ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र १९] अध्याय २ १४३
सूत्र १९] अध्याय २ १४३
उसीका नाम संज्ञास्कन्ध है। राग, द्वेष, मोह, मद, मात्सर्य, भय, शोक और
विषाद आदि जो चित्तके धर्म हैं, उन्हींको संस्कारस्कन्ध कहते हैं। विज्ञान आदि
चार स्कन्ध चित्त-चैत्तिक कहलाते हैं। विज्ञानस्कन्धरूप चित्तका नाम ही आत्मा
हैं; शेष तीन स्कन्ध 'चैत्य' अथवा 'चैत्तिक' हैं। ये सब प्रकारके व्यवहारोंका
आश्रय बनकर अन्तःकरणमे संगठित होते हैं। यह चारों स्कन्धोंका समुदाय या
चित्त-चैत्तिक वर्ग 'आभ्यन्तर समुदाय' कहा गया है। इन दोनो समुदायोंसे
भिन्न और किसी वस्तु (आत्मा, आकाश आदि) की सत्ता ही नहीं है। ये
ही दोनों बाह्य और आभ्यन्तर समुदाय समस्त लोक-व्यवहारके निर्वाहक हैं।
इनसे ही सब कार्य चल जाता है, इसलिये नित्य 'आत्मा' को माननेकी आवश्यकता
ही नहीं है।
इसके उत्तरमें कहा जाता है कि परमाणु जिसमे हेतु बताये गये हैं,
वह भूत-भौतिक बाह्य-समुदाय और स्कन्धहेतुक आभ्यन्तर-समुदाय—ये दोनो
प्रकारके समुदाय तुम्हारे कथनानुसार मान लिये जायं तो भी उक्त समुदायकी
सिद्धि असम्भव ही है; क्योंकि समुदायके अन्तर्गत जो वस्तुएँ हैं, वे सब
अचेतन हैं, एक-दूसरेकी अपेक्षासे शून्य हैं। अतः उनके द्वारा समुदाय अथवा
संघात बना लेना असम्भव है। परमाणु आदि सभी वस्तुएँ तुम्हारी मान्यताके
अनुसार क्षणिक भी हैं। एक क्षणमे जो परमाणु है, वे दूसरे क्षणमें नहीं है।
फिर वे क्षणविध्वंसी परमाणु और पृथिवी आदि भूत इस समुदाय या संघातके
रूपमे एकत्र होनेका प्रयत्न कैसे कर सकते है, कैसे उनका संघात बन सकता
है अर्थात् किसी प्रकार और कभी भी नहीं बन सकता; इसलिये उनके सघात-
पूर्वक जगत्-उत्पत्तिकी कल्पना करना सर्वथा युक्तिविरुद्ध है; अतः वैभाषिक और
सौत्रान्तिकोंका मत मानने योग्य नहीं है।
सम्बन्ध—पूर्वपक्षीकी ओरसे दिये जानेवाले समाधानका स्वयं उल्लेख
करके सूत्रकार उसका खण्डन करते हैं—
इतरेतरप्रत्ययत्वादिति चेन्नोत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात् ॥२।२।१९॥
चेत्=यदि कहो; इतरेतरप्रत्ययत्वात् =अविद्या, संस्कार, विज्ञान आदि-
मेसे एक-एक दूसरे-दूसरेके कारण होते है, अतः इन्हींसे समुदायकी सिद्धि हो
सकती है; इति न=तो यह ठीक नहीं है; उत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात् =क्योंकि
१४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
ये अविद्या आदि उत्तरोत्तरकी उत्पत्तिमात्रमे ही निमित्त माने गये हैं ( समुदाय
या संघातमे नहीं; अतः इनसे भी समुदायकी सिद्धि नहीं हो सकती ) ।
व्याख्या—बौद्धशास्त्रमें विज्ञानसंततिके कुछ हेतु माने गये हैं, उनके नाम
इस प्रकार हैं—अविद्या, संस्कार, विज्ञान, नाम, रूप, षडायतन, स्पर्श, वेदना,
तृष्णा, उपादान, भव, जाति, जरा, मरण, शोक, परिदेवना, दुःख तथा दुर्मनस्ता
आदि। क्षणिक वस्तुओमे नित्यता और स्थिरता आदिका जो भ्रम है, वही
'अविद्या' कहलाता है। यह अविद्या विषयोमे रागादिरूप 'संस्कार' उत्पन्न करनेमे कारण
बनती है। वह संस्कार गर्भस्थ शिशुमे आलय 'विज्ञान' उत्पन्न करता है। उस
आलय-विज्ञानसे पृथिवी आदि चार भूत होते है, जो शरीर एवं समुदायके कारण है।
वही नामका आश्रय होनेसे 'नाम' भी कहा गया है। वह नाम ही श्याम-गौर आदि
रूपवाले शरीरका उत्पादक होता है। गर्भस्थ शरीरकी जो कलल-बुद्बुद आदि अवस्थाएँ
हैं, उन्हींको नाम तथा 'रूप' शब्दका वाच्य कहा गया है। पृथिवी आदि चार भूत,
नाम, रूप, शरीर, विज्ञान और धातु—ये छः जिनके आश्रय है, उन इन्द्रियोंके
समूहको 'षडायतन' कहा गया है। नाम, रूप तथा इन्द्रियोके परस्पर सम्बन्धका
नाम 'स्पर्श' है। उससे सुख आदिकी 'वेदना' ( अनुभूति ) होती है। उससे
क्रमशः तृष्णा, उपादान, भव, जाति, जरावस्था, मृत्यु, शोक, परिदेवना तथा दुर्मनस्ता
( मनकी उद्विग्नता ) आदि भी इसी प्रकार उत्पन्न होते हैं। तत्पश्चात् पुनः
अविद्या आदिके क्रमसे पूर्वोक्त सभी बाते प्रकट होती रहती है। ये घटीयन्त्र
( रहट ) की भाँति निरन्तर चक्कर लगाते हैं, अतः यदि इस मान्यताको लेकर
कहा जाय कि इन्हींसे समुदायकी भी सिद्धि हो जाती है तो यह ठीक नहीं है;
क्योकि पूर्वोक्त अविद्या आदिमेसे जो पूर्ववर्ती है, वह बादमे कहे हुए
संस्कार आदिकी उत्पत्तिमात्रमे कारण होता है, संघातकी उत्पत्तिमे नहीं; अतः
उसकी सिद्धि असम्भव है।
सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें यह बात बतायी गयी कि अविद्या आदि हेतु संस्कार
आदिकी उत्पत्तिमात्रमें ही निमित्त माने गये है, अतः उनसे संघात ( समुदाय )
की सिद्धि नहीं हो सकती। अब यह सिद्ध करते हैं कि वे अविद्या आदि हेतु
संस्कार आदि भावोंकी उत्पत्तिमे भी निमित्त नही हो सकते—
उत्तरोत्पादे च पूर्वनिरोधात् ॥ २ । २ । २० ॥