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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र १४-१७ ] अध्याय २ २०५

सूत्र १४-१७ ] अध्याय २ २०५
६। ३। २) इस कथनसे यह सिद्ध होता है कि जीवात्माके सहित परमात्माने उक्त
तत्त्वोंमें प्रविष्ट होकर जगत्का विस्तार किया । इसी प्रकार ऐतरेयोपनिषद्के
पहले अध्यायमें जगत्की उत्पत्तिका वर्णन करते हुए यह बताया गया है कि
जीवात्माको सहयोग देनेके लिये जगत्कर्ता परमेश्वरने सजीव शरीरमें प्रवेश किया ।
तथा मुण्डक और श्वेताश्वतरमे ईश्वर और जीवको दो पक्षियोंकी भाँति एक ही
शरीररूप वृक्षपर स्थित बताया गया है । इसी प्रकार कठोपनिषद्मे भी परमात्मा
और जीवात्माको हृदयरूप गुहामे स्थित कहा गया है । इन सब वर्णनोंसे जीवात्मा
और परमेश्वर—इन दोनोका प्रत्येक शरीरमें साथ-साथ रहना सिद्ध होता है।
इसलिये जीवात्माको शरीरका अधिष्ठाता माननेमे किसी प्रकारका विरोध नहीं है ।
सम्बन्ध—श्रुतिमे तत्त्वोंकी उत्पत्तिके पहले या पीछे भी जीवात्माकी उत्पत्ति-
का वर्णन नहीं आया, फिर उस परमेश्वरने सहसा यह विचार कैसे कर लिया कि
'इस जीवात्माके सहित मै इन तत्त्वोंमें प्रवेश करूँ?' ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—
तस्य च नित्यत्वात् ॥ २ । ४ । १६ ॥
तस्य = उस जीवात्माकी; नित्यत्वात् = नित्यता प्रसिद्ध होनेके कारण; च =
भी ( उसकी उत्पत्तिका वर्णन न करना उचित ही है ) ।
व्याख्या—जीवात्माको नित्य माना गया है । सृष्टिके समय शरीरोंकी उत्पत्ति-
के साथ-साथ गौणरूपसे ही उसकी उत्पत्ति बतायी गयी है, वास्तवमें उसकी
उत्पत्ति नहीं मानी गयी है । इसलिये पञ्चभूतोंकी उत्पत्तिके पहले या बाद उसकी
उत्पत्ति न बतलाकर जो जीवात्माके सहित परमेश्वरका शरीरमे प्रविष्ट होना कहा
गया है, वह उचित ही है । उसमे किसी प्रकारका विरोध नहीं है ।
सम्बन्ध—श्रुतिमें प्राणके नामसे इन्द्रियोंका वर्णन आया है, इससे यह जान
पडता है कि इन्द्रियाँ मुख्य प्राणके ही कार्य हैं, उसीकी वृत्तियाँ है, भिन्न तत्त्व
नहीं है । अथवा यह अनुमान होता है कि चक्षु आदिकी भाँति मुख्य प्राण भी एक
इन्द्रिय है, उन्हींकी जातिका पदार्थ है । ऐसी दशामें वास्तविक बात क्या है ?
इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
त इन्द्रियाणि तद्व्यपदेशादन्यत्र श्रेष्ठात् ॥ २ । ४ । १७ ॥
ते = वे मन आदि ग्यारह प्राण; इन्द्रियाणि = इन्द्रिय कहे गये हैं ( तथा );

२०६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
श्रेष्ठात्=मुख्य प्राणसे भिन्न है; अन्यत्र=क्योकि दूसरी श्रुतियोमे; तद्व्यपदेशात्=
उसका भिन्नतासे वर्णन है ।
व्याख्या—दूसरी श्रुतियोंमे मुख्य प्राणकी गणना इन्द्रियोसे अलग की गयी है
तथा इन्द्रियोंको प्राणोके नामसे नहीं कहा गया है (मु० उ० २ । १ । ३) इसलिये
पूर्वोक्त चक्षु आदि दसों इन्द्रियाँ और मन मुख्य प्राणसे सर्वथा भिन्न पदार्थ हैं। न तो
वे मुख्य प्राणके कार्य हैं, न मुख्य प्राण उनकी भाँति इन्द्रियोकी गणनामे है । इन
सबकी शरीरमें स्थिति मुख्य प्राणके अधीन है, इसलिये गौणरूपसे श्रुतिमे इन्द्रियों-
को प्राणके नामसे कहा गया है ।
सम्बन्ध—इन्द्रियोंसे मुख्य प्राणकी भिन्नता सिद्ध करनेके लिये दूसरा हेतु
प्रस्तुत करते हैं—
भेदश्रुतेः ॥ २ । ४ । १८ ॥
भेदश्रुतेः=इन्द्रियोसे मुख्य प्राणका भेद सुना गया है, इसलिये ( भी मुख्य
प्राण उनसे भिन्न तत्त्व सिद्ध होता है ) ।
व्याख्या—श्रुतिमें जहाँ इन्द्रियोका प्राणके नामसे वर्णन आया है, वहाँ भी
उनका मुख्य प्राणसे भेद कर दिया गया है ( मु० उ० २ । १ । ३ तथा बृह० उ०
१ । ३ । ३ ) तथा प्रश्नोपनिषद्मे भी मुख्य प्राणकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करने-
के लिये अन्य सब तत्त्वोसे और इन्द्रियोसे मुख्य प्राणको अलग बताया है
( प्र० उ० २ । २, ३ ) । इस प्रकार श्रुतियोमे मुख्य प्राणका इन्द्रियोसे भेद
बताया जानेके कारण यही सिद्ध होता है कि मुख्य प्राण इन सबसे भिन्न है ।
सम्बन्ध—इसके सिवा —
वैलक्षण्याच्च ॥ २ । ४ । १९ ॥
वैलक्षण्यात्=परस्पर विलक्षणता होनेके कारण; च=भी ( यही सिद्ध
होता है कि मुख्य प्राणसे इन्द्रियों भिन्न पदार्थ है ) ।
व्याख्या—सब इन्द्रियाँ और अन्त.करण सुषुप्तिके समय विलीन हो जाते
हैं, उस समय भी मुख्य प्राण जागता रहता है, उसपर निद्राका कोई प्रभाव नहीं
पड़ता । यही इन सबकी अपेक्षा मुख्य प्राणकी विलक्षणता है; इस कारण भी
यही सिद्ध होता है कि मुख्य प्राणसे इन्द्रियाँ भिन्न हैं । न तो इन्द्रियों प्राणका