ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ११—१४] अध्याय २ १६७
सूत्र ११—१४] अध्याय २ १६७
अन्नका पौधा उत्पन्न होता है और उससे अन्न उत्पन्न होता है; ऐसा माननेपर
पूर्वापरमें कोई विरोध नहीं रहेगा।
सम्बन्ध—इस प्रकरणमें आकाशकी उत्पत्ति साक्षात् ब्रह्मसे बतायी गयी है
और अन्य चार तत्त्वोंमें एकसे दूसरेकी क्रमशः उत्पत्ति बतायी है।
अतः यह जिज्ञासा होती है कि एक तत्त्वके बाद दूसरे तत्त्वकी रचना साक्षात्
परमेश्वर करता है या एक तत्त्व दूसरे तत्त्वको स्वयं उत्पन्न करता है? इसपर
कहते हैं—
तदभिध्यानादेव तु तल्लिङ्गात्सः ॥ २ । ३ । १३ ॥
तदभिध्यानात् = उन तत्त्वोंके भलीभाँति चिन्तन करनेका कथन होनेसे;
एव = ही; तु = तो (यह सिद्ध होता है कि); सः = वह परमात्मा ही उन सबकी
रचना करता है; तल्लिङ्गात् = क्योंकि उक्त लक्षण उसीके अनुरूप है।
व्याख्या—इस प्रकरणमें बार-बार कार्यके चिन्तनकी बात कही गयी है,
यह चिन्तनरूप कर्म जड़में सम्भव नहीं है, चेतन परमात्मामें ही
सङ्गत हो सकता है, इसलिये यही सिद्ध होता है कि वह परमात्मा स्वयं
ही उत्पन्न किये हुए पहले तत्त्वसे दूसरे तत्त्वको उत्पन्न करता है। इसी उद्देश्यसे
एक तत्त्वसे दूसरे तत्त्वकी उत्पत्तिका कथन है। उन तत्त्वोंको स्वतन्त्र-
रूपसे एक-दूसरेके कार्य-कारण बतानेके उद्देश्यसे नहीं। इसलिये यही
समझना चाहिये कि मुख्यरूपसे सबकी रचना करनेवाला वह पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर
ही है, अन्य कोई नहीं।
सम्बन्ध—इस प्रकार जगत्की उत्पत्तिके वर्णनद्वारा ब्रह्मको जगत्का कारण
बताकर अब प्रलयके वर्णनसे भी इसी बातकी पुष्टि करते हैं—
विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च ॥ २ । ३ । १४ ॥
तु = किन्तु; अतः = इस उत्पत्ति-क्रमसे; क्रमः = प्रलयका क्रम; विपर्ययेण =
विपरीत होता है; उपपद्यते = ऐसा ही होना युक्तिसङ्गत है; च = तथा (स्मृतिमें
भी ऐसा ही वर्णन है)।
व्याख्या—उपनिषदोंमें जगत्की उत्पत्तिका जो क्रम बताया गया है, इससे
विपरीत क्रम प्रलयकालमें होता है। प्रारम्भिक सृष्टिके समय ब्रह्मने आकाश, वायु,
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तेज, जल और पृथिवी आदिके क्रमसे जगत्की उत्पत्ति होती है। फिर जब प्रलय-
काल आता है, तब ठीक उसके विपरीत क्रमसे पृथिवी आदि तत्त्वों-
का अपने कारणोंमें लय होता है। जैसे पृथिवी जलमे, जल अग्निमें, अग्नि वायु-
में, वायु आकाशमें और आकाश परमात्मामें विलीन हो जाता है। युक्तिसे भी
यही क्रम ठीक जान पड़ता है। प्रत्येक कार्य अपने उपादान कारणमें ही लीन
होता है। जैसे जलसे बर्फ बनता है और जलमें ही उसका लय होता है।
स्मृतियोंमें भी ऐसा ही वर्णन आता है। (देखिये विष्णुपुराण अंश ६, अध्याय ४,
श्लोक १४ से ३८ तक)।
सम्बन्ध—यहाँ भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयका क्रम तो बताया गया, परन्तु
मन, बुद्धि और इन्द्रियोंकी उत्पत्तिके विषयमें कोई निर्णय नहीं हुआ; अतः यह
जिज्ञासा होती है कि इन सबकी उत्पत्ति भूतोंसे होती है या परमेश्वरसे ? यदि
परमेश्वरसे होती है तो भूतोंके पहले होती है या पीछे ? अतः इसका निर्णय
करनेके लिये कहते हैं—
अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण तल्लिङ्गादिति
चेन्नाविशेषात् ॥ २ । ३ । १५ ॥
चेत्=यदि कहो; विज्ञानमनसी=इन्द्रियाँ और मन; क्रमेण=उत्पत्ति-क्रम-
की दृष्टिसे; अन्तरा ( स्याताम् )=परमात्मा और आकाश आदि भूतोंके बीचमें
होने चाहिये; तल्लिङ्गात्=क्योंकि ( श्रुतिमे ) यही निश्चय करानेवाला लिङ्ग
(प्रमाण) प्राप्त होता है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; अवि-
शेषात्=क्योंकि श्रुतिमें किसी क्रम-विशेषका वर्णन नहीं है।
व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्में पहले यह वर्णन आया है कि 'जैसे प्रज्वलित
अग्निसे चिनगारियोंकी उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार ये नाना नाम-रूपोंसे संयुक्त
पदार्थ उस परमेश्वरसे उत्पन्न होते हैं और उसीमे विलीन हो जाते हैं।'*
(मु० २ । १ । १) फिर जगत्के कारणरूप उस परमेश्वरके परात्पर स्वरूप-
- यथा सुदीप्तात् पावकाद् विस्फुलिङ्गाः
सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः ।
तथाक्षराद् विविधाः सोम्य भावाः
प्रजायन्ते तत्र चैवापि यन्ति ॥ (मु० उ० २ । १ । १)