ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ३५ ] अध्याय ३ ३२३
सूत्र ३५ ] अध्याय ३ ३२३
सततम् कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥
'हे पार्थ ! दैवी प्रकृतिमें स्थित हुए महात्मागण मुझे समस्त प्राणियोंका आदि
और अविनाशी जानकर अनन्य मनसे मेरा भजन करते हैं, वे यत्नशील दृढ़
निश्चयवाले भक्त निरन्तर मेरा कीर्तन और मुझे नमस्कार करते हुए, सदा मुझमे
ही संलग्न रहकर प्रेमपूर्वक मेरी उपासना करते हैं।' (गीता ९। १३-१४)। इत्यादि
श्रुतियों और स्मृतियोंमें वर्णित लक्षणोंसे यही सिद्ध होता है कि आपत्तिकालमे
किसी कारणवश अन्य वर्ण, आश्रम और शरीर-निर्वाहसम्बन्धी कर्मोंका पालन
पूर्णतया न हो सके तो भी उन भगवदुपासनाविषयक श्रवण, कीर्तन आदि मुख्य
धर्मोंका अनुष्ठान तो किसी भी प्रकारसे अवश्य करना ही चाहिये। भाव यह कि
किसी भी अवस्थामें इनके अनुष्ठानमे शिथिलता नहीं आने देनी चाहिये।
सम्बन्ध-उक्त धर्मानुष्ठानकी विशेषता दिखलाते हैं—
अनभिभवं च दर्शयति ॥ ३।४।३५॥
श्रुति (इनका अनुष्ठान करनेवालेका) अनभिभवम्=पापोंसे अभिभूत न
होना; च=भी; दर्शयति=दिखलाती है (इससे भी यह सिद्ध होता है कि इनका
अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये)।
व्याख्या—श्रुतिने कहा है कि 'उस परमात्माको प्राप्त करनेवालेकी महिमाको
जाननेवाले जिस साधकका मन शान्त है अर्थात् विषय-वासनासे अभिभूत
नहीं है, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें की हुई हैं, जो अन्य सभी क्रिया-कलापसे उपरत
है, सब प्रकारके शारीरिक और मानसिक सुख-दुःखोंको सहन करनेमे समर्थ-
तितिक्षु है तथा परमात्माके स्मरणमें तल्लीन है, वह अपने हृदयमे स्थित उस
आत्मस्वरूप परमेश्वरका साक्षात्कार करता है; अतः वह समस्त पापोंसे
पार हो जाता है, उसे पाप ताप नहीं पहुँचा सकते; अपितु वही पापोंको सन्तप्त
करता है।' इत्यादि (बृह० उ० ४।४।२३)। इस प्रकार श्रुतिमें भगवान्का
भजन-स्मरण करनेवालेको पाप न लगनेकी बात कही गयी है। इसलिये यही
सिद्ध होता है कि परमात्माकी प्राप्तिके लिये बतलाये हुए जो उपासना-विषयक
श्रवण, कीर्तन और स्मरण आदि धर्म है, उनका अनुष्ठान तो प्रत्येक परिस्थितिमें
करते ही रहना चाहिये।
३२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पुनः उपासनाविषयक कर्मानुष्ठानकी विशेषताका
प्रतिपादन करते हैं—
अन्तरा चापि तु तद्दृष्टेः ॥ ३ । ४ । ३६ ॥
तु = इसके सिवा; अन्तरा = आश्रमधर्मोंके अभावमे; च अपि = भी ( केवल
उपासनाविषयक अनुष्ठानसे परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है ); तद्दृष्टेः = क्योंकि
श्रुतिमें ऐसा विधान देखा जाता है ।
व्याख्या—श्वेताश्वतरोपनिषद् ( १ । १४ ) मे कहा है—
स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् ।
ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत् ॥
'अपने शरीरको नीचेकी अरणि और प्रणवको ऊपरकी अरणि बनाकर
ध्यानके द्वारा निरन्तर मन्थन करते रहनेसे साधक छिपी हुई अग्निकी भाँति
हृदयमें स्थित परमदेव परमेश्वरको देखे ।'
इस कथनके पश्चात् उपर्युक्तरूपसे परमेश्वरमे ध्यानकी स्थितिके लिये
प्रार्थना करने तथा उन्हीं परमात्माकी शरण ग्रहण करनेका भी वर्णन है
( श्वेता० उ० २ । १ से ५ ) । तदनन्तर यह कहा गया है कि 'हे साधक ! सम्पूर्ण
जगत्के उत्पादक सर्वान्तर्यामी परमेश्वरकी प्रेरणासे तुम्हें उस परब्रह्म परमात्माकी
सेवा-समाराधना करनी चाहिये । उन परमेश्वरकी ही शरण लेकर उन्हींमे अपने-
आपको विलीन कर देना चाहिये । ऐसा करनेसे तुम्हारे पूर्वकृत समस्त सञ्चित
कर्म साधनमे विघ्नकारक नहीं होगे ।' ( श्वेता० उ० २ । ७)। इसके बाद इसका
फल आत्मा और परमात्माके स्वरूपका साक्षात्कार बताया है ( २ । १४, १५ ) ।
इसी तरह अन्य श्रुतियोंमें भी केवल उपासनासे ही परमात्माकी प्राप्ति बतायी
है। ( श्वेता० उ० ४ । १७ तथा ६ । २३ ) । इससे यह सिद्ध होता है कि जो
अन्य वर्णाश्रमधर्मोंका पालन करनेमें असमर्थ हैं, उनको केवल उपासनाके
धर्मोंका पालन करनेसे ही परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है ।
सम्बन्ध—इसी बातके समर्थनमें स्मृतिका प्रमाण देते हैं—
अपि च स्मर्यते ॥ ३ । ४ । ३७ ॥
अपि च = इसके सिवा; स्मर्यते = स्मृतियोंमें भी यही बात कही गयी है ।