ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ९—१२ ] अध्याय ४ ३६७
सूत्र ९—१२ ] अध्याय ४ ३६७
जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, वे सब साधक ब्रह्मलोकोंमें जाकर अन्तकाल-
मे परम अमृतस्वरूप होकर भलीभाँति मुक्त हो जाते हैं ।'* ( मु० उ० ३ ।
२ । ६ ) इस प्रकार श्रुतिमे उन सबकी मुक्तिका कथन होनेसे यह सिद्ध होता
है कि प्रलयकालमे ब्रह्मलोकका नाश होनेपर उसके स्वामी ब्रह्माके सहित वहाँ
गये हुए ब्रह्मविद्याके उपासक भी परब्रह्मको प्राप्त होकर मुक्त हो जाते हैं, इसलिये
उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती ।
सम्बन्ध—स्मृति-प्रमाणसे पूर्वपक्षको पुष्ट करते हैं—
स्मृतेश्च ॥ ४ । ३ । ११ ॥
स्मृतेः=स्मृति-प्रमाणसे; च=भी (यही बात सिद्ध होती है) ।
व्याख्या—वे सब शुद्ध अन्त.करणवाले पुरुष प्रलयकाल प्राप्त होनेपर समस्त
जगत्के अन्तमे ब्रह्माके साथ उस परमपदमें प्रविष्ट हो जाते हैं ।'† ( कू० पु०
पूर्वख० १२ । २६९ ) इस प्रकार स्मृतिमे भी यही भाव प्रदर्शित किया है,
इसलिये कार्यब्रह्मकी प्राप्ति होती है, यही मानना ठीक है ।
सम्बन्ध—यहाँतक पूर्वपक्षकी स्थापना करके उसके उत्तरमें आचार्य जैमिनि-
का मत उद्धृत करते हैं—
परं जैमिनिर्मुख्यत्वात् ॥ ४ । ३ । १२ ॥
जैमिनिः=आचार्य जैमिनिका कहना है कि; मुख्यत्वात्=ब्रह्मशब्दका
मुख्य वाच्यार्थ होनेके कारण; परम्=परब्रह्मको प्राप्त होता है ( यही मानना
युक्तिसङ्गत है ) ।
व्याख्या—वह अमानव पुरुष इनको ब्रह्मके समीप पहुँचा देता है ( छा०
उ० ४ । १५ । ५ ) श्रुतिके इस वाक्यमे कहा हुआ 'ब्रह्म' शब्द मुख्यतया
परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है, इसलिये अर्चि आदि मार्गसे जानेवाले परब्रह्म
परमात्माको ही प्राप्त होते है, कार्यब्रह्मको नहीं। जहाँ मुख्य अर्थकी उपयोगिता
नहीं हो, वहीं गौण अर्थकी कल्पना की जा सकती है, मुख्य अर्थकी उपयोगिता
रहते हुए नहीं । वह परब्रह्म परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण होनेपर भी उसके परम
- यह मन्त्र पृष्ठ २९३ मे अर्थसहित आ गया है ।
† ब्रह्मणा सह ते सर्वे संप्राप्ते प्रतिसंचरे । परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ॥
३६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
धामका प्रतिपादन और वहाँ विद्वान् उपासकोके जानेका वर्णन श्रुति (क० उ० १ ।
३।९), (प्र० उ० १।१०) और स्मृतियोमे (गीता १५। ६) जगह-जगह किया
गया है। इसलिये उसके लोकविशेषमे गमन करनेके लिये कहना कार्यब्रह्मका द्योतक
नहीं है। बहुवचनका प्रयोग भी आदरके लिये किया जाना सम्भव है तथा उस
सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके अपने लिये रचे हुए अनेक लोकोका होना भी कोई
असम्भव बात नहीं है। अतः सर्वथा यही सिद्ध होता है कि वे उसीके परम-
धाममे जाते है तथा परब्रह्म परमात्माको ही प्राप्त होते हैं, कार्यब्रह्मको नहीं।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे जैमिनिके मतको दृढ़ करते है—
दर्शनाच्च ॥ ४ । ३ । १३ ॥
दर्शनात्=श्रुतिमें जगह-जगह गतिपूर्वक परब्रह्मकी प्राप्ति दिखायी गयी है,
इससे; च=भी (यही सिद्ध होता है कि कार्यब्रह्मकी प्राप्ति नहीं है)।
व्याख्या—'उनमेंसे सुषुम्ना नाडीद्वारा ऊपर उठकर अमृतत्वको प्राप्त होता
है।' (छा० उ० ८। ६। ६) 'वह संसारमार्गके उस पार उस विष्णुके परम-
पदको प्राप्त होता है।' (क० उ० १ । ३ । ९) इसके सिवा सुषुम्ना नाडीद्वारा
शरीरसे निकलकर जानेका वर्णन कठोपनिषद्मे भी वैसा ही आया है (क० उ०
२ । ३ । १६) इस प्रकार जगह-जगह गतिपूर्वक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति
श्रुतिमे प्रदर्शित की गयी है। इससे यही सिद्ध होता है कि देवयान-मार्गके द्वारा
जानेवाले ब्रह्मविद्याके उपासक परब्रह्मको ही प्राप्त होते हैं, न कि कार्यब्रह्मको।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे जैमिनिके मतको दृढ़ करते हैं—
न च कार्ये प्रतिपत्त्यभिसन्धिः ॥ ४ । ३ । १४ ॥
च=इसके सिवा; प्रतिपत्त्यभिसन्धिः=उन ब्रह्मविद्याके उपासकोका प्राप्ति-
विषयक संकल्प भी; कार्ये=कार्यब्रह्मके लिये; न=नहीं है।
व्याख्या—इसके सिवा, उन ब्रह्मविद्याके उपासकोंका जो प्राप्तिविषयक संकल्प
है, वह कार्यब्रह्मके लिये नहीं है; अपितु परब्रह्म परमात्माको ही प्राप्त करनेके लिये
उनकी साधनमे प्रवृत्ति देखी गयी है; इसलिये भी उनको कार्यब्रह्मकी प्राप्ति नहीं
हो सकती, परब्रह्मकी ही प्राप्ति होती है। श्रुतिमे जो यह कहा गया है कि वे