सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र २०-२१ ] अध्याय २ १४५

सूत्र २०-२१ ] अध्याय २ १४५
च = तथा; उत्तरोत्पादे = बादमे होनेवाले भावकी उत्पत्तिके समय; पूर्व-
निरोधात् = पहले क्षणमे विद्यमान कारणका नाश हो जाता है, इसलिये ( पूर्वोक्त
अविद्या आदि हेतु संस्कार आदि उत्तरोत्तर भावोंकी उत्पत्तिमे कारण नहीं हो सकते ) ।
व्याख्या—घट और वस्त्र आदिमे यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि कारणभूत
मृत्तिका और तन्तु आदि अपने कार्यके साथ विद्यमान रहते हैं। तभी उनमे
कार्य-कारणभावकी सिद्धि होती है; किंतु बौद्धमतमे समस्त पदार्थोंका प्रत्येक
क्षणमे नाश माना गया है, अतः उनके मतानुसार कार्यमे कारणकी विद्यमानता
सिद्ध नहीं होगी। जिस क्षणमे कार्यकी उत्पत्ति होगी, उसी क्षणमे कारणका
निरोध अर्थात् विनाश हो जायगा; इसलिये उनकी मान्यताके अनुसार कारण-
कार्यभावकी सिद्धि न होनेसे वे अविद्या आदि हेतु मस्कार आदि उत्तरोत्तर भावोकी
उत्पत्तिके कारण नहीं हो सकते।
सम्बन्ध—कारणके न रहनेपर भी कार्यकी उत्पत्ति मान लें तो क्या आपत्ति
है ? इसपर कहते हैं—
असति प्रतिज्ञोपरोधो यौगपद्यमन्यथा ॥ २ । २ । २१ ॥
असति = कारणके न रहनेपर ( भी कार्यकी उत्पत्ति माननेसे ); प्रतिज्ञोप-
रोधः = प्रतिज्ञा भंग होगी; अन्यथा = नहीं तो; यौगपद्यम् = कारण और कार्यकी
एक कालमे सत्ता माननी पडेगी।
व्याख्या—बौद्ध-मतमे चार हेतुओसे विज्ञानकी उत्पत्ति मानी गयी है, उनके
नाम इस प्रकार हैं—अधिपतिप्रत्यय, सहकारिप्रत्यय, समनन्तरप्रत्यय और
आलम्बनप्रत्यय। ये क्रमशः इन्द्रिय, प्रकाश, मनोयोग और विषयके बोधक हैं।
इन चारों हेतुओंके होनेपर ही विज्ञानकी उत्पत्ति होती है, यह उनकी प्रतिज्ञा है।
यदि कारणके बिना ही कार्यकी उत्पत्ति मानी जाय तो उक्त प्रतिज्ञा भंग होगी
और यदि ऐसा नहीं मानते हैं तो कारण और कार्य दोनोंकी एक कालमे सत्ता
माननी पड़ेगी; अतः किसी प्रकार भी उनका मत समीचीन अथवा उपादेय
नहीं है।
सम्बन्ध—बौद्धमतानुयायी यह मानते हैं कि प्रतिसंख्या-निरोध, अप्रति-
संख्यानिरोध तथा आकाश—इन तीनोंके अतिरिक्त समस्त वस्तुएँ क्षणिक
( प्रतिक्षण नष्ट होनेवाली ) हैं। दोनों निरोध और आकाश तो कोई वस्तु ही
वै० द० १०—

१४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
नहीं हैं, ये अभावमात्र हैं। निरोध तो विनाशका बोधक होनेसे अभाव है ही,
आकाश भी आवरणका अभावमात्र ही है। इनमेंसे आकाशकी अभावरूपताका
निराकरण तो २४ वें सूत्रमें किया जायगा। यहाँ उनके माने हुए दो प्रकारके
निरोधोंका निराकरण करनेके लिये कहते हैं—
प्रतिसंख्याप्रतिसंख्यानिरोधाप्राप्तिरविच्छेदात् ॥ २ । २ । २२ ॥
प्रतिसंख्याप्रतिसंख्यानिरोधाप्राप्तिः = प्रतिसंख्यानिरोध और अप्रतिसंख्या-
निरोध—इन दो प्रकारके निरोधोंकी सिद्धि नहीं हो सकती; अविच्छेदात् = क्योकि
संतान ( प्रवाह ) का विच्छेद नहीं होता।
व्याख्या—उनके मतमे जो बुद्धिपूर्वक सहेतुक विनाश है, उसका नाम
प्रतिसंख्या-निरोध है। यह तो पूर्णज्ञानसे होनेवाले आत्यन्तिक प्रलयका बोधक
है। दूसरा जो स्वभावसे ही बिना किसी निमित्तके अबुद्धिपूर्वक विनाश होता है,
उसका नाम अप्रतिसंख्या-निरोध है। यह स्वाभाविक प्रलय है। यह दोनो प्रकार-
का निरोध—किसी वस्तुका न रहना सिद्ध नहीं हो सकता; क्योकि वे समस्त
पदार्थोंको प्रतिक्षण विनाशशील मानते हैं और असत् कारणोंसे 'सत्' कार्यकी
उत्पत्ति भी प्रतिक्षण स्वीकार करते हैं। इस मान्यताके अनुसार एक पदार्थका
नाश और दूसरेकी उत्पत्तिका क्रम विद्यमान रहनेसे दोनोकी परम्परा
निरन्तर चलती ही रहेगी। इसके रुकनेका कोई भी कारण उनकी मान्यताके
अनुसार नहीं है। इसलिये किसी प्रकारके निरोधकी सिद्धि नहीं होगी।
सम्बन्ध—बौद्धमतवाले ऐसा मानते है कि सब पदार्थ क्षणिक और असत्य
होते हुए भी भ्रान्तिरूप अविद्याके कारण स्थिर और सत्य प्रतीत होते हैं।
ज्ञानके द्वारा अविद्याका अभाव होनेसे सबका अभाव हो जाता है। इस प्रकार
बुद्धिपूर्वक निरोधकी सिद्धि होती है। इसका निराकरण करनेके लिये कहते हैं—
उभयथा च दोषात् ॥ २ । २ । २३ ॥
उभयथा=दोनो प्रकारसे; च=भी; दोषात्=दोष आता है, इसलिये ( उनकी
मान्यता युक्तिसंगत नहीं है )।
व्याख्या—यदि यह माना जाय कि भ्रान्तिरूप अविद्यासे प्रतीत होनेवाला
यह जगत् पूर्ण ज्ञानसे अविद्याका नाश होनेपर उसीके साथ नष्ट हो जाता है;