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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र १३-१५ ] अध्याय ४ ३६९

सूत्र १३-१५ ] अध्याय ४ ३६९
प्रजापतिके सभाभवनको प्राप्त होते हैं (छा० उ० ८ । १४ । १ ) । उस प्रसङ्गमे भी
उपासकका लक्ष्य प्रजापतिके लोकमें रहना नहीं है; किंतु परब्रह्मके परमधाममें
जाना ही है, क्योकि वहाँ जिस यशोंके यश यानी महायशका वर्णन है, वह
ब्रह्मका ही नाम है, यह बात अन्यत्र श्रुतिमे कही गयी है (श्वेता० उ० ४ । १९ )
तथा उसके पहले (छा० उ० ८ । १३ । १) के प्रसङ्गसे भी यही सिद्ध हो सकता
है कि वहाँ साधकका लक्ष्य परब्रह्म ही है।
सम्बन्ध-इस प्रकार पूर्वपक्ष और उसके उत्तरकी स्थापना करके अब
सूत्रकार अपना मत प्रकट करते हुए सिद्धान्तका वर्णन करते हैं—
अप्रतीकालम्बनान्नयतीति बादरायण उभयथा-
दोषात्तत्क्रतुश्च ॥ ४ । ३ । १५ ॥
अप्रतीकालम्बनान् = वाणी आदि प्रतीकका अवलम्बन करके उपासना
करनेवालोंके सिवा अन्य सब उपासकोको; नयति=( ये अर्चि आदि देवतालोग
देवयानमार्गसे ) ले जाते है; उभयथा=( अतः ) दोनों प्रकारकी; अदोषात्=
मान्यतामें कोई दोष न होनेके कारण; तत्क्रतुः=उनके सकल्पानुसार परब्रह्मको;
च=और कार्यब्रह्मको प्राप्त कराना सिद्ध होता है; इति=यह; बादरायणः =व्यासदेव
कहते हैं।
व्याख्या—आचार्य बादरायण अपना सिद्धान्त बतलाते हुए यह कहते हैं कि
जिस प्रकार वाणी आदिमें ब्रह्मकी प्रतीक-उपासनाका वर्णन है, उसी प्रकार
दूसरी-दूसरी वैसी उपासनाओंका भी उपनिषदोंमें वर्णन है। उन उपासकोके सिवा,
जो ब्रह्मलोकोंके भोगोको स्वेच्छानुसार भोगनेकी इच्छावाले कार्यब्रह्मके उपासक हैं
और जो परब्रह्म परमात्माको प्राप्त करनेकी इच्छासे उस सर्वशक्तिमान् सर्वज्ञ
परमेश्वरकी उपासना करनेवाले हैं, उन दोनो प्रकारके उपासकोको उनकी भावना-
के अनुसार कार्यब्रह्मके भोगसम्पन्न लोकोमे और परब्रह्म परमात्माके परमधाममे
दोनों जगह ही वह अमानव पुरुष पहुँचा देता है, इसलिये दोनों प्रकारकी मान्यतामें
कोई दोष नहीं है; क्योंकि उपासकका सकल्प ही इस विशेषतामें कारण है।
श्रुतिमें भी यह वर्णन स्पष्ट है कि 'जिनको परब्रह्मके परमधाममे पहुँचाते है,
उनका मार्ग भी प्रजापति ब्रह्माके लोकमे होकर ही है ( कौ० उ० १ । ३)।
अतः जिनके अन्तःकरणमें लोकोमे रमण करनेके सस्कार होते हैं, उनको वहाँ
वे० द० २४—

