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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र २३-२४ ] अध्याय २ ११७

सूत्र २३-२४ ] अध्याय २ ११७
अभेद नहीं सिद्ध होता । जिस प्रकार कार्यरूप जड प्रपञ्चकी कारणरूप ब्रह्मसे
अभिन्नता होते हुए भी भेद प्रत्यक्ष है । उसी प्रकार जीवात्माका भी ब्रह्मसे भेद
है । ब्रह्म नित्यमुक्त है; अतः अपना अहित करना—आवागमनके चक्रमे अपने-
को डाले रहना आदि दोष उसपर नहीं लगाये जा सकते ।
सम्बन्ध—इसी बातको दृढ करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं—
अश्मादिवच्च तदनुपपत्तिः ॥ २ । १ । २३ ॥
च=तथा; अश्मादिवत्=(जड) पत्थर आदिकी भाँति, (अल्पज्ञ)
जीवात्मा भी ब्रह्मसे भिन्न है, इसलिये; तदनुपपत्तिः=जीवात्मा और परमात्माका
अत्यन्त अभेद नहीं सिद्ध होता ।
व्याख्या—जिस प्रकार परमेश्वर चेतन, ज्ञानस्वरूप, आनन्दमय तथा सबके
रचयिता होनेके कारण अपनी अपरा प्रकृतिके विस्ताररूप पत्थर, काठ, लोहा
और सुवर्ण आदि निर्जीव जड पदार्थोंसे भिन्न हैं, केवल कारणरूपसे उन वस्तुओंमें
अनुगत होनेके कारण ही उनसे अभिन्न कहे जाते हैं, उसी प्रकार अपनी परा
प्रकृतिके विस्तारभूत जीवसमुदायसे भी वे भिन्न ही हैं; क्योंकि जीव अल्पज्ञ एवं
सुख-दुःख आदिका भोक्ता है और परमात्मा सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार,
सर्वनियन्ता तथा सुख-दुःखसे परे है । कारण और कार्यकी अनन्यताको लेकर
ही जीवमात्र परमेश्वरसे अभिन्न बतलाये जाते हैं । इसलिये ब्रह्ममे यह दोष नहीं
आता कि 'वह अपना अहित करता है।' वह हित-अहितसे ऊपर है । सबका
हित उसीसे होता है ।
सम्बन्ध—यहाँतक सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् परमेश्वरको समस्त जगत्का कारण
होते हुए भी सबसे विलक्षण तथा सर्वश्रेष्ठ सिद्ध किया गया । उसमें प्रतीत
होनेवाले दोषोंका भी भलीभाँति निराकरण किया गया । अब उस सत्यसंकल्प
परमेश्वरका बिना किसीकी सहायता और परिश्रमके केवल संकल्पमात्रसे ही विचित्र
जगत्की रचना कर देना उन्हींके अनुरूप है, यह सिद्ध करनेके लिये अगला
प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
उपसंहारदर्शनान्नेति चेन्न क्षीरवद्धि ॥ २ । १ । २४ ॥
चेत्=यदि कहो; उपसंहारदर्शनात्=(लोकमे घट आदि बनानेके लिये)

११८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
साधन-सामग्रीका संग्रह देखा जाता है, (किंतु ब्रह्मके पास कोई साधन नहीं
है) इसलिये; न=ब्रह्म जगत्‌का कर्ता नहीं है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं
है; हि=क्योंकि; क्षीरवत्=दूधकी भाँति (ब्रह्मको अन्य साधनोंकी अपेक्षा नहीं है)।
व्याख्या—यदि कहो कि लोकमें घड़ा, वस्त्र आदि बनानेके लिये सक्रिय कार्य-
कर्ताका होना तथा मिट्टी, दण्ड, चाक और सूत-करघा आदि साधनोंका संग्रह
आवश्यक देखा जाता है; उन साधन-सामग्रियोंके बिना कोई भी कार्य होता नहीं
दिखायी देता है। परंतु ब्रह्मको एकमात्र, अद्वितीय, निराकार, निष्क्रिय आदि
कहा गया है, उसके पास कोई भी साधन-सामग्री नहीं है; इसलिये वह इस
विचित्र जगत्‌की सृष्टिका कार्य नहीं कर सकता तो ऐसा कहना ठीक नहीं है;
क्योकि जैसे दूध अपनी सहज शक्तिसे, किसी बाह्य साधनकी सहायता लिये
बिना ही दहीरूपमे परिणत हो जाता है, उसी प्रकार परमात्मा भी अपनी
स्वाभाविक शक्तिसे जगत्‌का स्वरूप धारण कर लेता है। जैसे मकड़ीको जाला
बनानेके लिये किसी अन्य साधनकी अपेक्षा नहीं होती, उसी प्रकार परब्रह्म
भी किसी अन्य साधनका सहारा लिये बिना अपनी अचिन्त्य शक्तिसे ही
जगत्‌की रचना करता है। श्रुति परमेश्वरकी उस अचिन्त्य शक्तिका वर्णन इस
प्रकार करती है—‘उस परमात्माको किसी साधनकी आवश्यकता नहीं है, उसके
समान और उससे बढ़कर भी कोई नहीं देखा जाता है। उसकी ज्ञान, बल और
क्रियारूप स्वाभाविक पराशक्ति नाना प्रकारकी ही सुनी जाती है।’ (श्वेता० ६।८)
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि ‘दूध-जल आदि जड वस्तुओंमें
तो इस प्रकारका परिणाम होना सम्भव है, क्योंकि उसमें सङ्कल्पपूर्वक विचित्र
रचना करनेकी प्रवृत्ति नहीं देखी जाती; परंतु ब्रह्म तो ईक्षण (संकल्प या विचार)
पूर्वक जगत्‌की रचना करता है, अतः उसके लिये दूधका दृष्टान्त देना ठीक
नहीं है। जो लोग सोच-विचारकर कार्य करनेवाले हैं, ऐसे लोगोंको साधन-
सामग्रीकी आवश्यकता होती ही है। ब्रह्म अद्वितीय होनेके कारण साधनशून्य
है, इसलिये वह जगत्‌का कर्ता कैसे हो सकता है?’ इसपर कहते हैं—
देवादिवदपि लोके ॥ २ । १ । २५ ॥