ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र १८—१८ ] अध्याय २ १७१
सूत्र १८—१८ ] अध्याय २ १७१
श्रुतियोंसे ही; नित्यत्वात् = इसकी नित्यता सिद्ध की गयी है, इसलिये भी
( जीवात्माकी उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती ) ।
व्याख्या—श्रुतिमें कहीं भी जीवात्माका वास्तवमें उत्पन्न होना नहीं कहा
गया है। मुण्डकोपनिषद्में जो अग्निके दृष्टान्तसे नाना भावोंकी उत्पत्तिका वर्णन
है—* ( मु० उ० २ । १ । १ ) वह पूर्वसूत्रमें कहे अनुसार शरीरोंकी उत्पत्ति-
को लेकर ही है। इसी प्रकार दूसरी श्रुतियोंके कथनका उद्देश्य भी समझ लेना
चाहिये । अतः श्रुतिका यही निश्चित सिद्धान्त है कि जीवात्माकी स्वरूपसे
उत्पत्ति नहीं होती । इतना ही नहीं, श्रुतियोंद्वारा उसकी नित्यताका भी प्रतिपादन
किया गया है। छान्दोग्योपनिषद्मे सजीव वृक्षके दृष्टान्तसे श्वेतकेतुको समझाते
हुए उसके पिताने कहा है कि 'जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियते ।'
अर्थात् 'जीवसे रहित हुआ यह शरीर ही मरता है, जीवात्मा नहीं मरता' ( छा०
उ० ६ । ११ । ३ ), कठोपनिषद्मे कहा है कि 'यह विज्ञानस्वरूप जीवात्मा न
तो जन्मता है और न मरता ही है। यह अजन्मा, नित्य, सदा रहनेवाला और
पुराण है, शरीरका नाश होनेपर इसका नाश नहीं होता'† ( क०उ० १ । २ । १८ )
इत्यादि । इसलिये यह सर्वथा निर्विवाद है कि जीवात्मा स्वरूपसे उत्पन्न नहीं होता ।
सम्बन्ध—जीवकी नित्यताको दृढ़ करनेके लिये पुनः कहते हैं—
ज्ञोऽत एव ॥ २ । ३ । १८ ॥
अतः=( वह नित्यचैतन्यरूप है ) इसलिये; एव=ही; ज्ञः=ज्ञाता है।
व्याख्या—वह जीवात्मा स्वरूपसे जन्मने-मरनेवाला नहीं है, नित्य चेतन है, इसी-
लिये वह ज्ञाता है। भाव यह कि वह जन्मने-मरनेवाला या घटने-बढ़नेवाला और अनित्य
होता तो ज्ञाता नहीं हो सकता । किन्तु सिद्ध योगी अपने जन्म-जन्मान्तरोंकी बात
जान लेता है तथा प्रत्येक जीवात्मा पहले शरीरसे सम्बन्ध छोड़कर जब दूसरे नवीन
शरीरको धारण करता है, तब पूर्वस्मृतिके अनुसार स्तन-पानादिमे प्रवृत्त हो जाता
है। इसी प्रकार पशु-पक्षी आदिको भी प्रजोत्पादनका ज्ञान पहलेके अनुभवकी
स्मृतिसे हो जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि जीव नित्य है और ज्ञानस्वरूप
है. शरीरोके बदलनेमे जीवात्मा नहीं बदलता ।
सम्बन्ध—जीवात्मा नित्य है, शरीरके बदलनेसे वह नहीं बदलता, इस
बातको प्रकारान्तरसे पुनः सिद्ध करते हैं—
- यह मन्त्र पृष्ठ १६८ की टिप्पणीमे आ गया है।
† न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
१७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् ॥ २ । ३ । १९ ॥
उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् = (एक ही जीवात्माके) शरीरसे उत्क्रमण करने,
परलोकमें जाने और पुनः लौटकर आनेका श्रुतिमें वर्णन है (इससे भी यही
सिद्ध होता है कि जीवात्मा नित्य है)।
व्याख्या—कठोपनिषद् (२ । २ । ७) में कहा है कि—
योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः ।
स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥
'मरनेके बाद इन जीवात्माओंमेंसे अपने-अपने कर्मोंके अनुसार कोई तो
वृक्षादि अचल शरीरको धारण कर लेते हैं और कोई देव, मनुष्य, पशु, पक्षी
आदि जङ्गम शरीरोंको धारण कर लेते हैं।'
प्रश्नोपनिषद्मे कहा है—'अथ यदि द्विमात्रेण मनसि संपद्यते सोऽन्तरिक्षं
यजुर्भिरुन्नीयते स सोमलोकं स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते।' (प्र० उ०
५ । ४)। अर्थात् 'जो इस ॐकारकी दो मात्राओका ध्यान करता है, वह मनोमय
चन्द्रलोकको प्राप्त होता है। यजुर्वेदकी श्रुतियाँ उसे अन्तरिक्षवर्ती चन्द्रलोकमे ऊपरकी
ओर ले जाती हैं; वहाँ स्वर्गलोकमे नाना प्रकारके ऐश्वर्योंका भोग करके वह पुनः
मृत्युलोकमे लौट आता है।' इसी प्रकार अन्यान्य श्रुतियोंमें जीवात्माके
वर्तमान शरीरको छोड़ने, परलोकमें जाने तथा वहाँसे पुनः लौटकर आनेका वर्णन
है; इससे भी यही सिद्ध होता है कि शरीरके नाशसे जीवात्माका नाश नहीं होता,
वह नित्य और अपरिवर्तनशील है।
सम्बन्ध—कही हुई बातसे ही पुनः आत्माका नित्यत्व सिद्ध करते हैं—
स्वात्मना चोत्तरयोः ॥ २ । ३ । २० ॥
उत्तरयोः=परलोकमे जाना और पुनः वहाँसे लौट आना—इन पीछे कही
हुई दोनो क्रियाओंकी सिद्धि; स्वात्मना=स्वस्वरूपसे; च=ही होती है (इसलिये
भी आत्मा नित्य है)।
व्याख्या—उत्क्रान्तिका अर्थ है शरीरका वियोग। यह तो आत्माको नित्य
न माननेपर भी होगा ही; किन्तु बादमें बतायी हुई गति और आगति अर्थात्
परलोकमें जाना और वहाँसे लौटकर आना—इन दो क्रियाओंकी सिद्धि अपने