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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र ४१ ] अध्याय २ १८७

सूत्र ४१ ] अध्याय २ १८७
व्याख्या—वृहदारण्यकमें कहा है कि 'जो जीवात्मामे रहकर उसका नियमन
करता है, वह अन्तर्यामी तेरा आत्मा है' ( ३ । ७ । २२ ), छान्दोग्यमे कहा
है कि 'मै इस जीवात्माके सहित प्रविष्ट होकर नामरूपको प्रकट करूँगा।'
( ६ । ३ । २ ) तथा केनोपनिषद्में जो यक्षकी आख्यायिका है, उसमे
भी यह सिद्ध किया गया है कि 'अग्नि और वायु आदि देवताओमे अपना कार्य
करनेकी स्वतन्त्र शक्ति नहीं है, उस परब्रह्मसे शक्ति पाकर ही वे अपना-अपना
कार्य करनेमे समर्थ होते है ।' ( ३ । १—१० ) इत्यादि । श्रुतियोके
इस वर्णनसे यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा स्वतन्त्रतापूर्वक कुछ भी नहीं कर
सकता, वह जो कुछ करता है, परब्रह्म परमेश्वरके सहयोगसे, उसकी दी हुई
शक्तिके द्वारा ही करता है।
जीवका कर्तापन ईश्वराधीन है, यह बात गीतामें स्पष्ट कही गयी है—
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥
'हे अर्जुन ! शरीररूपी यन्त्रमें आरूढ़ हुए सब प्राणियोंको अपनी मायासे
गुणोंके अनुसार चलाता हुआ ईश्वर सबके हृदयमे निवास करता है ।'
( गी० १८ । ६१ )
विष्णुपुराणमें जहाँ प्रह्लादका प्रसङ्ग आया है, वहाँ प्रह्लादने अपने पितासे
कहा है—'पिताजी ! वे भगवान् विष्णु केवल मेरे ही हृदयमे नहीं हैं, अपितु
समस्त लोकोंको सब ओरसे व्याप्त करके स्थित हो रहे हैं, वे ही सर्वव्यापी
परमेश्वर मुझे और आपके सहित अन्य सब प्राणियोंको भी समस्त चेष्टाओंमें
नियुक्त करते हैं ।' (विष्णु० १ । १७ । २६)*। इससे भी यह सिद्ध होता है कि
जीवात्माका कर्तापन सर्वथा ईश्वराधीन है। यह जो कुछ करता है, उसीकी दी
हुई शक्तिसे करता है, तथापि अभिमानवश अपनेको कर्ता मानकर फँस जाता है
( गीता ३ । २७ ) ।
सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें जीवात्माका कर्तापन ईश्वराधीन बताया गया, इसे
सुनकर यह जिज्ञासा होती है कि ईश्वर पहले तो जीवोंसे शुभाशुभ कर्म करवाता

  • न केवलं मद्धृदयं स विष्णुराक्रम्य लोकानखिलानवस्थितः ।
    स मां त्वदादींश्च पितः समस्तान् समस्तचेष्टासु युनक्ति सर्वगः ॥

३८८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
है और फिर उसका फल-भोग करवाता है, यह माननेसे ईश्वरमें विषमता और
निर्दयताका दोष आयेगा, उसका निराकरण कैसे होगा, इसपर कहते हैं—
कृतप्रयत्नापेक्षस्तु विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्या-
दिभ्यः ॥ २ । ३ । ४२ ॥
तु=किन्तु; कृतप्रयत्नापेक्षः=ईश्वर जीवके पूर्वकृत कर्म-संस्कारोंकी अपेक्षा
रखते हुए ही उसको नवीन कर्मोंमें नियुक्त करता है, इसलिये तथा; विहितप्रति-
षिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः=विधि-निषेध शास्त्रकी सार्थकता आदि हेतुओसे भी ईश्वर
सर्वथा निर्दोष है ।
व्याख्या—ईश्वरद्वारा जो जीवात्माको नवीन कर्म करनेकी शक्ति देकर उसे
नवीन कर्मोंमें नियुक्त किया जाता है, वह उस जीवात्माके जन्म-जन्मान्तरमे
सञ्चित किये हुए कर्म-संस्कारसे उत्पन्न स्वभावकी अपेक्षासे ही किया जाता है,
बिना अपेक्षाके नहीं । इसलिये ईश्वर सर्वथा निर्दोष है तथा ऐसा करनेसे ही
शास्त्रोंमें अच्छे काम करनेके लिये कहे हुए विधि-वाक्योंकी और पापाचरण न
करनेके लिये कहे हुए निषेध-वाक्योंकी सार्थकता सिद्ध होती है । तथा ईश्वरने
जीवको अपने स्वभावका सुधार करनेके लिये जो स्वतन्त्रता प्रदान की है, वह भी
सार्थक होती है । इसलिये ईश्वरका यह कर्म न्याय ही है । इसी भावको स्पष्ट
करनेके लिये गीतामे भगवान्ने कहा है कि—
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥
'हे कुन्तीपुत्र ! अपने जन्म-जन्मान्तरके कर्मसंस्काररूप स्वभावजनित
कर्मोंद्वारा बँधा हुआ तू जिस कामको नहीं करना चाहता उसे भी परवश हुआ
अवश्य करेगा ।' ( गी० १८ । ६० )
इसके बाद ही यह भी कहा है कि 'सबके हृदयमे स्थित परमेश्वर सबसे
चेष्टा कराता है ।' इससे भी यही सिद्ध होता है कि परब्रह्म परमेश्वर जीवोद्वारा
जन्म-जन्मान्तरमें किये हुए कर्मोंकी अपेक्षासे ही उनको कर्म करनेकी शक्ति
आदि प्रदान करके स्वाभाविक स्वधर्मरूप नवीन कर्मोंमें नियुक्त करते हैं । इसलिये
ईश्वर सर्वथा निर्दोष हैं ।
सम्बन्ध—पूर्वप्रकरणमें यह सिद्ध किया गया कि जीवात्मा कर्ता है और