ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र २—४ ] अध्याय ४ ३६३
सूत्र २—४ ] अध्याय ४ ३६३
उल्लेख स्पष्ट है । अतः छान्दोग्योपनिषद्की अर्चिसे आरम्भ करके मार्गका
वर्णन करनेवाली श्रुतिमें अग्निके स्थानमें तो अर्चि कही है, परन्तु
वहाँ वायुलोकका वर्णन नहीं है, इसलिये वायुलोकको संवत्सरके बाद और
सूर्यके पहले मानना चाहिये ।
सम्बन्ध—वरुण, इन्द्र और प्रजापति लोकका भी अर्चि आदि मार्गमें
वर्णन नहीं है, अतः उनको किसके बाद समझना चाहिये ? इस जिज्ञासापर
कहते हैं—
तडितोऽधि वरुणः सम्बन्धात् ॥ ४ । ३ । ३ ॥
तडितः=विद्युत्में; अधि=ऊपर; वरुणः=वरुणलोक ( समझना चाहिये ),
सम्बन्धात्=क्योंकि उन दोनोंका परस्पर सम्बन्ध है ।
व्याख्या—वरुण जलका स्वामी है, विद्युत्का जलसे निकटतम सम्बन्ध है,
इसलिये विद्युत्के ऊपर वरुणलोककी स्थिति समझनी चाहिये । उसके बाद इन्द्र
और प्रजापतिके लोकोंकी स्थिति भी उस श्रुतिमें कहे हुए क्रमानुसार समझ लेनी
चाहिये । इस प्रकार सब श्रुतियोंकी एकता हो जायगी और एक मार्ग माननेमें
किसी प्रकारका विरोध नहीं रहेगा ।
सम्बन्ध—अर्चिरादि मार्गमें जो अर्चि, अहः, पक्ष, अयन, संवत्सर, वायु
और विद्युत् आदि बताये गये हैं, वे जड हैं या चेतन ? इस जिज्ञासापर
कहते हैं—
आतिवाहिकास्तल्लिङ्गात् ॥ ४ । ३ । ४ ॥
आतिवाहिकाः=वे सब साधकको एक स्थानसे दूसरे स्थानतक पहुँचा
देनेवाले उन-उन लोकोंके अभिमानी पुरुष हैं, क्योंकि श्रुतिमें; तल्लिङ्गात्=वैसा
ही लक्षण देखा जाता है ।
व्याख्या—अर्चि, अहः आदि शब्दोंद्वारा कहे जानेवाले ये सब उन-उन नाम
और लोकोंके अभिमानी देवता या मानवाकृति पुरुष हैं । इनका काम ब्रह्मलोकमें
जानेवाले जीवको एक स्थानसे दूसरे स्थानतक पहुँचा देना है, इसीलिये इनको
आतिवाहिक कहते हैं । विद्युल्लोकमें पहुँचनेपर अमानव पुरुष उस ज्ञानीको ब्रह्मकी
प्राप्ति कराता है । उसके लिये जो अमानव विशेषण दिया गया है, उससे सिद्ध
होता है कि उसके पहले जो अर्चि आदि लोक प्राप्त होते हैं, वे उन-उन लोकोंके
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अभिमानी देवता या मानवाकार पुरुष हैं। है वे भी दिव्य ही, परन्तु उनकी
आकृति मानवो-जैसी है।
सम्बन्ध—इस प्रकार अभिमानी देवता माननेकी क्या आवश्यकता है?
इस जिज्ञासापर कहते हैं—
उभयव्यामोहात्तत्सिद्धेः ॥ ४ । ३ । ५ ॥
उभयव्यामोहात्=दोनोके मोहयुक्त होनेका प्रसङ्ग आ जाता है, इसलिये;
तत्सिद्धेः=उनको अभिमानी देवता माननेसे ही उनके द्वारा ब्रह्मलोकतक ले
जानेका कार्य सिद्ध हो सकता है। अतः ( वैसा ही मानना चाहिये )।
व्याख्या—यदि अर्चि आदि शब्दोसे उनके अभिमानी देवता न मानकर उन्हें
ज्योति और लोकविशेषरूप जड पदार्थ मान ले तो दोनोंके ही मोहयुक्त ( मार्ग-
ज्ञानशून्य ) होनेसे ब्रह्मलोकतक पहुँचना ही सम्भव न होगा; क्योकि गमन
करनेवाला जीवात्मा तो वहाँके मार्गसे परिचित है नहीं, उसको आगे ले
जानेवाले अर्चि आदि भी यदि चेतन न हो तो मार्गको जाननेवाला कोई न
रहनेसे देवयान और पितृयानमार्गका ज्ञान होना असम्भव हो जायगा। इसलिये
अर्चि आदि शब्दोसे उन-उनके अभिमानी देवताओका वर्णन मानना आवश्यक है।
तभी उनके द्वारा ब्रह्मलोकतक पहुँचानेका कार्य सिद्ध हो सकेगा। अतः मार्गमे
जिन-जिन लोकोंका वर्णन आया है, उनसे उन-उन लोकोके अधिष्ठाता देवताको ही
समझना चाहिये, अपने लोकसे अगले लोकमे पहुँचा देना ही उनका काम है।
सम्बन्ध—विद्युत्-लोकके अनन्तर यह कहा गया है कि वह अमानव पुरुष
उनको ब्रह्मके पास पहुँचा देता है। ( छा० उ० ५ । १० । १ ) तब बीचमें आने-
वाले वरुण, इन्द्र और प्रजापतिके लोकोंके अभिमानी देवताओंका क्या काम
रहेगा ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
वैद्युतेनैव ततस्तच्छ्रुतेः ॥ ४ । ३ । ६ ॥
ततः=वहाँसे आगे ब्रह्मलोकतक; वैद्युतेन=विद्युत्-लोकमे प्रकट हुए
अमानव पुरुषद्वारा; एव=ही ( पहुँचाये जाते है ); तच्छ्रुतेः=क्योंकि वैसा ही
श्रुतिमें कहा है—
व्याख्या—वहाँसे उनको वह विद्युत्-लोकमे प्रकट हुआ अमानव पुरुष ब्रह्मके