ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र १३-१५ ] अध्याय २ १३९
सूत्र १३-१५ ] अध्याय २ १३९
भेदकी दृष्टिसे दोनोंमें समानता है। अतः जैसे द्वयणुक समवाय-सम्बन्धके द्वारा
उन दो अणुओंसे सम्बद्ध माना गया है, उसी प्रकार समवाय भी अपने समवायीके
साथ नूतन समवायसम्बन्धके द्वारा सम्बद्ध माना जा सकता है। इस प्रकार
एकके बाद दूसरे समवायसम्बन्धकी कल्पना होती रहेगी और इस परम्पराका
कहीं भी अन्त न होनेके कारण अनवस्था दोष प्राप्त होगा। अतः समवाय
सम्बन्ध सिद्ध न हो सकनेके कारण दो अणुओसे द्वयणुककी उत्पत्ति आदि क्रमसे
जगत्की सृष्टि नहीं हो सकती।
सम्बन्ध—यदि परमाणुओमे सृष्टि और प्रलयके निमित्त क्रियाका होना
स्वाभाविक मान लें तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं—
नित्यमेव च भावात् ॥ २ । २ । १४ ॥
च=इसके सिवा (परमाणुओमे प्रवृत्ति या निवृत्तिका कर्म स्वाभाविक
माननेपर ); नित्यम्=सदा; एव=ही; भावात्=सृष्टि या प्रलयकी सत्ता बनी
रहेगी, इसलिये (परमाणुकारणवाद असङ्गत है)।
व्याख्या—परमाणुवादी परमाणुओंको नित्य मानते हैं, अतः उनका जैसा भी
स्वभाव माना जाय, वह नित्य ही होगा। यदि ऐसा मानें कि उनमें प्रवृत्ति-मूलक
कर्म स्वभावतः होता है, तब तो सदा ही सृष्टि होती रहेगी, कभी भी प्रलय नहीं
होगा। यदि उनमे निवृत्ति-मूलक कर्मका होना स्वाभाविक माने तब तो सदा संहार
ही बना रहेगा, सृष्टि नहीं होगी। यदि दोनों प्रकारके कर्मोंको उनमें स्वाभाविक माना
जाय तो यह असङ्गत जान पड़ता है; क्योंकि एक ही तत्त्वमे परस्परविरुद्ध दो
स्वभाव नहीं रह सकते। यदि उनमे दोनो तरहके कर्मोंका न होना ही स्वाभाविक
मान लिया जाय तब तो यह स्वीकार करना पडेगा कि कोई निमित्त प्राप्त होनेपर ही
उनमें प्रवृत्ति एवं निवृत्ति-सम्बन्धी कर्म भी हो सकते हैं; परन्तु उनके द्वारा
माने हुए निमित्तसे सृष्टिका आरम्भ न होना पहले ही सिद्ध कर दिया गया है,
इसलिये यह परमाणुकारणवाद सर्वथा अयुक्त है।
• सम्बन्ध—अब परमाणुओंकी नित्यतामें ही संदेह उपस्थित करते हुए परमाणु-
कारणवादकी व्यर्थता सिद्ध करते हैं—
रूपादिमत्त्वाच्च विपर्ययो दर्शनात् ॥ २ । २ । १५ ॥
१४० वेदान्त-दर्शन [ पाद २
च = तथा; रूपादिमत्त्वात् = परमाणुओको रूप, रस आदि गुणोवाला माना
गया है, इसलिये; विपर्ययः = उनमे नित्यताके विपरीत अनित्यताका दोष उपस्थित
होता है; दर्शनात् = क्योकि ऐसा ही देखा जाता है ।
व्याख्या—वैशेषिक मतमे परमाणु नित्य होनेके साथ-साथ रूप, रस आदि
गुणोंसे युक्त भी माने गये हैं । इससे उनमे नित्यताके विपरीत अनित्यताका दोष
उपस्थित होता है; रूपादि गुणोंसे युक्त होनेपर वे नित्य नहीं माने जा सकते;
क्योकि रूप आदि गुणवाली जो घट आदि वस्तुएँ हैं, उनकी अनित्यता प्रत्यक्ष
देखी जाती है । यदि उन परमाणुओको रूप, रस आदि गुणोसे रहित माने तो
उनके कार्यमे रूप आदि गुण नहीं होने चाहिये । इसके सिवा वैसा माननेपर
'रूपादिमन्तो नित्याश्च'—परमाणु रूपादि गुणोसे युक्त और नित्य है, इस प्रतिज्ञा-
की सिद्धि नहीं होती है । इस प्रकार अनुपपत्तियोसे भरा हुआ यह परमाणुवाद
कदापि सिद्ध नहीं होता ।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे परमाणुवादको सदोष सिद्ध करते हैं—
उभयथा च दोषात् ॥ २ । २ । १६ ॥
उभयथा = परमाणुओको न्यूनाधिक गुणोसे युक्त मानें या गुणरहित मानें,
दोनो प्रकारसे; च = ही; दोषात् = दोष आता है, इसलिये (परमाणुवाद सिद्ध नहीं होता) ।
व्याख्या—पृथिवी आदि भूतोमेसे किसीमे अधिक और किसीमे कम गुण
देखे जाते हैं, इससे उनके आरम्भक परमाणुओमे भी न्यूनाधिक गुणोकी स्थिति
माननी होगी । ऐसी दशामे यदि उनको अधिक गुणोसे युक्त माना जाय तब तो
सभी कार्योमे उतने ही गुण होने चाहिये; क्योकि कारणके गुण कार्यमे समान
जातीय गुणान्तर प्रकट करते हैं । उस दशामें जलमे भी गन्ध और तेजमें भी
गन्ध एवं रस प्रकट होनेका दोष प्राप्त होगा । अधिक गुणवाली पृथिवीमे स्थूलता-
नामक गुण देखा जाता है, यही गुण कारणभूत परमाणुमे मानना पड़ेगा । यदि
ऐसा मानें कि उनमें न्यूनतम अर्थात् एक-एक गुण ही है तब तो सभी स्थूल
भूतोंमे एक-एक गुण ही प्रकट होना चाहिये । उस अवस्थामे तेजमे स्पर्श नहीं
होगा, जलमे रूप और स्पर्श नहीं रहेंगे तथा पृथिवीमे रस, रूप एवं स्पर्शका
अभाव होगा; क्योकि उनके परमाणुओमें एकसे अधिक गुणका अभाव है । यदि
उनमें सर्वथा गुणोका अभाव मान लें तो उनके कार्योंमे जो गुण प्रकट होते