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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र २९-३२ ] अध्याय १ ४५

सूत्र २९-३२ ] अध्याय १ ४५
अनुस्मृतेः=विराट्रूपमें परमेश्वरका निरन्तर स्मरण करनेके लिये; उसको
देश-विशेषसे सम्बद्ध बतानेमे ( अविरोधः= ) कोई विरोध नहीं है; ( इति= )
ऐसा; बादरिः=बादरि नामक आचार्य मानते हैं।
व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वर यद्यपि देशकालातीत है, तो भी उनका निरन्तर
भजन, ध्यान, स्मरण करनेके लिये उन्हें देश-विशेषमें स्थित मानने, कहने और
समझनेमें कोई विरोध नहीं है; क्योकि भगवान् सर्वसमर्थ है। उनके भक्त
उनका जिस-जिस रूपमे चिन्तन करते है, उनपर कृपा करनेके लिये वे उसी-
उसी रूपमे उनको मिलते हैं।*
सम्बन्ध—इसी विषयमे आचार्य जैमिनिका मत बताते हैं—
सम्पत्तेरिति जैमिनिस्तथा हि दर्शयति ॥ १ । २ । ३१ ॥
सम्पत्तेः=परब्रह्म परमेश्वर अनन्त ऐश्वर्यसे सम्पन्न है, इसलिये ( उसे
देश-विशेषसे सम्बन्ध रखनेवाला माननेमे कोई विरोध नहीं है ); इति=ऐसा;
जैमिनिः=जैमिनि आचार्य मानते हैं; हि=क्योकि; तथा=ऐसा ही भाव; दर्शयति=
दूसरी श्रुति भी प्रकट करती है।
व्याख्या—आचार्य जैमिनिका यह कथन है कि परब्रह्म परमेश्वर अनन्त
ऐश्वर्यसे सम्पन्न है; अतः उस निर्विकार, निराकार, देशकालातीत परमात्माको
सगुण, साकार और किसी देश-विशेषसे सम्बन्ध रखनेवाला माननेमे कोई
विरोध नहीं है; क्योकि दूसरी श्रुति भी ऐसा ही भाव प्रकट करती है।
( मु० उ० २ । १ । ४ )†
सम्बन्ध—अब सूत्रकार अपने मतका वर्णन करते हुए इस पादका उपसंहार
करते हैं—
आमनन्ति चैनमस्मिन् ॥ १ । २ । ३२ ॥
अस्मिन्=इस वेदान्त-शास्त्रमे, एनम्=इस परमेश्वरको; ( एवम्= ) ऐसा;
च= ही; आमनन्ति=प्रतिपादन करते हैं।

  • श्रीमद्भागवतमे भी ऐसा ही कहा गया है—
    यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय । ( ३ । ९ । १२ )
    'महान् यशस्वी परमेश्वर ! आपके भक्तजन अपने हृदयमे आपको जिस-जिस रूपमें
    चिन्तन करते है, आप उन संत-महात्माओपर अनुग्रह करनेके लिये वही-वही शरीर धारण
    कर लेते हैं।'
    † यह मन्त्र पृष्ठ ३९ के अन्तर्गत २३ वें सूत्रकी व्याख्यामे अर्थसहित आ गया है।

४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
व्याख्या—इस वेदान्तशास्त्रमे सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सबके निवास-
स्थान, सर्वसमर्थ परब्रह्म परमेश्वरका ज्ञानीजन ऐसा ही प्रतिपादन करते है*
इस विषयमे शास्त्र ही प्रमाण है । युक्ति-प्रमाण यहाँ नहीं चल सकता;
क्योंकि परमात्मा तर्कका विषय नहीं है । वह सगुण, निर्गुण, साकार-
निराकार, सविशेष-निर्विशेष आदि सब कुछ है । यह विश्वास करके साधकको
उसके स्मरण और चिन्तनमे लग जाना चाहिये । वह व्यापक भगवान्
सभी देशोंमे सर्वदा विद्यमान है । अतः उसको किसी भी देश-विशेषसे संयुक्त
मानना विरुद्ध नहीं है तथा वह सब देशोंसे सदा ही निर्लिप्त है ! इस
कारण उसको देश-कालातीत मानना भी उचित ही है । अतः सभी आचार्योंकी
मान्यता ठीक है ।
दूसरा पाद सम्पूर्ण ।

  • अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् ।
    विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥
    ( श्वेता० ५ । १३ )
    ‘दुर्गम संसारके भीतर व्याप्त, आदि-अन्तसे रहित, समस्त जगत्की रचना करने-
    वाले, अनेक रूपधारी, समस्त जगत्को सब ओरसे घेरे हुए एक अद्वितीय परमेश्वरको
    जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोंसे सर्वथा मुक्त हो जाता है ।’

तीसरा पाद

सम्बन्ध—पहले दो पादोंमें सर्वान्तर्यामी परब्रह्म परमात्माके व्यापक रूपका
भलीभाँति प्रतिपादन किया गया । अब उसी परमेश्वरको सबका आधार
बतलाते हुए तीसरा पाद आरम्भ करते हैं—

