ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ३७-३९ ] अध्याय ३ २८३
सूत्र ३७-३९ ] अध्याय ३ २८३
होता है, वहाँ ऐसा कथन संगत नहीं होता । यहाँ इस एकताके प्रतिपादनका
प्रयोजन यही जान पड़ता है कि उपासक यदि उपासना-कालमे अपनेको
परमात्माकी भाँति देह और उसके व्यवहारसे सर्वथा असंग तथा नित्य-शुद्ध-बुद्ध-
मुक्त समझकर तद्रूप हो ध्यान करे तो वह शीघ्र ही सच्चिदानन्दघन परब्रह्म
परमात्माको प्राप्त हो जाता है ।
सम्बन्ध-पुनः प्रकारान्तरसे औपाधिक भेदकी मान्यताका निराकरण
करते हैं—
सैव हि सत्यादयः ॥ ३ । ३ । ३८ ॥
सा एव = ( परमात्मा और जीवका औपाधिक भेद तथा वास्तवमे अत्यन्त
अभेद माननेपर ) वही अनुपपत्ति है; हि = क्योकि; सत्यादयः = ( परमात्माके )
सत्यसङ्कल्पत्व आदि धर्म ( जीवात्माके नहीं माने जा सकते ) ।
व्याख्या—जैसे पूर्वसूत्रमें यह अनुपपत्ति दिखा आये हैं कि जीवात्मा और
परमात्मामें अत्यन्त अभेद होनेपर श्रुतिके व्यतिहार-वाक्यद्वारा दोनोंकी एकताका
स्थापन संगत नहीं हो सकना, वैसी ही अनुपपत्ति इस सूत्रमें भी प्रकारान्तरसे
दिखायी जाती है । कहना यह है कि परमात्माके स्वरूपका जहाँ वर्णन किया गया
है, वहाँ उसे सत्यकाम, सत्यसङ्कल्प, अपहतपाप्मा, अजर, अमर, सर्वज्ञ, सर्व-
शक्तिमान्, सबका परम कारण तथा सर्वाधार बताया गया है । ये सत्यकामत्व आदि
धर्म जीवात्माके धर्मोंसे सर्वथा विलक्षण हैं । जीवात्मामें इनका पूर्णरूपसे होना
सम्भव नहीं है। जब दोनोंमें धर्मकी समानता नहीं है, तब उनका अत्यन्त अभेद
कैसे सिद्ध हो सकता है । इसलिये परमात्मा और जीवात्माका भेद उपाधिकृत
है—यह मान्यता असंगत है ।
सम्बन्ध—यदि कहा जाय कि 'परब्रह्म परमेश्वरमें जो सत्यकामत्व आदि
धर्म श्रुतिद्वारा बताये गये हैं, वे स्वाभाविक नहीं, किन्तु उपाधिके सम्बन्धसे हैं,
वास्तवमें ब्रह्मका स्वरूप तो निर्विशेष है । अतः इन धर्मोंको लेकर जीवसे उसकी
भिन्नता नहीं बतायी जा सकती है' तो यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि—
कामादीतरत्र तत्र चायतनादिभ्यः ॥ ३ । ३ । ३९ ॥
( उस परब्रह्मके ) इतरत्र =दूसरी जगह ( बताये हुए ); कामादि =
सत्यकामत्वादि धर्म; तत्र च =जहाँ निर्विशेष स्वरूपका वर्णन है, वहाँ भी हैं;
२८४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
आयतनादिभ्यः = क्योंकि वहाँ उसके सर्वाधारत्व आदि धर्मोंका वर्णन पाया
जाता है ।
व्याख्या—उस परब्रह्म परमेश्वरके जो सत्यसङ्कल्पत्व, सर्वज्ञत्व तथा
सर्वेश्वरत्वादि धर्म विभिन्न श्रुतियोंमे बतलाये गये है, उनका जहाँ निर्विशेष
ब्रह्मका वर्णन है, वहाँ भी अध्याहार कर लेना चाहिये; क्योकि निर्विशेष-
स्वरूपका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोमे भी ब्रह्मके सर्वाधारत्व आदि सविशेष-
धर्मोंका वर्णन है । इसलिये वैसे दूसरे धर्मोंका भी अध्याहार उचित
ही है । बृहदारण्यकमे गार्गीके प्रश्नका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्यने उस परम
अक्षर परमात्माके स्वरूपका वर्णन किया है । वहाँ पहले 'अस्थूलमनणु'
( न स्थूल है न सूक्ष्म है ) इत्यादि प्रकारसे निर्विशेषस्वरूपके लक्षणोका
वर्णन करके अन्तमे कहा है कि 'इस अक्षरके ही प्रशासनमे सूर्य और चन्द्रमा
धारण किये हुए है, उस अक्षरके ही प्रशासनमे द्युलोक और पृथिवी धारण किये
हुए है ।' इस प्रकार याज्ञवल्क्यने यहाँ उस अक्षरब्रह्मको समस्त जगत्का आधार
बतलाया है ( बृह० उ० ३ । ८ । ८-९ ) । इसी तरह मुण्डकोपनिषद्मे 'जाननेमे न
आनेवाला, पकड़नेमे न आनेवाला' इत्यादि प्रकारसे निर्विशेषस्वरूपके धर्मोंका वर्णन
करनेके पश्चात् उस ब्रह्मको नित्य, विभु, सर्वगत, अत्यन्त सूक्ष्म और समस्त
प्राणियोका कारण बताकर उसे विशेष धर्मोंसे युक्त भी कहा गया है ( मु० उ०
१ । १ । ६ ) । इससे यह सिद्ध होता है कि 'वह परमात्मा दोनों प्रकारके
धर्मोंवाला है ।' इसलिये दूसरी जगह कहे हुए सत्यसङ्कल्पत्व, सर्वज्ञत्व आदि जितने
‘भी परमेश्वरके दिव्य गुण है, वे उनमे स्वाभाविक है, उपाधिकृत नहीं है ।
अतः जहाँ जिन लक्षणोका वर्णन नहीं है, वहाँ उनका अध्याहार कर लेना चाहिये । इस
प्रकार परमात्मा और जीवात्मामे समानधर्मता न होनेके कारण उनमे सर्वथा अभेद
नहीं माना जा सकता है ।
सम्बन्ध—यदि जीव और ईश्वरका भेद उपाधिकृत नहीं माना जायगा, तब
तो अनेक द्रष्टाओंकी सत्ता सिद्ध हो जायगी । इस परिस्थितिमें श्रुतिद्वारा जो
यह कहा है कि 'इससे अन्य कोई द्रष्टा नहीं है' इत्यादि, उसकी व्यवस्था कैसे
होगी ? इसपर कहते हैं—
आदरादलोपः ॥ ३ । ३ । ४० ॥