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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र ४०-४१ ] अध्याय ३ २८५

सूत्र ४०-४१ ] अध्याय ३ २८५
आदरात्=वह कथन परमेश्वरके प्रति आदरका प्रदर्शक होनेके कारण;
अलोपः=उसमे अन्य द्रष्टाका लोप अर्थात् निषेध नहीं है ।
व्याख्या-उस परब्रह्म परमेश्वरको सर्वश्रेष्ठ बतलानेके लिये वहाँ आदरकी
दृष्टिसे अन्य द्रष्टाका निषेध किया गया है, वास्तवमे नहीं । भाव यह है कि वह
परब्रह्म परमेश्वर ऐसा द्रष्टा, ऐसा सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता है कि उसकी अपेक्षा अन्य सब
जीव द्रष्टा होते हुए भी नहींके समान हैं; क्योकि उनमे पूर्ण द्रष्टापन नहीं है ।
प्रलयकालमें जड तत्त्वोकी भाँति जीवोंको भी किसी प्रकारका विशेष ज्ञान नहीं
रहता तथा वर्तमानकालमे भी जो जीवोका जानना, देखना, सुनना आदि है,
वह सीमित है और उस अन्तर्यामी परमेश्वरके ही सकाशसे है। (ऐ० उ० १ । ३ । ११)
तथा (प्र० उ० ४ । ९) वही इसका प्रेरक है, अतः यह सर्वथा स्वतन्त्र नहीं है ।
इससे यही सिद्ध होता है कि श्रुतिका वह कहना भगवान्‌की श्रेष्ठता दिखलानेके
लिये है, वास्तवमे अन्य द्रष्टाका निषेध करनेके लिये नहीं है ।
सम्बन्ध-उपर्युक्त कथन परमेश्वरके प्रति आदर सूचित करनेके लिये है, इस
बातको प्रकारान्तरसे सिद्ध करते हैं—
उपस्थितेऽतस्तद्वचनात् ॥ ३ । ३ । ४१ ॥
उपस्थिते=उक्त वचनोसे किसी प्रकार अन्य चेतनका निषेध प्राप्त होनेपर
भी; अतः=इस ब्रह्मकी अपेक्षा अन्य द्रष्टाका निषेध बतानेके कारण ( वह कथन
आदरार्थक ही है ); तद्वचनात् = क्योंकि उन वाक्योंके साथ बार-बार अतः शब्द-
का प्रयोग किया गया है ।
व्याख्या-जहाँ उस परमात्मासे अन्य द्रष्टा, श्रोता आदिका निषेध है
(बृह०'उ० ३ । ७ । २३), वहाँ उस वर्णनमे बार-बार 'अतः' शब्दका प्रयोग किया
गया है, इसलिये यही सिद्ध होता है कि इसकी अपेक्षा या इससे अधिक कोई
द्रष्टा, श्रोता आदि नहीं है । जैसे यह कहा जाय कि इससे अन्य कोई धार्मिक
नहीं है तो इस कथनद्वारा अन्य धार्मिकोसे उसकी श्रेष्ठता बताना ही अभीष्ट
है, न कि अन्य सब धार्मिकोका अभाव बतलाना । उसी प्रकार वहाँ जो यह
कहा गया है कि 'इस परमात्मासे अन्य कोई द्रष्टा आदि नहीं है' उस कथनका भी
यही अर्थ है कि इससे अधिक कोई द्रष्टापन आदि गुणोसे युक्त पुरुष नहीं है; यह
परमात्मा ही सर्वश्रेष्ठ द्रष्टा आदि है; क्योकि उसी वर्णनके प्रसङ्गमे ( बृह० उ० ३ । -

२८६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
७ । २२ ) परब्रह्म परमात्माको जीवात्माका अन्तर्यामी और जीवात्माको उसका
शरीर बताकर दोनोंके भेदका प्रतिपादन किया है। यदि 'नान्योऽतो द्रष्टा' इत्यादि
वाक्योंसे अन्य द्रष्टा अर्थात् जीवात्माका निषेध बताया जाय तो पूर्व वर्णनसे विरोध
आयेगा, इसलिये वहाँ अन्य द्रष्टाके निषेधका तात्पर्य परमात्माको सर्वश्रेष्ठ द्रष्टा
बताकर उसके प्रति आदर प्रदर्शित करना ही समझना चाहिये।
सम्बन्ध—यहाँतक यह निर्णय किया गया कि जीवात्मा और परमात्माका
भेद उपाधिकृत नहीं है तथा उस परब्रह्म परमेश्वरमें जो सर्वज्ञत्व, सर्वशक्तिमत्ता,
सर्वाधारता तथा सर्वसुहृद् होना आदि दिव्य गुण शास्त्रोंमें बताये गये हैं, वे
भी उपाधिकृत नहीं हैं; किन्तु स्वभावसिद्ध और नित्य हैं। जहाँ ब्रह्मके स्वरूपका
प्रतिपादन करते समय उनका वर्णन न हो, वहाँ भी उन सबका अध्याहार कर
लेना चाहिये। अब फलविषयक श्रुतियोंका विरोधाभास दूर करके सिद्धान्त-निर्णय
करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। दहरविद्यामें तथा प्रजापति-
इन्द्रके संवादमें जो ब्रह्मविद्याका वर्णन है, उसके फलमें इच्छानुसार नाना प्रकार-
के भोगोंको भोगनेकी बात कही गयी है (छा० उ० ८।२।१ से १० तक); किन्तु
दूसरी जगह वैसी बात नहीं कही गयी है। अतः यह जिज्ञासा होती है कि
ब्रह्मलोकको प्राप्त होनेवाले सभी साधकोंके लिये यह नियम है या इसमें विकल्प
है ? इसपर कहते हैं—
तन्निर्धारणानियमस्तद्दृष्टेः पृथग्ध्यप्रतिबन्धः
फलम् ॥ ३ । ३ । ४२ ॥
तन्निर्धारणानियमः=भोगोंके भोगनेका निश्चित नियम नहीं है;
तद्दृष्टेः=क्योंकि यह बात उस प्रकरणमे बार-बार 'यदि' शब्दके प्रयोगसे देखी
गयी है; हि=इसके सिवा, दूसरा कारण यह भी है कि; पृथक्=कामोपभोग-
से भिन्न सङ्कल्पवालेके लिये; अप्रतिबन्धः=जन्म-मरणके बन्धनसे छूट जाना
ही; फलम्=फल बताया गया है।
व्याख्या—ब्रह्मलोकमे जानेवाले सभी साधकोंको उस लोकके दिव्य भोगोंका
उपभोग करना पड़े, यह नियम नहीं है; क्योंकि जहाँ-जहाँ ब्रह्मलोककी प्राप्तिका
वर्णन किया गया है, वहाँ सब जगह भोगोंके उपभोगकी बात नहीं कही है
तथा जहाँ कही है, वहाँ भी 'यदि' शब्दका प्रयोग करके साधकके इच्छानुसार