द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ॥ १ । ३ । १ ॥

द्युभ्वाद्यायतनम् = ( मु० उ० २ । २ । ५ मे ) स्वर्ग और पृथिवी
आदिका जो आधार बताया गया है ( वह परब्रह्म परमात्मा ही है );
स्वशब्दात् = क्योंकि वहाँ उस परमात्माके बोधक 'आत्मा' शब्दका प्रयोग है।
व्याख्या—मुण्डकोपनिषद् ( २ । २ । ५ ) मे कहा गया है कि—
'यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः ।
तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥'
अर्थात् 'जिसमे स्वर्ग, पृथिवी और उसके बीचका आकाश तथा समस्त
प्राणोंके सहित मन गुँथा हुआ है, उसी एक सबके आत्मरूप परमेश्वरको
जानो, दूसरी सब बातोको सर्वथा छोड़ दो । यही अमृतका सेतु है ।'
इस मन्त्रमें जिस एक आत्माको उपर्युक्त ऊँचे-से-ऊँचे स्वर्ग और नीचे पृथिवी
आदि सभी जगत्‌का आधार बताया है; वह परब्रह्म परमेश्वर ही है, जीवात्मा या
प्रकृति नहीं; क्योंकि इसमे परब्रह्मबोधक 'आत्मा' शब्दका प्रयोग है।
सम्बन्ध—उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये दूसरा हेतु देते हैं—

मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात् ॥ १ । ३ । २ ॥

मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात् = ( उस सर्वाधार परमात्माको ) मुक्त पुरुषोंके
लिये प्राप्य बतलाया गया है, इसलिये ( वह जीवात्मा नहीं हो सकता ) ।
व्याख्या—उक्त उपनिषद्मे ही आगे चलकर कहा गया है कि—
'यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय ।
तथा विद्वांनामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥' (मु० उ० ३।२।८)
'जिस प्रकारबहती हुई नदियों नाम-रूपको छोड़कर समुद्रमे विलीन हो जाती

४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
है, वैसे ही ज्ञानी महात्मा नामरूपसे रहित होकर उत्तम-से-उत्तम दिव्य परम पुरुष
परमात्माको प्राप्त हो जाता है।' '
इस प्रकार श्रुतिने परमपुरुष परमात्माको मुक्त ( ज्ञानी ) पुरुषोंके लिये
प्राप्तव्य बताया है; इसलिये ( मु० उ० २।२।५ ) में द्युलोक और पृथिवी
आदिके आधाररूपसे जिस 'आत्मा'का वर्णन आया है, वह 'जीवात्मा' नहीं,
साक्षात् परब्रह्म परमात्मा ही है। इसके पूर्ववर्ती चौथे मन्त्रमें भी परमात्माको
जीवात्माका प्राप्य बताया गया है। वह मन्त्र इस प्रकार है--
'प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते ।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥
'प्रणव तो धनुष है और जीवात्मा बाणके सदृश है। ब्रह्मको उसका लक्ष्य कहते
है। प्रमादरहित ( सतत सावधान ) मनुष्यके द्वारा वह लक्ष्य बींधा जाने योग्य
है; इसलिये साधकको उचित है कि उस लक्ष्यको बेधकर बाणकी ही भाँति
उसमे तन्मय हो जाय-सब बन्धनोंसे मुक्त हो सदा परमेश्वरके चिन्तनमे ही
तत्पर रहकर तन्मय हो जाय।'
• इस प्रकार इस प्रसङ्गमे जगह-जगह परमात्माको जीवका प्राप्य बताये जानेके
कारण पूर्वोक्त श्रुतिमे वर्णित द्युलोक आदिका आधारभूत आत्मा परब्रह्म ही हो
सकता है; दूसरा कोई नहीं।
सम्बन्ध-अब यहाँ यह शंका होती है कि पृथिवी आदि सम्पूर्ण भूत-
प्रपञ्च जड प्रकृतिका कार्य है; कार्यका आधार कारण ही होता है; अतः प्रधान
( जड प्रकृति ) को ही सबका आधार माना जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर
कहते हैं-
नानुमानमतच्छब्दात् ॥ १ । ३ । ३ ॥
अनुमानम् = अनुमान-कल्पित प्रधान; न=द्युलोक और पृथिवी आदिका
आधार नहीं हो सकता; अतच्छब्दात् = क्योकि उसका प्रतिपादक कोई शब्द
( इस प्रकरणमे ) नहीं है।
व्याख्या-इस प्रकरणमे ऐसा कोई शब्द नहीं प्रयुक्त हुआ है, जो जड
प्रकृतिको स्वर्ग और पृथिवी आदिका आधार बताता हो। अतः उसे इनका आधार
नहीं माना जा सकता। वह जगत्का कारण नहीं है, यह बात तो पहले ही
-सिद्ध की जा चुकी है। अतः उसे कारण बताकर, इनका आधार माननेके लिये
तो कोई सम्भावना ही नहीं है।