ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ३०-३१ ] अध्याय १ २१
सूत्र ३०-३१ ] अध्याय १ २१
सिवा ) सब लक्षण ब्रह्मके आश्रित है ( तथा ); इह तद्योगात् = इस प्रसङ्गमें
ब्रह्मके लक्षणोंका भी कथन है, इसलिये ( यहाँ 'प्राण'शब्द ब्रह्मका ही वाचक है) ।
व्याख्या--कौषीतकि-उपनिषद् ( ३ । ८ ) के उक्त प्रसङ्गमे जीवके लक्षणों-
का इस प्रकार वर्णन हुआ है—'न वाचं विजिज्ञासीत। वक्तारं विद्यात् ।'
अर्थात् 'वाणीको जाननेकी इच्छा न करे। वक्ताको जानना चाहिये।' यहाँ वाणी
आदि कार्य और करणके अध्यक्ष जीवात्माको जाननेके लिये कहा है। इसी
प्रकार प्रसिद्ध प्राणके लक्षणका भी वर्णन मिलता है—'अथ खलु प्राण एव
प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति ।' ( ३ । ३ ) अर्थात् 'निस्सन्देह प्रज्ञात्मा
प्राण ही इस शरीरको ग्रहण करके उठाता है।' शरीरको धारण करना मुख्य
प्राणका ही धर्म है; इस कथनको लेकर यदि यह कहो कि 'प्राण'शब्द ब्रह्मवाचक
नहीं होना चाहिये, तो यह कहना ठीक नहीं है; क्योकि ब्रह्मके अतिरिक्त जीव
और प्राणको भी उपास्य माननेसे त्रिविध उपासनाका प्रसङ्ग उपस्थित होगा, जो
उचित नहीं है। इसके सिवा, जीव और प्राण आदिके धर्मोंका आश्रय भी ब्रह्म
ही है, इसलिये ब्रह्मके वर्णनमे उनके धर्मोंका आना अनुचित नहीं है। यहाँ
ब्रह्मके लोकाधिपति, लोकपाल आदि लक्षणोंका भी स्पष्ट वर्णन मिलता है।
इन सब कारणोंसे यहाँ 'प्राण' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है । इन्द्र, जीवात्मा
अथवा प्रसिद्ध प्राणका नहीं—यही मानना ठीक है।
पहला पाद सम्पूर्ण।
दूसरा पाद
प्रथम पादमे यह निर्णय किया गया कि 'आनन्दमय', 'आकाश', 'ज्योति'
तथा 'प्राण' आदि नामोंसे उपनिषद्मे जो जगत्के कारणका और उपास्यदेवका
वर्णन आया है, वह परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है। 'प्राण'शब्दका प्रसङ्ग
आनेसे छान्दोग्योपनिषद् (३।१४।२) मे आये हुए 'मनोमयः प्राण-
शरीरः' आदि वचनोंका स्मरण हो आया। अतः उक्त उपनिषद्के तीसरे अध्यायके
चौदहवें खण्डपर विचार करनेके लिये द्वितीय पाद प्रारम्भ करते हैं।
इस पादमे यह पहला प्रकरण आठ सूत्रोंका है। छान्दोग्योपनिषद् (३।१४।१)
में पहले तो सम्पूर्ण जगत्को ब्रह्मरूप समझकर उसकी उपासना करनेके लिये
कहा गया है। उसके बाद उसके लिये 'सत्यसंकल्प', 'आकाशात्मा' और 'सर्व-
कर्मा' आदि विशेषण दिये गये है (३।१४।२), जो कि जीवात्माके
प्रतीत होते हैं। तत्पश्चात् उसीको 'अणीयान्' अर्थात् अत्यन्त छोटा और 'ज्यायान्'
अर्थात् सबसे बड़ा बताकर हृदयके भीतर रहनेवाला अपना आत्मा और ब्रह्म भी कहा
है (३।१४। ३-४)। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उक्त उपास्यदेव
कौन है ? जीवात्मा या परमात्मा अथवा कोई दूसरा ही ? इसका निर्णय करनेके
लिये यह प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् ॥ १।२।१॥
सर्वत्र = सम्पूर्ण वेदान्त-वाक्योंमे; प्रसिद्धोपदेशात् = (जगत्की उत्पत्ति,
स्थिति और लयके कारणरूपने ) प्रसिद्ध परब्रह्मका ही उपास्यदेवके रूपमें
उपदेश हुआ है, इसलिये (छान्दोग्यश्रुति ३।१४ में बताया हुआ उपास्यदेव
ब्रह्म ही है)।
व्याख्या = छान्दोग्योपनिषद् अध्याय ३ के चौदहवे खण्डके आरम्भमें
सबसे पहले यह मन्त्र आया है—'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत ।
अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेत. प्रेत्य भवति ,
स क्रतुं कुर्वीत ।' अर्थात् 'यह सम्पूर्ण चराचर जगत् निश्चय ब्रह्म ही है; क्योकि
यह उसीसे उत्पन्न हुआ है, स्थितिके समय उसीमे चेष्टा करता हैं और अन्तमें
उसीमें लीन हो जाता है । साधकको राग-द्वेषरहित शान्तचित्त होकर इस