ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 74, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ९-१० ] अध्याय १ ५३
विशेष रूपसे जाननेवाला है, वह आत्मामे ही क्रीडा करनेवाला, आत्मामें ही रति-
वाला, आत्मामे ही जुड़ा हुआ तथा आत्मामे ही आनन्दवाला है।' इत्यादि ।
इन सब धर्मोंकी संगति परब्रह्म परमात्मामे ही लग सकती है, अतः वही इस
प्रकरणमे 'भूमा'के नामसे कहा गया है।
सम्बन्ध—पूर्व प्रकरणमें भूमाके जो धर्म बताये गये हैं, वे ही बृहदारण्य-
कोपनिषद् ( ३ । ८ । ७) में 'अक्षर' के भी धर्म कहे गये हैं। अक्षर शब्द
प्रणवरूप वर्णको भी कहते हैं; अतः यहाँ 'अक्षर' शब्द किसका वाचक है ?
इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
अक्षरमम्बरान्तधृतेः ॥ १ । ३ । १० ॥
अक्षरम् = ( उक्त प्रकरणमे ) अक्षर शब्द परब्रह्म परमात्माका ही वाचक
है; अम्बरान्तधृतेः = क्योकि उसको आकाशपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्को धारण करने-
वाला बताया गया है ।
व्याख्या—यह प्रकरण इस प्रकार है—'स होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य
दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद् भूतं च भवच्च भविष्यच्चे-
त्याचक्षते कस्मिन् तदोतं च प्रोतं चेति ।' ( ३ । ८ । ६) गार्गीने याज्ञवल्क्य-
से पूछा—'याज्ञवल्क्य ! जो द्युलोकसे भी ऊपर, पृथिवीसे भी नीचे और इन
दोनोंके बीचमे भी है तथा जो यह पृथिवी और द्युलोक है, ये सब-के-सब एवं
जिसको भूत, भविष्यत् और वर्तमान कहते हैं, वह काल किसमे ओतप्रोत
है ?' इसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने कहा—'गार्गि ! यह सब आकाशमें
ओतप्रोत है।' इसपर गार्गीने पूछा—'वह आकाश किसमे ओतप्रोत है ?'
( ३ । ८ । ७) तब याज्ञवल्क्यने कहा—'उस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्तालोग 'अक्षर'
कहते हैं।' ( ३ । ८ । ८) इस प्रकार वह अक्षर आकाशपर्यन्त सबको
धारण करनेवाला बताया गया है, इसलिये यहाँ 'अक्षर' नामसे उस परब्रह्म
परमात्माका ही वर्णन है, अन्य किसीका नहीं ।
सम्बन्ध—कारण अपने कार्यको धारण करता है, यह सभी मानते हैं ।
जिनके मतमें प्रकृति ही जगत्का कारण है, वे उसे ही आकाशपर्यन्त सभी
भूतोंको धारण करनेवाली मान सकते हैं। अतः उनके मतके अनुसार यहाँ 'अक्षर'