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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र १८-१९] अध्याय ३ २६७

सूत्र १८-१९] अध्याय ३ २६७
अन्नरसमय पुरुषके नामसे कहा गया है; क्योंकि इस पुरुषको उस पूर्वोक्त
ब्रह्मका आकाशादिके क्रमसे कार्य बतलाया गया है और इसका अन्तरात्मा प्राण-
मय आदिके क्रमसे विज्ञानमय जीवात्माको बतलाया है तथा विज्ञानमयका आत्मा
ब्रह्मको बतलाकर अन्तमे आनन्दके साथ उसकी एकता की गयी है। इसलिये
जिसके 'सत्य', 'ज्ञान' और 'अनन्त' ये लक्षण बताये गये है तथा जो 'आत्मा'
और 'आनन्दमय' नामसे जगत्‌का कारण बतलाया गया है, वह ब्रह्म इस
अन्नरसमय पुरुषसे भिन्न सबका अन्तरात्मा है।
सम्बन्ध—ग्यारहवें सूत्रसे 'आनन्द' के प्रकरणका विचार आरम्भ करके
अठारहवें सूत्रतक उस प्रकरणको समाप्त कर दिया गया। अब पहले आरम्भ किये
हुए प्रकरणपर दूसरी श्रुतियोंके विषयमे विचार आरम्भ किया जाता है—
समान एवं चाभेदात् ॥ ३ । ३ । १९ ॥
समाने=एक शाखामें; च=भी; एवम्=इसी प्रकार विद्याकी एकता समझनी
चाहिये; अभेदात्=क्योंकि दोनों जगह उपास्यमे कोई भेद नहीं है।
व्याख्या—वाजसनेयी शाखाके शतपथ-ब्राह्मणमे 'सत्य ही ब्रह्म है, इस प्रकार
उपासना करनी चाहिये, निस्सन्देह यह पुरुष सङ्कल्पमय है। वह जितने सङ्कल्पों-
से युक्त होकर इस लोकसे प्रयाण करता है, परलोकमे जानेपर वैसे ही सङ्कल्प-
वाला होकर उत्पन्न होता है, वह मनोमय प्राण-शरीरवाले आकाशस्वरूप आत्माकी
उपासना करे।' इस प्रकार शाण्डिल्य-विद्याका वर्णन किया गया है (श०
ब्रा० १० । ६ । ३ । २)*। उसी शाखाके बृहदारण्यकमे भी कहा है कि
'प्रकाश ही जिसका सत्य स्वरूप है वह पुरुष मनोमय है, वह धान और जौ आदिके
सदृश सूक्ष्म परिमाणवाला है, वह उस हृदयाकाशमे स्थित है, वह सबका स्वामी
और सबका अधिपति है तथा यह जो कुछ है, सभीकां उत्तम शासन करता
है।' (बृह० उ० ५ । ६ । १)† इन दोनो ग्रन्थोंमें कही हुई इन विद्याओंमें

  • 'सत्यं ब्रह्मेत्युपासीत । अथ खलु क्रतुमयोऽयं पुरुषः स यावत्क्रतुरयमस्माल्लो-
    कात्प्रेति एवंक्रतुर्भूत्वामुं लोकं प्रेत्याभिसंभवति स आत्मानमुपासीत मनोमयं
    प्राणशरीरं भारूपं सत्यसंकल्पमाकाशात्मानम्।'
    † 'मनोमयोऽयं पुरुषो भाः सत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा ब्रीहिर्वा यवो वा स एष
    सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किञ्च।' (बृह० उ० ५ । ६ । १)

२६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
भेद है या अभेद ? यह संशय उपस्थित होनेपर सूत्रकार कहते हैं—जैसे भिन्न
शाखाओंमें विद्याकी एकता और गुणोंका उपसंहार उचित माना गया है, उसी
प्रकार एक शाखामें कही हुई विद्याओंमें भी एकता माननी चाहिये; क्योंकि
वहाँ उपास्यमें भेद नहीं है। दोनों जगह एक ही ब्रह्म उपास्य बताया गया है।
सम्बन्ध—उपास्यके सम्बन्धको लेकर किस जगह विद्याकी एकता माननी
चाहिये और किस जगह नहीं ? इसका निर्णय करनेके लिये पूर्वपक्ष उपस्थित
किया जाता है—
सम्बन्धादेवमन्यत्रापि ॥ ३ । ३ । २० ॥
एवम्=इस प्रकार; सम्बन्धात्=उपास्यके सम्बन्धसे; अन्यत्र=दूसरी जगह;
अपि=भी ( क्या विद्याकी एकता मान लेनी चाहिये ? ) ।
व्याख्या—इसी प्रकार एक ही उपास्यका सम्बन्ध बृहदारण्यकमें देखा जाता
है। वहाँ पहले कहा गया है कि सत्य ही ब्रह्म है. इत्यादि ( बृह० उ० ५ ।
५ । १ ); फिर इसी सत्यकी सूर्यमण्डलमें स्थित पुरुषके साथ और आँखमें
स्थित पुरुषके साथ एकता की गयी है ( बृह० उ० ५ । ५ । २ )। उसके बाद
दोनोंका रहस्यमय नाम क्रमशः 'अहर' और 'अहम्' बतलाया है। इस प्रकरण-
में एक ही उपास्यका सम्बन्ध होनेपर भी स्थान-भेदसे पृथक्-पृथक् दो
उपासनाएँ बतायी गयी हैं, अतः इनमें भेद मानना चाहिये या अभेद ?
सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें उठायी हुई शङ्काका उत्तर अगले सूत्रमें देते हैं—
न वा विशेषात् ॥ ३ । ३ । २१ ॥
न वा=इन दोनोंकी एकता नहीं माननी चाहिये; विशेषात्=क्योंकि इन
दोनों पुरुषोंके रहस्यमय नाम और स्थानमें भेद किया गया है।
व्याख्या—इन दोनों उपासनाओंके वर्णनमें स्थान और नाम भिन्न-भिन्न बताये
गये हैं। सूर्यमण्डलमें स्थित सत्यपुरुषका तो रहस्यमय नाम 'अहर' कहा है और
आँखमें स्थित पुरुषका रहस्यमय नाम 'अहम्' बतलाया है। इस प्रकार नाम और
स्थानका भेद होनेके कारण इन उपासनाओंकी एकता नहीं मानी जा सकती;
अतएव एकके नाम और गुणका उपसंहार दूसरे पुरुषमें नहीं करना चाहिये।
सम्बन्ध—इस बातको श्रुतिप्रमाणसे स्पष्ट करते हैं—