
हूँ। दूसरे जीवात्माकी कल्पना करनेसे किसी प्रकार भी इसकी सङ्गति नहीं हो