३७० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
छोड़ देते हैं, जिनके मनमें वैसे भाव नहीं होते, उनको परमधाममें पहुँचा
देते हैं; परन्तु देवयानमार्गसे गये हुए दोनों प्रकारके ही उपासक वापस
नहीं लौटते ।
सम्बन्ध-प्रतीकोपासनावालोंको अर्चिर्मार्गसे नहीं ले जानेका क्या कारण
है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
विशेषं च दर्शयति ॥ ४ । ३ । १६ ॥
विशेषम् = इसका विशेष कारण; च = भी; दर्शयति = श्रुति दिखाती है ।
व्याख्या—वाणी आदि प्रतीकोपासनावालोंको देवयानमार्गके अधिकारी क्यो
नहीं ले जाते, इसका विशेष कारण उन-उन उपासनाओंके विभिन्न फलका
वर्णन करते हुए श्रुति स्वयं ही दिखलाती है, वाणीमें प्रतीकोपासनाका फल
जहाँतक वाणीकी गति है, वहाँतक इच्छानुसार विचरण करनेकी शक्ति बताया
गया है (छा० उ० ७।२।२)। इसी प्रकार दूसरी प्रतीकोपासनाका अलग-
अलग फल बताया है, सबके फलमे एकता नहीं है । इसलिये वे उपासक
देवयानमार्गसे न तो कार्यब्रह्मके लोकमे जानेके अधिकारी है और न परब्रह्म
परमेश्वरके परमधाममे ही जानेके अधिकारी हैं; अतः उस मार्गके अधिकारी
देवताओका अर्चिर्मार्गसे उनको न ले जाना उचित ही है ।
तीसरा पाद सम्पूर्ण ।

चौथा पाद
तीसरे पादमें अर्चि आदि मार्गद्वारा परब्रह्म और कार्यब्रह्मके
लोकमें जानेवालोंकी गतिके विषयमें निर्णय किया गया। अब उपासकोंके
संकल्पानुसार ब्रह्मलोकमें पहुँचनेके बाद जो उनकी स्थितिका भेद होता है,
उसका निर्णय करनेके लिये चौथा पाद आरम्भ किया जाता है। उसमें पहले
उन साधकोंके विषयमें निर्णय करते हैं, जिनका उद्देश्य परब्रह्मकी प्राप्ति है और
जो उस परब्रह्मके अप्राकृत दिव्य परमधाममें जाते हैं—
सम्पद्याविर्भावः स्वेन शब्दात् ॥ ४ । ४ । १ ॥
सम्पद्य=परमधामको प्राप्त होकर (इस जीवका); स्वेन=अपने
वास्तविक स्वरूपसे; आविर्भावः=प्राकट्य होता है; शब्दात्=क्योंकि श्रुतिमें
ऐसा ही कहा गया है।
व्याख्या—'जो यह उपासक इस शरीरसे ऊपर उठकर परम ज्ञानस्वरूप
परमधामको प्राप्त हो (वहाँ) अपने वास्तविक स्वरूपसे सम्पन्न हो जाता है।
यह आत्मा है—ऐसा आचार्यने कहा—यह (उसको प्राप्त होनेवाला)
अमृत है, अभय है और यही ब्रह्म है। निस्सन्देह उस इस (प्राप्तव्य) परब्रह्मका
नाम सत्य है।' (छा० उ० ८ । ३ । ४)—इस श्रुतिसे यही सिद्ध होता
है कि परमधामको प्राप्त होते ही वह साधक अपने वास्तविक स्वरूपसे सम्पन्न
हो जाता है अर्थात् प्राकृत सूक्ष्म शरीरसे रहित, श्रुतिमे बताये हुए पुण्य-पापशून्य,
जरा-मृत्यु आदि विकारोंसे रहित, सत्यकाम, सत्य-संकल्प, शुद्ध एवं अजर-
अमररूपसे युक्त हो जाता है। (छा० उ० ८ । १ । ५) इस प्रकरणमें जो
संकल्पसे ही पितर आदिकी उपस्थिति होनेका वर्णन है, वह ब्रह्मविद्याके माहात्म्यका
सूचक है। उसका भाव यह है कि जीवनकालमें ही हृदयाकाशके भीतर संकल्पसे
पितृलोक आदिके सुखका अनुभव होता है, न कि ब्रह्मलोकमें जानेके बाद;
क्योंकि उस प्रकरणके वर्णनमें यह बात स्पष्ट है। वहाँ जीवनकालमें ही उनका
संकल्पसे उपस्थित होना कहा है (छा० उ० ८ । २ । १ से १०)। इसके
बाद, उसके लिये प्रतिदिन यहाँ हृदयमें ही परमानन्दकी प्राप्ति होनेकी बात कही
है (छा० उ० ८ । ३ । ३)। तदनन्तर शरीर छोड़कर परमधाममें जानेकी