ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ५-८ ] अध्याय ४ ३५१
सूत्र ५-८ ] अध्याय ४ ३५१
अण्व्यो मात्रा विनाशिन्यो दशार्धानां तु याः स्मृताः ।
ताभिः सार्धमिदं सर्वं संभवत्यनुपूर्वशः ॥ (मनु० १ । २७)
'पाँचों भूतोंकी जो विनाशशील पाँच सूक्ष्म तन्मात्राएँ ( रूप, रस, गन्ध,
स्पर्श और शब्द ) कही गयी हैं, उनके साथ यह सम्पूर्ण जगत् क्रमशः उत्पन्न
होता है ।'
सम्बन्ध-यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि मरणकालकी गतिका जो वर्णन
किया गया है, यह साधारण मनुष्योंके विषयमें है या ब्रह्मलोकको प्राप्त होनेवाले
तत्त्ववेत्ताओंके विषयमें ? इसपर कहते हैं—
समाना चासृत्युपक्रमादमृतत्वं चानुपोष्य ॥ ४ । २ । ७ ॥
आसृत्युपक्रमात्=देवयानमार्गद्वारा ब्रह्मलोकमे जानेका क्रम आरम्भ होनेतक,
समाना=दोनोंकी गति समान; च=ही है, च=क्योंकि; अनुपोष्य=सूक्ष्म
शरीरको सुरक्षित रखकर ही; अमृतत्वम्=ब्रह्मलोकमे अमृतत्व लाभ करना
ब्रह्मविद्याका फल बताया गया है ।
व्याख्या-वाणी मनमे स्थित होती है, यहाँसे लेकर प्राण, मन और इन्द्रियों-
सहित जो जीवात्माके सूक्ष्म भूतसमुदायमे स्थित होनेतकका यानी स्थूल-शरीरसे
निकलकर ब्रह्मलोकमे जानेका जो मार्ग बताया गया है, उसका आरम्भ होनेसे पहले
साधारण मनुष्योंकी और ब्रह्मलोकमे जानेवाले ज्ञानी पुरुषकी गति एक समान ही
बतायी गयी है; क्योंकि सूक्ष्म शरीरके सुरक्षित रहते हुए ही इस लोकसे ब्रह्म-
लोकमे जाना होता है और वहाँ जाकर उसे अमृतस्वरूपकी प्राप्ति होती है ।
इसीलिये अलग-अलग वर्णन नहीं किया गया है ।
सम्बन्ध-उस प्रकरणके अन्तमें जो यह कहा गया है कि मन, इन्द्रियाँ
और जीवात्माके सहित वह तेज परमदेवतामें स्थित होता है तो यह स्थित
होना कैसा है; क्योंकि प्रकरण साधारण मनुष्योंका है, सभी समान भावसे
परमदेव परमात्माको प्राप्त हो जायँ, यह सम्भव नहीं ! इस जिज्ञासापर कहते हैं—
तदापीतेः संसारव्यपदेशात् ॥ ४ । २ । ८ ॥
संसारव्यपदेशात्=साधारण जीवोंका मरनेके बाद बार-बार जन्म ग्रहण
करनेका कथन होनेके कारण (यही सिद्ध होता है कि); तत्=उनका वह सूक्ष्म
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शरीर; आ अपीतेः=मुक्तावस्था प्राप्त होनेतक रहता है, इसलिये नूतन स्थूल शरीर
प्राप्त होनेके पहले-पहले उनका परमात्मामें स्थित रहना प्रलयकालकी भाँति है ।
व्याख्या—उस प्रकरणमें जो एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेवालेको परम-
देवतामें स्थित होना कहा गया है, वह प्रलयकालकी भाँति कर्म-संस्कार और
सूक्ष्म शरीरके सहित अज्ञानपूर्वक स्थित होना है । अतः वह परब्रह्म परमात्माकी
प्राप्ति नहीं है; किन्तु समस्त जगत् जिस प्रकार उस परम कारण परमात्मामें
ही स्थित रहता है, उसी प्रकार स्थित होना है । यह स्थिति उस जीवात्माको
जबतक अपने कर्मफल-उपभोगके उपयुक्त कोई दूसरा शरीर नहीं मिलता, तब
तक रहती है; क्योकि उसके पुनर्जन्मका श्रुतिमें कथन है (क० उ० २ । २ । ७) ।
इसलिये जबतक उसे मुक्ति प्राप्त नहीं होती, तबतक उसका सूक्ष्म शरीरसे सम्बन्ध
रहता है; अतः वह मुक्त पुरुषकी भाँति परमात्मामे विलीन नहीं होता ।
सम्बन्ध—उस प्रकरणमें तो जीवात्माका सबके सहित आकाशादि भूतोंमें
स्थित होना बताया गया है, वहाँ यह नहीं कहा गया कि वह सूक्ष्मभूत-
समुदायमें स्थित होता है; अतः उसे स्पष्ट करते हैं—
सूक्ष्मं प्रमाणतश्च तथोपलब्धेः ॥ ४ । २ । ६ ॥
प्रमाणतः=वेद-प्रमाणसे; च=और; तथोपलब्धेः=वैसी उपलब्धि होनेसे
भी ( यही सिद्ध होता है कि ); सूक्ष्मम्=( जिसमें जीवात्मा स्थित होता है
वह ) भूतसमुदाय सूक्ष्म है ।
व्याख्या—मरणकालमें जिस आकाशादि भूतसमुदायमे सबके सहित
जीवात्माका स्थित होना कहा गया है, वह भूतसमुदाय सूक्ष्म है, स्थूल नहीं
है—यह बात श्रुतिके प्रमाणसे तो ( सिद्ध है ही ) प्रत्यक्ष उपलब्धिसे भी सिद्ध
होती है; क्योंकि श्रुतिमे जहाँ परलोक-गमनका वर्णन किया गया है, वहाँ
कहा है—
शतं चैका हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।
तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥
'इस जीवात्माके हृदयमें एक सौ एक नाडियाँ हैं, उनमेसे एक कपालकी
ओर निकली हुई है, इसीको सुषुम्णा कहते हैं, उसके द्वारा ऊपर जाकर मनुष्य
अमृतभावको प्राप्त होता है, दूसरी नाडियाँ मरणकालमें नाना योनियोमे ले