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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र २१-२३ ] अध्याय १ ९५

सूत्र २१-२३ ] अध्याय १ ९५
कारण सिद्ध करनेके लिये ही है)। इति=ऐसा; काशकृत्स्नः=काशकृत्स्न
आचार्य मानते हैं।
व्याख्या-प्रलयकालमे सम्पूर्ण जगत्की स्थिति परमात्मामे ही बतायी गयी
है (प्र० उ० ४। ८-९); इससे भी यही सिद्ध होता है कि उक्त प्रसङ्गमे
जो सुषुप्तिकालमे प्राज्ञ और जीवात्माका परमात्मामे विलीन होना बताया है, वह
परब्रह्मको जगत्का कारण सिद्ध करनेके लिये ही है।
सम्बन्ध-'वेदमे 'शक्ति' (श्वेता० ६। ८), 'अजा' (श्वेता० १। ९ तथा
४। ५), 'माया' (श्वेता० ४। १०) तथा 'प्रधान' (श्वेता० १। १०)
आदि नामोसे जिसका वर्णन किया गया है, उसीको ईश्वरकी अध्यक्षता-
मे जगत्‌का कारण बताया गया है। गीता आदि स्मृतियोमे भी ऐसा ही वर्णन
है (गीता ९। १०)। इससे यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि जगत्‌का निमित्त
कारण अर्थात् अधिष्ठाता, नियामक, संचालक तथा रचयिता तो अवश्य ही ईश्वर
है; परन्तु उपादान-कारण 'प्रकृति' तथा 'माया' नामसे कहा हुआ 'प्रधान' ही है।'
ऐसा मान लें तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं—
प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् ॥ १ । ४ । २३ ॥
प्रकृतिः=उपादान कारण; च=भी (ब्रह्म ही है), प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरो-
धात्=क्योकि ऐसा माननेसे ही श्रुतिमे आये हुए प्रतिज्ञा-वाक्य तथा दृष्टान्त-वाक्य
बाधित नहीं होगे।
व्याख्या-श्वेतकेतुके उपाख्यानमे उसके पिताने श्वेतकेतुसे पूछा है कि 'उत
तमादेशमप्राक्ष्यो येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातम्।'
(छा० उ० ६। १। २-३) अर्थात् 'क्या तुमने अपने गुरुसे उस तत्त्वके उपदेश-
के लिये भी जिज्ञासा की है, जिसके जाननेसे बिना सुना हुआ सुना हुआ हो-
जाता है, बिना मनन किया मनन किया हुआ हो जाता है तथा बिना जाना
हुआ जाना हुआ हो जाता है?' यह सुनकर श्वेतकेतुने अपने पितासे पूछा—
'भगवन् ! वह उपदेश कैसा है?' तब उसके पिताने दृष्टान्त देकर समझाया—
'यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्यात्।' (छा० उ० ६। १। ४)
अर्थात् 'जिस प्रकार एक मिट्टीके ढेलेका तत्व जान लेनेपर मिट्टीकी बनी सब
वस्तु जानी हुई हो जाती है कि 'यह सब मिट्टी है।' इसके बाद आरुणिने इसी

९६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
प्रकार सोने और लोहेका भी दृष्टान्त दिया है। यहाँ पहले जो पिताने प्रश्न किया
है, वह तो प्रतिज्ञा-वाक्य है, और मिट्टी आदिके उदाहरणसे जो समझाया गया
है, वह दृष्टान्त-वाक्य है। यदि ब्रह्मसे भिन्न 'प्रधान'को यहाँ उपादान कारण
मान लिया जाय तो उसके एक अंशको जाननेपर प्रधानका ही ज्ञान होगा, ब्रह्म-
का ज्ञान नहीं होगा। परंतु वहाँ ब्रह्मका ज्ञान कराना अभीष्ट है, अतः प्रतिज्ञा
और दृष्टान्तकी सार्थकता भी जगत्का उपादान कारण ब्रह्मको माननेसे ही हो
सकती है। मुण्डकोपनिषद् ( १ । १ । २ तथा १ । १ । ७) मे भी इसी प्रकार
प्रतिज्ञा-वाक्य और दृष्टान्त-वाक्य मिलते हैं। बृहदारण्यकोपनिषद् ( ४ । ५ । ६,
८) में भी प्रतिज्ञा तथा दृष्टान्तपूर्वक उपदेश मिलता है। उन सब स्थलोंमें भी
उनकी सार्थकता पूर्ववत् ब्रह्मको जगत्का कारण माननेसे ही हो सकती है; यह
समझ लेना चाहिये।
श्वेताश्वतरोपनिषद् आदिमे अजा, माया, शक्ति और प्रधान आदि नामोंसे
जिसका वर्णन है, वह कोई स्वतन्त्र तत्त्व नहीं है। वह तो भगवान्‌के अधीन
रहनेवाली उन्हींकी शक्तिविशेषका वर्णन है। यह बात वहाँके प्रकरणको देखने-
से स्वतः स्पष्ट हो जाती है। आगे-पीछेके वर्णनपर विचार करनेसे भी यही सिद्ध
होता है। श्वेताश्वतरोपनिषद्‌मे यह स्पष्ट कहा गया है कि 'उस परमेश्वरकी
ज्ञान, बल और क्रियारूप नाना प्रकारकी दिव्य शक्तियाँ स्वाभाविक सुनी
जाती हैं, ( ६ । ८)* तथा उस परमेश्वरका उससे भिन्न कोई कार्यकारण
( शरीर-इन्द्रिय आदि ) नहीं हैं।' ( ६ । ८ )† इससे भी यही सिद्ध होता है
कि उस परमेश्वरकी शक्ति उससे भिन्न नहीं है। अग्निके उष्णत्व और प्रकाश-
की भाँति उसका वह स्वभाव ही है। इसीलिये परमात्माको बिना मन और
इन्द्रियोंके उन सबका कार्य करनेमे समर्थ कहा गया है। (श्वेता० ३।१९)‡

  • यह मन्त्र पृष्ठ २ की टिप्पणीमे आया है।
    † 'न तस्य कार्यं करणं च विद्यते।'
    ‡ अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः।
    स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥
    'वह परमात्मा हाथ-पैरसे रहित होकर भी समस्त वस्तुओंको ग्रहण करनेवाला तथा
    वेगपूर्वक गमन करनेवाला है। आँखोंके बिना ही सब कुछ देखता है, बिना कानोंके ही
    सब कुछ सुनता है, जाननेमें आनेवाली सब वस्तुओंको जानता है, परंतु उसको
    जाननेवाला कोई नहीं है। ज्ञानीजन उसे महान् आदिपुरुष कहते हैं।'