ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ५३-५५ ] अध्याय ३ २९५
सूत्र ५३-५५ ] अध्याय ३ २९५
तु=किन्तु; उपलब्धिवत्=ज्ञातापनकी उपलब्धिके सदृश ( आत्माका शरीरसे
भिन्न होना सिद्ध होता है )।
व्याख्या—शरीर ही आत्मा है, यह बात ठीक नहीं है; किन्तु शरीरसे भिन्न,
शरीर आदि समस्त भूतों और उनके कार्योंको जाननेवाला आत्मा अवश्य है;
क्योंकि मृत्युकालमें शरीर हमारे सामने पड़ा रहता है तो भी उसमे सब
पदार्थोंको जाननेवाला चेतन आत्मा नहीं रहता । अतः जिस प्रकार यह प्रत्यक्ष
है कि शरीरके रहते हुए भी उसमे जीवात्मा नहीं रहता, उसी प्रकार यह भी
मान ही लेना चाहिये कि शरीरके न रहनेपर भी आत्मा रहता है, वह इस स्थूल
शरीरमें नहीं तो अन्य ( सूक्ष्म ) शरीरमे रहता है; परन्तु आत्माका अभाव नहीं
होता । अतः यह कहना सर्वथा युक्तिविरुद्ध है कि इस स्थूल शरीरसे भिन्न
आत्मा नहीं है। यदि इस शरीरसे भिन्न चेतन आत्मा नहीं होता तो वह अपने
और दूसरोंके शरीरोको नहीं जान सकता; क्योंकि घटादि जड पदार्थोंमें एक-
दूसरेको या अपने-आपको जाननेकी शक्ति नहीं है। जिस प्रकार सबका ज्ञाता
होनेके कारण ज्ञातारूपमे आत्माकी उपलब्धि प्रत्यक्ष है, उसी प्रकार शरीरका
ज्ञाता होनेके कारण इस ज्ञेय शरीरसे उसका भिन्न होना भी प्रत्यक्ष है ।
सम्बन्ध—प्रसङ्गवश प्राप्त हुए नास्तिकवादका संक्षेपसे खण्डन करके, अब
पुनः भिन्न-भिन्न श्रुतियोंपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया
जाता है । जिज्ञासा यह है कि भिन्न-भिन्न शाखाओंमें यज्ञोंके उद्गीथ आदि
अङ्गोंमें भेद है; अतः यज्ञादिके अङ्गोंसे सम्बन्ध रखनेवाली उपासना एक शाखा-
मे कहे हुए प्रकारसे दूसरी शाखावालोंको करनी चाहिये या नहीं, इसपर
कहते हैं—
अङ्गावबद्धास्तु न शाखासु हि प्रतिवेदम् ॥ ३ । ३ । ५५ ॥
अङ्गावबद्धाः = यज्ञके उद्गीथ आदि अङ्गोंसे सम्बद्ध उपासनाएँ; शाखासु
हि=जिस शाखामें कही गयी हों, उसीमें करने योग्य हैं; न=ऐसी बात नहीं है;
तु=किन्तु; प्रतिवेदम् = प्रत्येक वेदकी शाखावाले उसका अनुष्ठान कर सकते हैं।
व्याख्या—'ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत'—'ॐ इस एक अक्षरकी उद्गीथके
रूपमे उपासना करनी चाहिये' ( छा० उ० १ । १ । १ ), 'लोकेषु पञ्चविधं
सामोपासीत'—'पाँच प्रकारके सामकी लोकोंके साथ सम्बन्ध जोड़कर उपासना
२९६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
करनी चाहिये।' (छा० उ० २ । २ । १)। इत्यादि प्रकारसे यज्ञादिके अङ्गरूप
उद्गीथ आदिसे सम्बन्ध रखनेवाली जो प्रतीकोपासना बतायी गयी है, उसका
जिस शाखामें वर्णन है, उसी शाखावालोको उसका अनुष्ठान करना चाहिये,
अन्य शाखावालोको नहीं करना चाहिये, ऐसी बात नहीं है; अपि तु प्रत्येक
वेदकी शाखाके अनुयायी उसका अनुष्ठान कर सकते हैं।
सम्बन्ध—इसी बातको उदाहरणसे स्पष्ट करते हैं—
मन्त्रादिवद्वाविरोधः ॥ ३ । ३ । ५६ ॥
वा=अथवा यो समझो कि; मन्त्रादिवत्=मन्त्र आदिकी भाँति; अविरोधः=
इसमें कोई विरोध नहीं है।
व्याख्या—जिस प्रकार एक शाखामे बताये हुए मन्त्र और यज्ञोपयोगी अन्य
पदार्थ, दूसरी शाखावाले भी आवश्यकतानुसार व्यवहारमें ला सकते हैं, उसमे
किसी प्रकारका विरोध नहीं है; उसी प्रकार पूर्वसूत्रमे कही हुई यज्ञाङ्गोंसे
सम्बन्ध रखनेवाली उपासनाओके अनुष्ठानमें भी कोई विरोध नहीं है।
सम्बन्ध—जिस प्रकार वैश्वानरविद्यामें एक-एक अङ्गकी उपासनाका वर्णन
आता है, उसी प्रकार और भी कई जगह आता है, ऐसी उपासनाओंमे उनके
एक-एक अङ्गकी अलग-अलग उपासना करनी चाहिये या सब अङ्गोंका समुच्चय
करके एक साथ सबकी उपासना करनी चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा हि दर्शयति ॥ ३ । ३ । ५७ ॥
क्रतुवत्=अङ्ग-उपाङ्गसे परिपूर्ण यज्ञकी भाँति; भूम्नः=पूर्ण उपासनाकी;
ज्यायस्त्वम्=श्रेष्ठता है; हि=क्योंकि; तथा=वैसा ही कथन; दर्शयति=श्रुति
दिखलाती है।
व्याख्या—जिस प्रकार यज्ञके किसी अङ्गका अनुष्ठान करना और किसीका
न करना श्रेष्ठ नहीं है, किन्तु सर्वाङ्गपूर्ण अनुष्ठान ही श्रेष्ठ है, उसी प्रकार
वैश्वानरविद्या आदिमें बतायी हुई उपासनाका अनुष्ठान भी पूर्णरूपसे करना ही
श्रेष्ठ है; उसके एक अङ्गका नहीं। वैश्वानर-विद्याकी भाँति सभी जगह यह बात
समझ लेनी चाहिये; क्योंकि श्रुतिने वैसा ही भाव वैश्वानर-विद्याके वर्णनमे
दिखाया है। राजा अश्वपतिने प्राचीनशाल आदि छहों ऋषियोंसे अलग-
अलग पूछा कि 'तुम वैश्वानरकी किस प्रकार उपासना करते हो ?' उन्होंने अपनी-
अपनी बात कही। राजाने एक-एक करके सबको बताया—'तुम अमुक