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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र ९-११ ] अध्याय ४ ३५३

सूत्र ९-११ ] अध्याय ४ ३५३
जानेवाली होती हैं।' (छा० उ० ८। ६। ६) इसमें जो नाडीद्वारा निकल-
कर जानेकी बात कही है, यह सूक्ष्म भूतोंमें स्थित जीवात्माके लिये ही सम्भव
है; तथा मरणकालमे समीपवर्ती मनुष्योको उसका निकलना नेत्रेन्द्रिय आदिसे
दिखलायी नहीं देता। इससे भी उन भूतोका सूक्ष्म होना प्रत्यक्ष है। इस प्रकार श्रुति-
प्रमाण और प्रत्यक्ष प्रमाणसे भी उस भूतसमुदायका सूक्ष्म होना सिद्ध होता है।
सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे उसी बातको सिद्ध करते हैं-
नोपमर्देनातः ॥ ४ । २ । १० ॥
अतः=यह भूतसमुदाय सूक्ष्म होता है, इसीलिये; उपमर्देन=इस स्थूल-
शरीरका दाह आदिके द्वारा नाश कर देनेसे; न=उसका नाश नहीं होता ।
व्याख्या-मरणकालमे जीवात्मा जिस आकाशादि भूत-समुदायरूप शरीरमें
स्थित होता है, वह सूक्ष्म है; इसीलिये इस स्थूल शरीरका दाह आदिके द्वारा
नाश कर देनेसे भी उस सूक्ष्म शरीरका कुछ नहीं बिगड़ता। जीवात्मा सूक्ष्म
शरीरके साथ इस स्थूल शरीरसे निकल जाता है, इसीलिये इस स्थूल शरीरका
दाह-संस्कार करनेपर भी जीवात्माको किसी प्रकारके कष्टका अनुभव नहीं होता।
सम्बन्ध-उपर्युक्त कथनकी ही पुष्टि करते हुए कहते हैं-
अस्यैव चोपपत्तेरेष ऊष्मा ॥ ४ । २ । ११ ॥
एषः=यह; ऊष्मा=गरमी (जो कि जीवित शरीरमें अनुभूत होती है);
अस्य एव=इस सूक्ष्म शरीरकी ही है; उपपत्तेः=युक्तिसे; च=भी (यह
बात सिद्ध होती है; क्योंकि सूक्ष्म शरीरके निकल जानेपर स्थूल शरीर गरम
नहीं रहता)।
व्याख्या-सूक्ष्म शरीरसहित जीवात्मा जब इस स्थूल शरीरसे निकल जाता
है, उसके बाद इसमें गरमी नहीं रहती, स्थूल शरीरके रूप आदि लक्षण वैसे-
के-वैसे रहते हुए ही वह ठंडा हो जाता है। इस युक्तिसे भी यह बात समझी
जा सकती है कि जीवित शरीरमे जिस गरमीका अनुभव होता है, वह इस
सूक्ष्म शरीरकी ही है। अतएव इसके निकल जानेपर वह नहीं रहती।
सम्बन्ध-जिनके समस्त संकल्प यहाँ नष्ट हो चुके हैं, जिनके मनमें किसी
प्रकारकी वासना शेष नहीं रही, जिनको इसी शरीरमें परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति
ब्र० द० २३--

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हो गयी है, उनका ब्रह्मलोकमें गमन होना सम्भव नहीं है; क्योंकि श्रुतिमें उनके
गमनका निषेध है। इस बातको दृढ़ करनेके लिये पूर्वपक्ष उपस्थित करके उसका
उत्तर दिया जाता है—
प्रतिषेधादिति चेन्न शारीरात् ॥ ४ । २ । १२ ॥
चेत्=यदि कहो; प्रतिषेधात्=प्रतिषेध होनेके कारण ( उसका गमन
नहीं होता ); इति न=तो यह ठीक नहीं; शारीरात्=क्योंकि उस प्रतिषेध-
वचनके द्वारा जीवात्मासे प्राणोंको अलग होनेका निषेध किया गया है।
व्याख्या—पूर्वपक्षकी ओरसे कहा जाता है कि 'जो कामनारहित, निष्काम,
पूर्णकाम और केवल परमात्माको ही चाहनेवाला है, उसके प्राण उत्क्रमण नहीं
करते।' ( बृह० उ० ४ । ४ । ६ ) । इस श्रुतिमें कामनारहित महापुरुषकी
गतिका अभाव बताया जानेके कारण यह सिद्ध होता है कि उसका ब्रह्मलोकमें
गमन नहीं होता, किन्तु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि उक्त श्रुतिमें जीवात्मासे
प्राणोंके अलग होनेका निषेध है, न कि शरीरसे। अतः इससे गमनका निषेध
सिद्ध नहीं होता, अपितु जीवात्मा प्राणोंके सहित ब्रह्मलोकमें जाता है, इसी
बातकी पुष्टि होती है।
सम्बन्ध—इसके उत्तरमें सिद्धान्ती कहते हैं—
स्पष्टो ह्येकेषाम् ॥ ४ । २ । १३ ॥
एकेषाम्=एक शाखावालोंकी श्रुतिमे; स्पष्टः=स्पष्ट ही शरीरसे प्राणोंके
उत्क्रमण न होनेकी बात कही है; हि=इसलिये ( यही सिद्ध होता है कि उसका
गमन नहीं होता )।
व्याख्या—एक शाखाकी श्रुतिमें स्पष्ट ही यह बात कही गयी है कि 'न तस्य
प्राणा उत्क्रामन्ति'—'उस आप्तकाम महापुरुषके प्राण उत्क्रमग नहीं करते,
यहीं विलीन हो जाते हैं; वह ब्रह्म होकर ही ब्रह्मको प्राप्त होता है।' ( नृसिंहो० ५ )
इसके सिवा, बृहदारण्यकोपनिषद्के अगले मन्त्रमें यह भी कहा है कि
'अत्र ब्रह्म समश्नुते'—'वह यहीं ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।' ( बृह० उ० ४ ।
४ । ७ )। दूसरी श्रुतिमें यह भी बताया गया है कि—
विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र ।
तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥
'यह जीवात्मा समस्त प्राण, पाँचों भूत तथा अन्तःकरण और इन्द्रियोंके