ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र १२-१३ ] अध्याय १ ३१
सूत्र १२-१३ ] अध्याय १ ३१
ब्रह्मचारी सत्यकाम नामक ऋषिके आश्रममें रहकर ब्रह्मचर्यका पालन करता हुआ
गुरुकी और अग्नियोंकी सेवा करता था । सेवा करते-करते उसे बारह वर्ष व्यतीत
हो गये; परन्तु गुरुने उसे न तो उपदेश दिया और न स्नातक ही बनाया ।
इसके विपरीत उसीके साथ आश्रममे प्रविष्ट होनेवाले दूसरे शिष्योको स्नातक
बनाकर घर भेज दिया । तब आचार्यसे उनकी पत्नीने कहा, 'भगवन् ! इस
ब्रह्मचारीने अग्नियोकी अच्छी प्रकार सेवा की है । तपस्या भी इसने की ही है ।
अब इसे उपदेश देनेकी कृपा करे ।' परन्तु अपनी भार्याकी बातको अनसुनी करके
सत्यकाम ऋषि उपकोशलको उपदेश दिये बिना ही बाहर चले गये । तब मनमे
दुखी होकर उपकोशलने अनशन व्रत करनेका निश्चय कर लिया । यह देख
आचार्य-पत्नीने पूछा —'ब्रह्मचारी ! तू भोजन क्यो नहीं करता है ?' उसने कहा,
'मनुष्यके मनमे बहुत-सी कामनाएँ रहती है । मेरे मनमे बड़ा दुःख है, इसलिये
में भोजन नहीं करूँगा ।' तब अग्नियोने एकत्र होकर विचार किया कि 'इसने
हमारी अच्छी तरह सेवा की है, अतः उचित है कि हम इसे उपदेश करे'
ऐसा विचार करके अग्नियोने कहा—'प्राण ब्रह्म है, क ब्रह्म है, ख ब्रह्म है ।'
उपकोशल बोला—'यह बात तो मै जानता हूँ कि प्राण ब्रह्म है । परन्तु 'क'
और 'ख' को नहीं जानता ।' अग्नियोने कहा—'निस्सन्देह जो 'क' है, वही
'ख' है और जो 'ख' है, वही 'क' है तथा प्राण भी वही है ।' इस प्रकार उन्होने
ब्रह्मको 'क' सुख-स्वरूप और 'ख' आकाशकी भाँति सूक्ष्म एव व्यापक बताया
तथा वही प्राणरूपमे सबको सत्ता-स्फूर्ति देनेवाला है; इस प्रकार सकेतसे ब्रह्मका
परिचय कराया ।
उसके बाद गार्हपत्य अग्निने प्रकट होकर कहा—'सूर्यमे जो यह पुरुष
दीखता है, वह मै हूँ; जो उपासक इस प्रकार जानकर उपासना करता है, वह
पापोका नाश करके अच्छे लोकोका अधिकारी होता है तथा पूर्ण आयुष्मान्
और उज्ज्वल जीवनसे युक्त होता है । उसका वश कभी नष्ट नहीं होता ।'
इसके बाद 'अन्वाहार्यपचन' अग्निने प्रकट होकर कहा, 'चन्द्रमामे जो यह पुरुष
दिखायी देता है, वह मै हूँ । जो मनुष्य इस रहस्यको समझकर उपासना करता
है, वह अच्छे लोकोका अधिकारी होता है ।' इत्यादि
तत्पश्चात् आहवनीय अग्निने प्रकट होकर कहा, 'बिजलीमे जो यह पुरुष
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दीखता है, वह मैं हूँ ।' इसको जानकर उपासना करनेका फल भी उन्होंने
दूसरी अग्नियोंकी भाँति ही बतलाया । तदनन्तर सब अग्नियोंने एक साथ कहा,
'हे उपकोशल ! हमने तुमको हमारी विद्या ( अग्नि-विद्या ) और आत्म-विद्या
दोनों ही बतलायी है । आचार्य तुमको इनका मार्ग दिखलावेंगे ।' इतनेमें ही
उसके गुरु सत्यकाम आ गये । आचार्यने पूछा, 'सौम्य ! तेरा मुख ब्रह्मवेत्ताकी
भाँति चमकता है, तुझे किसने उपदेश दिया है ?' उपकोशलने अग्नियोंकी ओर
संकेत किया । आचार्यने पूछा, 'इन्होंने तुझे क्या बतलाया है ?' तब उपकोशलने
अग्नियोंसे सुनी हुई सब बातें बता दीं । तत्पश्चात् आचार्यने कहा, 'हे सौम्य !
इन्होंने तुझे केवल उत्तम लोकप्राप्तिके साधनका उपदेश दिया है, अब मैं तुझे
वह उपदेश देता हूँ, जिसको जान लेनेवालेको पाप उसी प्रकार स्पर्श नहीं कर
सकते, जैसे कमलके पत्तेको जल ।' उपकोशलने कहा, 'भगवन् ! बतलानेकी
कृपा कीजिये ।' इसके उत्तरमें आचार्यने कहा, 'जो नेत्रमे यह पुरुष दिखलायी
देता है, यही आत्मा है, यही अमृत है, यही अभय और ब्रह्म है ।' उसके
बाद उसीको 'संयद्वाम' 'वामनी' और 'भामनी' बतलाकर अन्तमें इन विद्याओका
फल अर्चिर्मागसे ब्रह्मको प्राप्त होना बताया है ।
इस प्रकरणको देखनेसे मालूम होता है कि आँखके भीतर दीखनेवाला पुरुष
परब्रह्म ही है, जीवात्मा या प्रतिबिम्बके लिये यह कथन नहीं है; क्योकि ब्रह्मविद्या-
के प्रसङ्गमे उसका वर्णन करके उसे आत्मा, अमृत, अभय और ब्रह्म कहा है ।
इन विशेषणोंकी उपपत्ति ब्रह्ममे ही लग सकती है, अन्य किसीमे नहीं ।
सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि यहाँ ब्रह्मको आँखमे दीखनेवाला
पुरुष क्यों कहा गया ? वह किसी स्थानविशेषमें रहनेवाला थोड़े ही है ? इसपर
कहते हैं—
स्थानादिव्यपदेशाच्च ॥ १ । २ । १४ ॥
स्थानादिव्यपदेशात् = श्रुतिमे अनेक स्थलोंपर ब्रह्मके लिये स्थान आदिका
निर्देश किया गया है, इसलिये; च = भी ( नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष यहाँ ब्रह्म ही है ) ।
व्याख्या—श्रुतिमें जगह-जगह ब्रह्मको समझानेके लिये उसके स्थान तथा
नाम, रूप आदिका वर्णन किया गया है । जैसे अन्तर्यामि-ब्राह्मण ( बृह० उ०
३ । ७ । ३—२३ ) में ब्रह्मको पृथ्वी आदि अनेक स्थानोंमें स्थित बताया