ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ५६-५९ ] अध्याय ३ २९७
सूत्र ५६-५९ ] अध्याय ३ २९७
अङ्गकी उपासना करते हो।' साथ ही उन्होंने उस एकाङ्ग उपासनाका
साधारण फल बताया और उन सबको भय दिखाते हुए कहा, 'यदि
तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा सिर गिर जाता, तुम अंधे हो जाते'-इत्यादि
(छा० उ० ५ । ११ से १७ तक) । तदनन्तर (अठारहवे खण्डमे) यह बताया
कि 'तुमलोग उस वैश्वानर परमात्माके एक-एक अङ्गकी उपासना करते हो, जो
इस बातको समझकर आत्मारूपसे इसकी उपासना करता है, वह समस्त लोकमें, समस्त
प्राणियोमे और समस्त आत्माओमे अन्न भक्षण करनेवाला हो जाता है।' (छा० उ०
५ । १८ । १) इस प्रकार वहाँ पूर्ण उपासनाका अधिक फल बताया गया
है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि एक-एक अङ्गकी उपासनाकी अपेक्षा पूर्ण
उपासना श्रेष्ठ है। अतः पूर्ण उपासनाका ही अनुष्ठान करना चाहिये।
सम्बन्ध-नाना प्रकारसे बतायी हुई ब्रह्मविद्या भिन्न-भिन्न हे कि एक ही है ?
इस जिज्ञासापर कहते हैं-
नाना शब्दादिभेदात् ॥ ३ । ३ । ५८ ॥
शब्दादिभेदात्=शब्द आदिका भेद होनेके कारण; नाना=सब विद्याएँ
अलग-अलग हैं।
व्याख्या-सद्-विद्या, भूमविद्या, दहरविद्या, उपकोसलविद्या, शाण्डिल्यविद्या,
वैश्वानरविद्या, आनन्दमयविद्या, अक्षरविद्या इत्यादि भिन्न-भिन्न नाम और विधि-
विधानवाली इन विद्याओमे नाम और प्रकार आदिका भेद है। किसी अधिकारीके
लिये एक विद्या उपयुक्त होती है, तो अन्यके लिये दूसरी ही उपयुक्त होती है; इसलिये
सबका फल एक ब्रह्मकी प्राप्ति होनेपर भी विद्या एक नहीं है, भिन्न-भिन्न हैं।
सम्बन्ध-इन सबके समुच्चयका विधान है या विकल्पका अर्थात् इन सबको
मिलाकर अनुष्ठान करना चाहिये या एक-एकका अलग-अलग ? इस जिज्ञासापर
कहते हैं-
विकल्पोऽविशिष्टफलत्वात् ॥ ३ । ३ । ५९ ॥
अविशिष्टफलत्वात्=सब विद्याओंका एक ही फल है, फलमें भेद नहीं
है, इसलिये; विकल्पः=अलग-अलग अनुष्ठान करना ही उचित है।
व्याख्या-जिस प्रकार स्वर्गादिकी प्राप्तिके साधनभूत जो भिन्न-भिन्न यज्ञ-याग
आदि बताये गये हैं, उनमेंसे जिन-जिनका फल एक है, उनका समुच्चय नहीं होता।
यजमान अपने इच्छानुसार उनमेसे किसी भी एक यज्ञका अनुष्ठान कर सकता है।
२९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
इसी प्रकार उपर्युक्त विद्याओंका ब्रह्मसाक्षात्काररूप एक ही फल होनेके कारण
उनके समुच्चयकी आवश्यकता नहीं है। साधक अपनी रुचिके अनुकूल किसी
एक विद्याके अनुसार ही साधन कर सकता है।
सम्बन्ध-जो सकाम उपासनाएँ अलग-अलग फलके लिये बतायी गयी है,
उनका अनुष्ठान किस प्रकार करना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
काम्यास्तु यथाकामं समुच्चीयेरन्न वा पूर्वहेत्वभावात् ॥ ३।३।६० ॥
काम्याः=सकाम उपासनाओका अनुष्ठान; तु=तो; यथाकामम्=अपनी-
अपनी कामनाके अनुसार; समुच्चीयेरन्=समुच्चय करके किया करे; वा=
अथवा; न=समुच्चय न करके अलग-अलग करें; पूर्वहेत्वभावात्=क्योंकि इनमें
पूर्वोक्त हेतु ( फलकी समानता ) का अभाव है।
व्याख्या—सकाम उपासनाओंमें सबका एक फल नहीं बताया गया है, भिन्न-
भिन्न उपासनाका भिन्न-भिन्न फल कहा गया है, इस प्रकार पूर्वोक्त हेतु न होनेके
कारण सकाम उपासनाका अनुष्ठान अधिकारी अपनी कामनाके अनुसार जिस
प्रकार आवश्यक समझे, कर सकता है। जिन-जिन भोगोंकी कामना हो, उन-
उनके लिये बतायी हुई सब उपासनाओका समुच्चय करके भी कर सकता है
और अलग-अलग भी कर सकता है, इसमें कोई अड़चन नहीं है।
सम्बन्ध-अब उद्गीथ आदि अङ्गोंमें की जानेवाली उपासनाके विषयमें
विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। पहले चार सूत्रोंद्वारा
पूर्वपक्षकी उत्थापना की जाती है—
अङ्गेषु यथाश्रयभावः ॥ ३ । ३ । ६१ ॥
अङ्गेषु=भिन्न-भिन्न अङ्गोंमें (की जानेवाली उपासनाओंका);यथाश्रयभावः=
यथाश्रय भाव है अर्थात् जो उपासना जिस अङ्गके आश्रित है, उस अङ्गके अनुसार
ही-उस उपासनाका भी भाव समझ लेना चाहिये।
व्याख्या-यज्ञकर्मके अङ्गभूत उद्गीथ आदिमे की जानेवाली जो उपासनाएँ
है, जिनका दिग्दर्शन पचपनवें सूत्रमे किया गया है, उनमेसे जो उपासना जिस
अङ्गके आश्रित है, उस आश्रयके अनुसार ही उसकी व्यवस्था करनी चाहिये।
इसलिये यही सिद्ध होता है कि जिन-जिन कर्मोंके अङ्गोका समुच्चय हो सकता है,उन-
उन अङ्गोंमें की जानेवाली उपासनाओंका भी उन कर्मोंके साथ समुच्चय हो सकता है।